भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 28

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ७


हुए। लोकसंहारकारी रुद्रने अपनी जटा उखाड़कर उसे पर्वतके शिखरपर क्रोधपूर्वक दे मारा। जटा उखाड़नेसे महायशस्वी वीरभद्र प्रकट हुए। साथ ही करोड़ों भूतोंसे घिरी हुई कालीका भी प्राकट्य हुआ। महात्मा रुद्रके क्रोध और निःश्वाससे सैकड़ों प्रकारके ज्वर तथा तेरह प्रकारके सन्निपात रोग उत्पन्न हुए। वीरभद्रने भयंकर पराक्रमी रुद्रसे निवेदन किया—'प्रभो! शीघ्र आज्ञा कीजिये, इस सेवकसे क्या काम लेना है?' भगवान् रुद्रने आज्ञा दी—'महाबाहु वीर! शीघ्र जाओ और दक्ष-यज्ञका विनाश करो।'

देवाधिदेव शूलपाणि महादेवजीकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके महातेजस्वी वीरभद्र समस्त भूतोंसे घिरे हुए दक्ष-यज्ञकी ओर चल दिये। उनके साथ कालिका देवी भी थीं। उसी समय दक्षके यहाँ सहसा अपशकुन प्रकट होने लगे। धूल और कंकड़ोंसे भरी हुई रूक्ष वायु चलने लगी। मेघ रक्तकी वर्षा करने लगे। सम्पूर्ण दिशाओंमें अन्धकार छा गया। पृथ्वीपर सहस्त्रशः उल्कापात होने लगे। इस प्रकारके अनिष्टसूचक उत्पात वहाँ देवता आदिको दिखायी दिये। दक्षको भी बड़ा भय हुआ। वे भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और विनयपूर्वक कहने लगे—'महाविष्णो! आप हमारे परम गुरु हैं; रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। सुरश्रेष्ठ! आप ही यज्ञ हैं, इस महान् भयसे मुझे मुक्त कीजिये।'

दक्षके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् मधुसूदनने कहा—ब्रह्मन्! इसमें सन्देह नहीं कि मुझे तुम्हारी रक्षा करनी चाहिये; किंतु तुमने धर्मको जानते हुए भी महेश्वरकी अवहेलना की है। महेश्वरकी अवज्ञासे तुम्हारा सब कुछ निष्फल हो जायगा। जहाँ अपूज्य व्यक्तियोंका पूजन होता तथा पूजनीय महात्माका पूजन नहीं किया जाता, वहाँ तीन संकट अवश्य प्राप्त होंगे—दुर्भिक्ष, मृत्यु तथा भय।* इसलिये सब प्रकारसे यत्न करके भगवान् शंकरको मनाना चाहिये। तुम्हारे यज्ञमें महेश्वरका सम्मान नहीं किया गया है, इसी कारण यह महान् भय उपस्थित हुआ है। इस समय तो हम सब लोग मिलकर भी इस भयका निवारण करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह सब कुछ तुम्हारी दुर्नीतिके कारण हो रहा है।

भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर दक्ष चिन्तित हो उठे। उनका मुँह सूख गया। इतनेमें ही अपनी सेनासे घिरे हुए महातेजस्वी वीरभद्र भी आ पहुँचे। उनके साथ काली, कात्यायनी, ईशानी, चामुण्डा, मर्दिनी, भद्रकाली, भद्रा, त्वरिता तथा वैष्णवी—ये नव दुर्गाएँ तथा भूतोंका महान् समुदाय भी था। शाकिनी, डाकिनी, भूत, प्रमथ, गुह्यक, कूष्माण्ड, कर्पट, वटुक, ब्रह्मराक्षस, भैरव, क्षेत्रपाल, राक्षस, यक्ष, विनायक तथा चौंसठ योगिनियोंका मण्डल—ये सब उस महान् प्रकाशमय यज्ञ-मण्डपमें सहसा प्रकट हो गये। भगवान् शंकरके उन पार्षदोंनें देवताओंके साथ युद्ध आरम्भ किया। लोकपालोंसहित देवताओंने भी शिवगणोंपर अस्त्र-शस्त्रोंसे प्रहार किया। यद्यपि वे लाखोंकी संख्यामें थे, तथापि इन्द्र आदि लोकपालोंने उन्हें रणसे विमुख कर दिया। उस समय देवताओंकी विजय और यजमानके सन्तोषके लिये महर्षि भृगुने शिवगणोंके प्रति उच्चाटनका प्रयोग किया था। इसीसे उस समय देवता विजयी हुए।

अपने सैनिकोंकी पराजय देखकर वीरभद्रको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने भूतों, प्रेतों और पिशाचोंको पीछे करके वृषभास्यको आगे किया और स्वयं भी आगे आ गये। महाबली वीरभद्रने एक तीक्ष्ण त्रिशूल हाथमें लेकर देवताओं, यक्षों, (दक्षपक्षीय) पिशाचों, गुह्यकों तथा राक्षसोंको भी उस युद्धमें मार गिराया। समस्त शिवगणोंने शूलके आघातसे


* अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते। त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दुर्भिक्षो मरणं भयम्॥
(स्क० पु०, मा० के० ३।४८-४९)