संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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रुद्राक्षकी माला जप रहे थे। वहाँ पहुँचकर पार्वतीनो
तपोधनसे पूछा—‘तुम कौन हो? तथा यह श्रेष्ठ पर्वत कौन है? जहाँ तुम तपस्या करते हो?’ वे बोले—‘देवि! यह अरुणाचल पर्वत है, जो समस्त पुण्य-क्षेत्रोंमें सम्मानित है। मैं गौतम नामक मुनि हूँ और तपस्याद्वारा भगवान् शिवकी आराधना करता हूँ।’ यों कहकर तथा विजया आदि सखियोंके मुँहसे पार्वतीजीका परिचय पाकर उन्होंने बड़ी भक्तिसे देवीको प्रणाम किया और अपनी पर्णशालामें ले जाकर कन्द-मूल और फल आदिके द्वारा उनका आतिथ्य-सत्कार किया। मुनिने सम्पूर्ण जगत्के मंगलकी मूलभूता तपस्याके लिये अनुमति दी और ज्योतिस्तम्भके प्रादुर्भावसे लेकर अरुणाचलकी समस्त महिमाका यथाशक्ति वर्णन किया। साथ ही यह भी बताया कि मैं यहीं भगवान् त्रिलोचनकी स्थापना करके पवित्र चित्तसे तपस्याके द्वारा यथाशक्ति उनकी आराधना करता हूँ। देवि! मेरे आश्रमके समीप यह बड़ा भारी पुण्यक्षेत्र है, यहाँ आश्रम बनाइये और चिरकालतक तपस्या कीजिये।
मुनिके इस प्रकार आदेश देनेपर पार्वतीनो आश्रम बनाना स्वीकार किया और बड़ी भारी तपस्या करनेके लिये उद्योग किया। अन्यान्य जीवोंसे आश्रमकी रक्षा करनेके लिये वनवासिनी उमाने सुभगा और धुन्धुमारीको पूर्व आदि दिशाओंमें स्थापित किया। फिर सम्पूर्ण तपोवनकी रक्षा करनेके लिये उन्होंने उन दुर्गाजीको आदेश दिया जिनका प्रयत्न कभी प्रतिहत नहीं होता तथा जो पार्वतीजीकी आज्ञा निभानेमें समर्थ हैं। तत्पश्चात् उमाने मन्दारके फूल गूँथनेयोग्य अपनी वेणीको खोलकर उसे तपस्याके लिये जटाभारके रूपमें परिणत कर दिया। हंसछाप किनारेकी हलकी साड़ीको उतारकर कठोर वल्कल पहन लिया। उन्होंने कुश और बिल्वपत्र तोड़े तथा सबेरे पवित्र नदीमें स्नान करके रक्त चन्दनमिश्रित जल और फूलसे सूर्यनारायणको विधिपूर्वक अर्घ्य दिया। उसके बाद प्रदक्षिणा करके सहस्रों बार प्रणाम किया। फिर स्वयं ही शास्त्रोक्त विधिसे शिवलिंगकी स्थापना करके उसकी विधिपूर्वक पूजा की। पाद्य और अर्घ्य निवेदन करके भगवान्का अभिषेक किया। चन्दन और पुष्प चढ़ाये तथा धूप और दीप अर्पण किये। तत्पश्चात् पंचोपचारोंसे पुनः भगवान् शिवके हृदयादि छः अंगोंका पूजन किया। इस प्रकार एक दिनका पूजन पूर्ण करके प्रतिदिन वे इसी प्रकार प्रदक्षिणा और प्रणाम आदिके सहित शिवजीकी पूजा करने लगीं। शिवशास्त्रोंमें बतायी हुई विधिके अनुसार सौभाग्यदायक द्रव्योंसे पूजाके अन्तमें प्रज्वलित अग्निके भीतर वे आहुति देती थीं। कन्द, मूल, फल आदि समस्त उपचारोंका संग्रह करके वे उनके द्वारा अतिथियोंका सत्कार करती थीं। ग्रीष्म ऋतुमें पाँच प्रदीप्त अग्नियोंके मध्य अँगुठेके बलपर खड़ी रहती थीं। सर्दीमें सरोवरके भीतर खड़ी हो, चन्द्रमाकी सुधामयी किरणोंसे पुष्ट होती थीं। वर्षाकी रात्रियोंमें अन्धकारके भीतर स्थिरभावसे खड़ी हुई पार्वती ऐसी दिखायी देती थीं मानो वर्षाकी धाराओं और बादलोंके साथ बिजली ही प्रकाशित हो रही हो। अपने