भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 25
* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

यों कहकर महर्षि दधीचि अकेले ही दक्षकी यज्ञशालासे निकल पड़े और तुरंत अपने आश्रमको चले गये। उनके चले जानेपर दक्षने हँसते हुए कहा—'ब्राह्मणो! दधीचि शंकरके प्रेमी हैं। वे चले गये। आप सब लोग वैदिक सिद्धान्तमें रत रहनेवाले हैं; भगवान् विष्णु आप सबके अग्रणी हैं। अब शीघ्र ही आपलोग मेरे यज्ञको सफल बनावें।' तब उन सभी महर्षियोंने वहाँ देवयज्ञ प्रारम्भ किया।

इसी समय महादेवी दक्षकुमारी सतीने, जो गन्धमादनपर्वतपर अपनी सखियोंके साथ विराजमान थीं, रोहिणीके साथ चन्द्रमाको कहीं जाते हुए देखा। वे यज्ञमें ही जा रहे थे। सतीने अपनी सखी विजयासे कहा—'विजये! तू शीघ्र जाकर पूछ तो सही, ये चन्द्रमा कहाँ जायँगे?' उनके आदेशसे विजया चन्द्रमाके समीप गयी और यथोचित विनयके साथ उनकी यात्राका उद्देश्य पूछा। चन्द्रमाने दक्षके यज्ञमें जानेका सब वृत्तान्त बता दिया। यह सुनकर विजयाको बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ। उसने तुरंत लौटकर सतीसे चन्द्रमाकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं। सुनकर सती देवीने विचार किया, 'क्या कारण है, जो पिताजी मुझे नहीं बुला रहे हैं? क्या मेरी यशस्विनी माता भी मुझे भूल गयीं? आज मैं भगवान् शंकरसे इसका कारण पूछती हूँ।' यह निश्चय करके सती देवीने सखियोंको वहीं ठहरा दिया और स्वयं भगवान् शंकरके पास गयीं। उन्होंने देखा, त्रिनेत्रधारी महेश्वर सभा-मण्डपमें विराजमान हैं। चण्ड-मुण्ड आदि सभी पार्षद उन्हें सब ओरसे घेरकर बैठे हैं। बाण, भृंगी, नन्दी, महाकाल, महारौद्र, महामुण्ड, महाशिरा, धूम्राक्ष, धूम्रकेतु, धूम्रपाद तथा अन्य बहुत-से गण भगवान् रुद्रका अनुवर्तन करनेवाले हैं। वे सभी जितेन्द्रिय तथा वीतराग हैं। लोक-कल्याणकारी भगवान् शंकर इन सबसे घिरे हुए हैं और परम अद्भुत आसनपर विराजमान हैं। सतीका मन भगवान् शिवका दर्शन करते ही उनकी ओर आकृष्ट हो गया। वे सहसा उनके समीप चली गयीं। भगवान् शिवने बड़े आदरके साथ प्रीतियुक्त वचनोंसे सतीको आनन्दित किया और कहा—'प्रिये! इस समय यहाँ तुम्हारे आगमनका क्या कारण है?'

सती बोलीं—देवदेवेश्वर! मेरे पिताके घर महान् यज्ञ हो रहा है। उसमें चलनेके लिये आपकी रुचि क्यों नहीं होती? सदाशिव! यद्यपि आप उस यज्ञमें बुलाये नहीं गये हैं, तथापि आज मेरे कहनेसे मेरे पिताकी यज्ञशालामें आप स्वयं सब प्रकारसे प्रयत्न करके पधारें।

सतीका यह वचन सुनकर महादेवजीने मधुर वाणीमें कहा—कल्याणी! तुम्हारे पिताकी दृष्टिमें जो देवता, असुर तथा किन्नर आदि सम्माननीय हैं, वे सब निःसन्देह उनके यज्ञमें पहुँच गये हैं। सुन्दरी! जो लोग दूसरोंके घर बिना बुलाये जाते हैं, वे वहाँ मृत्युसे भी अधिक कष्टदायक अपमानको प्राप्त होते हैं।* शुभे! दूसरोंके घर जानेपर इन्द्र भी लघुताको प्राप्त होते हैं; इसलिये तुम्हें भी दक्षके यज्ञमें नहीं जाना चाहिये।

महात्मा भगवान् शंकरके इस प्रकार कहनेपर सतीने अपने पिताके प्रति रोष प्रकट करनेवाले वचनोंमें कहा—'नाथ! जिनसे सम्पूर्ण यज्ञ सफल होते हैं, वे देवदेवेश्वर तो आप ही हैं; फिर आपको भी मेरे दुराचारी पिताने आमन्त्रित नहीं किया! उस दुरात्माके मनमें आपके प्रति सद्भाव है या दुर्भाव, यह सब मैं जानना चाहती हूँ। इसलिये अभी पिताके यज्ञमण्डपमें जाती हूँ। देवदेव! जगत्पते! मुझे वहाँ जानेकी आज्ञा दीजिये।'

सती देवीके यों कहनेपर भगवान् महेश्वर


* अनाहूताश्च ये सुभ्रु गच्छन्ति परमन्दिरम्। तेऽपमानं प्राप्नुवन्ति मरणादधिकं ततः॥
(स्क० पु०, मा० के० २।५९)