भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 277

२४८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

कालस्वरूप मृत्युंजय! मेरी रक्षा कीजिये। अक्षय ऐश्वर्यसे सम्पन्न महादेव! करुणानिधान! मेरी रक्षा कीजिये। आप सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा और समस्त देहधारियोंके रक्षक हैं, सब भूतोंका संहार करनेवाला भी आपके सिवा दूसरा कौन है? आप सूक्ष्म वस्तुओंमें सबसे अधिक सूक्ष्म (परमाणु) हैं और महान् पदार्थोंमें सबसे महान् भी आप ही हैं। आप ही इस जगत्के बाहर और भीतर व्याप्त होकर विराज रहे हैं। सम्पूर्ण वेद आपके निःश्वास हैं। यह सारा विश्व आपके शिल्पकर्मकी विभूति है। प्रभो! सब कुछ आपका ही है; मुझे ज्ञान दीजिये। देवता, दानव, दैत्य, सिद्ध, विद्याधर, मनुष्य, पशु-पक्षी, पर्वत और वृक्ष भी आप ही हैं। स्वर्ग, अपवर्ग, ॐकार और यज्ञ भी आप ही हैं; आप ही योग तथा पराशक्ति हैं। महेश्वर! ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो आप नहीं हैं? स्थावर, जंगम सभी प्राणियोंके आदि, मध्य और अन्त भी आप ही हैं। आप ही कालरूप होकर सम्पूर्ण जगत्को अपना ग्रास बनाते हैं। आप ही परात्पर परमेश्वर, सबपर शासन करनेवाले तथा सबपर दया दिखानेवाले शिव हैं। वे भगवान् शंकर किस प्रकार मुझे प्रत्यक्ष दर्शन देंगे, जिनका दर्शन पाकर शरणागत भक्त परम कल्याणको प्राप्त होता है। अथवा अपनी बुद्धिके अनुसार मैं उन विश्व-विधाताकी स्तुति करता हूँ।'

देव! महादेव! वामदेव! वृषध्वज! आपकी जय हो! आप कालके भी काल हैं; आपने दक्षके यज्ञका विध्वंस किया है। नीलकण्ठ! चन्द्रशेखर! आपकी जय हो। शम्भो! शिव! ईशान! शर्व! त्र्यम्बक! धूर्जटे! आपकी जय हो। आप कामके शत्रु हैं। आपने त्रिपुरासुरका विनाश किया है। आप स्थिर होनेसे स्थाणु, उद्भव-हेतु होनेसे भव तथा महान् ईश्वर होनेसे महेश्वर कहलाते हैं। ईश! आपकी जय हो। खण्डपरशो! शूलिन्! पशुपते! हर! सर्वज्ञ! भर्ग! भूतनाथ! कपालिन्! नीललोहित! आपकी जय हो। रुद्र! यज्ञविनाशन! पिनाकपाणे! प्रमथाधिप! गंगाधर! व्योमकेश! गिरीश! परमेश्वर! आपकी जय हो। भीम! मृगव्याध! कृत्तिवासा! कृपानिधे! आपकी जय हो। प्रभो! अग्नि आपका बीज है, आप कैलासपर सदा ही निवास करते हैं, आपकीही आज्ञासे वायु चलती है और शेषनाग पृथ्वीका भार ढोते हैं। शर्व! आपकीके शासनसे सूर्य और चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं, समूचा ब्रह्माण्ड समुद्रमें तैरता रहता है और ग्रह-नक्षत्र आकाशमें विचरण करते हैं। आपके ही आदेशसे मैं और ब्रह्मा पालन तथा सृष्टिके कार्यमें समर्थ होते हैं और कल्पके अन्तमें मैं निद्रा त्यागकर पृथ्वीका पालन करता हूँ। आपका आदि और अन्त नहीं मिला; यह आपकी महिमा ही है। अणिमा, महिमा आदि महासिद्धियोंके कारण आपका वैभव असाधारण है। आप अन्य सब देवताओंसे श्रेष्ठ हैं। शंकर! मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? सम्पत्तिमें तो हम आपको भूल जाते हैं और विपत्तिमें स्मरण करते हैं। भक्तोंपर आपको कभी क्रोध नहीं आता; सदा ही उनपर कृपा और प्रसन्नता बनी रहती है। जब आप अपनी भक्ति प्रदान करते हैं, तब बोध प्राप्त होता है और उससे मोक्ष मिलता है।'

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शिव-पार्वतीके दाम्पत्य-जीवनकी एक झाँकी, पार्वतीकी अरुणाचल क्षेत्रमें तपस्या और दुर्गादेवीके द्वारा शुम्भ, निशुम्भ और महिषासुरका वध

मार्कण्डेयजीने पूछा— भगवन्! महादेवी गौरीने अरुणाचल-तीर्थमें किस प्रकार तपस्या की है, यह बताइये।
नन्दिकेश्वरने कहा— महामते मार्कण्डेय! मुझे