संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 26, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ५
बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवी! यदि ऐसी बात है तो इस नन्दीपर सवार हो नाना प्रकारके प्रमथगणोंको साथ लेकर तुम शीघ्र वहाँकी यात्रा करो; मैं आज्ञा देता हूँ।
भगवान् शिवके आदेशसे साठ हजार रुद्रगण सती देवीके साथ चले। उन गणोंसे घिरी हुई देवीने अपने पिताके घरकी ओर प्रस्थान किया। सती देवी जब पिताके घर चली गयीं, उस समय सब बातोंपर विचार करके भगवान् महेश्वरने अपने मुखसे यह वचन निकाला—'अपने पिताद्वारा अपमानित होकर दक्षकुमारी सती अब फिर यहाँ लौटकर नहीं आयेंगी।'
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सतीका अग्नि-प्रवेश, दक्ष-यज्ञ-विध्वंस तथा दक्षपर पुनः भगवान् शिवकी कृपा
दाक्षायणी सती उस स्थानपर गयीं, जहाँ वह महान् प्रकाशशाली यज्ञ हो रहा था। नाना प्रकारके आश्चर्यमय कौतूहलसे परिपूर्ण पिताके उस भवनको देखकर सती देवी द्वारपर ही ठहर गयीं और परम सौभाग्यवान् नन्दीकी पीठसे उतरकर इधर-उधर दृष्टि डालने लगीं। उन्होंने माता, पिता, सुहृद्, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धवोंको देखा। माता-पिताको मस्तक झुकाकर वे बड़ी प्रसन्न हुईं। फिर अपने अभिमत प्रस्तावके अनुरूप वचन बोलीं—'पिताजी! जिनसे यह सम्पूर्ण चराचर जगत् पवित्र होता है, उन परम कल्याणमय भगवान् शंकरको आपने क्यों नहीं बुलाया?' (फिर ऋषियोंको सम्बोधित करके कहा—) 'भृगुजी! क्या आप भगवान् शिवको नहीं जानते? महामते कश्यप! क्या आप भी महादेवजीसे अपरिचित हैं? अत्रि, वसिष्ठ तथा कण्वजी! क्या आप भी महेश्वरकी महिमा नहीं जानते? इन्द्र! इस समय तुम्हारा क्या कर्तव्य है? भगवान् विष्णु! आप तो परमेश्वर महादेवजीको अच्छी तरह जानते हैं। ब्रह्माजी! क्या आपको महादेवजीके पराक्रमका ज्ञान नहीं है?'
सतीकी बात सुनकर दक्षने कुपित होकर कहा—भद्रे! तुम्हारे बहुत बातें बनानेसे क्या होगा? इस समय यहाँ तुम्हारी कोई आवश्यकता नहीं है। ठहरो या चली जाओ। तुम यहाँ आयी ही क्यों? तुम्हारा पति, जो शिव कहलाता है, अमंगलका मूर्तिमान् स्वरूप है। कुलीन भी नहीं है। वेदसे बहिष्कृत है। वह भूत, प्रेत और पिशाचोंका राजा है। इसीलिये इस यज्ञके निमित्त उसको आमन्त्रित नहीं किया गया है।
विश्ववन्दिता सती अपने पिताको शिवकी निन्दामें संलग्न देख अत्यन्त क्रोधमें भर गयीं और सोचने लगीं—'जो महादेवजीकी निन्दा करता है तथा जो उनकी निन्दा होती देख चुपचाप सुनता है, वे दोनों नरकमें जाते हैं, और जबतक सूर्य-चन्द्रमाकी स्थिति है तबतक उस नरकमें ही पड़े रहते हैं।* अतः अब मैं इस देहको त्याग दूँगी, अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगी।' इस प्रकार विचार करती हुई सती शिव, रुद्र आदि नामोंका उच्चारण करने लगीं और अग्निमें प्रवेश कर गयीं। यह देख उनके साथ आये हुए समस्त शिवगण हाहाकार करने लगे। ऋषि, इन्द्र आदि देवता, मरुद्गण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा सम्पूर्ण लोकपाल अवाक् हो गये। दक्ष-यज्ञमें सम्मिलित हुए सभी ऋषि-मुनि इस घटनासे भयभीत हो उठे।
इसी बीचमें महात्मा नारदजीने महादेवजीके पास जाकर दक्षकी सारी करतूतें कह सुनायीं। सुनकर भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले परम क्रोधवान् जगदीश्वर भगवान् रुद्र बहुत ही कुपित
* यो निन्दति महादेवं निन्द्यमानं शृणोति च। तावुभौ नरकं यातो यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
(स्क० पु०, मा० के० ३।२२)