संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- माहात्म्य-अरुणाचल-माहेश्वरखण्ड * २४९
जैसा मालूम है, वैसा बता रहा हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। यह तो तुम जानते ही हो कि पूर्वकालमें भगवान् शिवने दक्ष-कन्या सतीके साथ विवाह किया था और सती उन्हें बहुत प्यारी थीं। फिर जब उनके पिता दक्षप्रजापतिने उन्हींके पति भगवान् शंकरसे द्रोह किया, तब उन्होंने किस प्रकार क्रोधमें आकर योग-शक्तिसे अपने शरीरका त्याग कर दिया; यह बात भी तुमने सुनी ही होगी। उस समय भगवान् शिवकी आज्ञासे वीरभद्रने जो दक्ष-यज्ञका विध्वंस किया था, वह महान् इतिहास भी तुम्हें ज्ञात ही होगा। तदनन्तर देवी सतीने पुनः गिरिराज हिमवान्के घरमें जन्म लिया, उस समय उनका नाम उमा और पार्वती पड़ा। कुछ समय बाद देवी पार्वती स्थाणुवनमें भगवान् शिवकी एकान्त सेवा करने लगीं, परंतु महादेवजीने उनकी ओर रुचि नहीं की और कामदेवको कालाग्निसे भस्म कर दिया। तब अपने प्रियगणोंके साथ कहीं एकान्तवास करनेवाले जितेन्द्रिय महादेवजीको गौरीदेवीने वनवासिनी हो तपस्याके द्वारा सन्तुष्ट किया। तत्पश्चात् उनके साथ विवाह करके महादेवजीने उमाके साथ एकान्तमें प्रसन्नतापूर्वक रमण किया।
उन्हीं दिनों शुम्भ और निशुम्भ नामक दो दैत्योंने ब्रह्माजीसे यह वरदान प्राप्त किया कि देवता, दानव और मनुष्योंमें किसी भी पुरुषसे मेरी मृत्यु न हो। उसके इस वचनको सुनकर सब देवता थर्रा उठे, तब विष्णु आदिने महादेवजीसे प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनकर महादेवजी बोले—'भय न करो, समयानुसार ऐसा प्रयत्न किया जायगा, जिससे वे दोनों दानव मारे जायँ।' यों कहकर भगवान् शिवने देवताओंको विदा कर दिया और स्वयं पार्वतीदेवीके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। पार्वतीजीका रंग साँवला था। उन्होंने शंकरजीकी प्रसन्नताके लिये अपनी उस काली चमड़ीको उतार फेंका। जहाँ वह चमड़ी फेंकी गयी, वहाँ 'महाकाली-प्रपात' नामक उत्तम क्षेत्र बन गया और काली कौशिकी-नामसे प्रसिद्ध हो, विन्ध्याचल पर्वतपर रहकर तपस्या करने लगीं। वहीं उन्होंने अपने प्रति आसक्त होनेवाले शुम्भ-निशुम्भ नामक दोनों महादैत्योंको मार डाला। फिर वहीं परम मनोहर गौरीशिखरपर तपस्यासे गौर वर्ण प्राप्त करके देवीने अपने (आदिस्वरूपमें स्थित होकर) पतिको सन्तुष्ट किया। पुनः क्रमशः गर्भवती होकर पार्वतीने गणेश तथा छः मुखोंवाले सेनानी—इन दो पुत्रोंको जन्म दिया। बालकोंको बढ़ते हुए देखकर माता-पिता हर्षके समुद्रमें मग्न हुए-से रहते थे और पुत्रोंके प्रति उनका प्रेम अत्यन्त पुष्ट हो रहा था। भगवान् शिव और पार्वती कभी वीणा बजाते और कभी दिव्य शास्त्रोंकी चर्चा करते। कभी मैनाक, कभी मेना और कभी हिमवान् इन दोनों दम्पतिकी पूजा किया करते थे। इस प्रकार चराचर जगत्के माता-पिता शिव-पार्वतीने मेरु आदि पर्वतोंपर निवास करके दीर्घकालतक एक-दूसरेके साथ अत्यन्त सुखका अनुभव किया।
एक समयकी बात है, गिरिराजकुमारी पार्वतीने अरुणाचल पर्वतके समीप जाकर किसी आश्रमको देखा। वहाँ कौवे और उल्लू, शुक और श्येन (बाज), मृग और व्याघ्र, हाथी और सिंह, मोर तथा सर्प और चूहे तथा बिल्लियोंने परस्पर मित्रता स्थापित कर ली थी* तथा वृक्षोंके बीचसे निकलती हुई अत्यन्त पवित्र धूमराशि जहाँ होम किये हुए पुरोडाशकी सुगन्ध फैला रही थी। उस आश्रमपर एक ऋषिश्रेष्ठ दिखायी दिये, जो हाथके अग्रभागसे
* काकोलूकैः शुकश्येनैर्मृगव्याघ्रैर्हरिद्विपैः। कलापिसर्पैरत्राखुमार्जारैः सौहृदं श्रितम् ॥
(स्क० पु०, मा० अ० ख० उ० वें० प्र० १८। २९)