संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 274, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें-
माहात्म्य-अरुणाचल-माहात्म्य * २४५ (Note: header says * माहेश्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २४५)
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माहेश्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २४५
अधिकार प्राप्त किया था। गौरीदेवीने वहाँ अरुणाचलेश्वर लिंगकी स्थापना की है, जो मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करता है। पार्वतीकी आज्ञासे वहाँ साक्षात् महिषासुरमर्दिनी दुर्गादेवी निवास करती हैं, जो अपने भक्तोंको निर्विघ्न मन्त्रसिद्धि प्रदान करती हैं। वहाँ श्रीदुर्गाजीके द्वारा पूजित 'पापनाशन' नामक लिंग भी सुशोभित है, जो एक बार प्रणाम करनेमात्रसे मनुष्योंके समस्त पाप हर लेता है। इस क्षेत्रमें वज्रांगद नामक राजाने, जो कुबेरके अपराधसे हीन दशाको पहुँच गये थे, पुनः भगवान् शिवकी भक्तिके माहात्म्यसे शिवसायुज्य प्राप्त कर लिया। अरुणाचलकी प्रदक्षिणा करनेमात्रसे कान्तिशाली और कलाधर नामक विद्याधरराज दुर्वासाके शापबन्धनसे मुक्त हो गये थे। भगवान् शिवके ज्ञानसे बढ़कर दूसरा कोई ज्ञान नहीं है, रुद्रियसे बढ़कर दूसरी कोई श्रुति नहीं है, भगवान् विष्णुसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ शिवभक्त नहीं है, विभूतिसे बढ़कर रक्षाका कोई साधन नहीं है, भक्तिसे उत्तम कोई सदाचार नहीं है, दीक्षा देनेवालेसे बढ़कर दूसरा कोई गुरु नहीं है, रुद्राक्षसे बढ़कर कोई आभूषण नहीं है, शिवशास्त्रसे उत्तम कोई शास्त्र नहीं है, बिल्व-पत्रसे उत्तम पत्र, धतूरेसे उत्तम फूल, वैराग्यसे बढ़कर सुख और मुक्तिसे बढ़कर कोई श्रेष्ठ पद नहीं है।
शिलादपुत्र नन्दिकेश्वरके ऐसा कहनेपर मार्कण्डेयका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। वे आश्चर्यचकित हो उठे। उन्होंने पुनः बार-बार प्रणाम करके नन्दीश्वरजीसे निवेदन किया—'प्रभो! मनुष्योंका कौन-कौन-सा कर्म कैसे-कैसे होता है और किस प्रकार वह नरककी प्राप्ति करानेवाला सुना जाता है? उन-उन कर्मोंका प्रतीकार (प्रायश्चित्त) कैसे होता है? यह सब आप मुझे बताइये।'
नन्दिकेश्वर बोले—मुने! इस संसारमें सात्त्विक पुरुष पुण्यशील होनेके कारण कल्याणको प्राप्त होता है। कर्म तीन प्रकारके हैं—सात्त्विक, राजस और तामस। अतः विधाताने इन तमःप्रधान कर्मोंके उपभोगके लिये विचित्र-विचित्र नरकोंका भी निर्माण किया है। ब्रह्महत्याके पापसे मनुष्य मृत्युके पश्चात् गदहा, कुत्ता अथवा सूअर होकर फिर चाण्डाल होता है। शराब पीनेसे द्विज चिरकालतक नरकमें पड़े रहनेके पश्चात् कृमि, कीट एवं पतंगयोनिको प्राप्त होता है, अथवा कर्मकार (दास) होता है। ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे मनुष्य ब्रह्मराक्षस होता है तथा जिस-जिस वस्तुकी वह चोरी करता है, दूसरे जन्ममें वह-वह वस्तु उसे नहीं प्राप्त होती। गुरुपत्नीगमन करनेवाला पुरुष चिरकालतक असिपत्र वनमें यातना भोगकर अन्तमें नपुंसक होता है। पर-स्त्रीगामी मनुष्य यमदूतोंद्वारा लोहेके तपाये हुए डंडोंसे पीटा जाता और कालसूत्र नामक नरकमें निवास करता है। आग लगानेवाला घोर नरकमें वास करता है, जहर देनेवाला सुघोर नरकमें, चुगलखोर महाघोर नरकमें और धर्मकी निन्दा करनेवाला अवीचि नरकमें पड़ता है। मित्रद्रोही कराल नामक नरकमें, हिंसक भीम नरकमें, छिपकर पाप करनेवाला संहार नरकमें, असत्यवादी भयानक नरकमें तथा पराये खेत और धन आदिका अपहरण करनेवाला मनुष्य असिघोर नरकमें निवास करता है। परद्रोहपरायण पुरुष वज्रमें, मांस-भक्षण करनेवाला द्विज तरलमें, माता-पितासे द्रोह करनेवाला तीक्ष्ण और जपकी निन्दा करनेवाला तापन नामक नरकमें पड़ता है। घोड़ेकी हत्या करनेवाला निरुच्छ्वासमें, गोहत्यारा दारुणमें, भ्रूण-हत्यारा चण्डमें और स्त्रीकी हत्या करनेवाला कूलक नरकमें वास करता है। देवसम्पत्तिका अपहरण करनेवाला दहनमें और पराया धन हरण करनेवाला घोर-घोर नरकमें पड़ता है। यमराजके दूत सभी पापियोंको नरकमें गिराते हैं, उन्हें रस्सियोंसे बाँधते हैं, डंडोंसे पीटते हैं और कीलोंसे छेदते हैं। तीखी चोंचवाले बगुले, गीध, भयंकर नेत्रोंवाले बड़े-बड़े सर्प, काले नाग, व्याघ्र तथा अन्य हिंसक जीव उन पापियोंको