संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
देवताओंको गहरी चोट पहुँचायी। फिर तो सम्पूर्ण देवता पराजित होकर भागने लगे। सबने एक-दूसरेको छोड़कर स्वर्गकी राह ली। केवल इन्द्र आदि लोकपाल ही विजयके लिये उत्सुक होकर वहाँ खड़े रहे। वे बारंबार बृहस्पतिजीसे पूछते थे—'गुरुदेव! हमारी विजय कैसे होगी?' तब बृहस्पतिजीने कहा—'भगवान् विष्णुने जो बात बहुत पहले कह दी थी, वह आज सत्य हुई। यदि फलरूपमें परिणत हुए कर्मका नियामक कोई ईश्वर है तो वह भी कर्ताका ही आश्रय लेता है। जो कर्ता नहीं है, उसपर वह अपना प्रभुत्व नहीं प्रकट करता—कर्म करनेवालेको ही ईश्वर उसका फल देता है, न करनेवालेको नहीं। वह ईश्वर केवल अनन्य भक्तिसे जानने योग्य है। परम शान्ति और सन्तोषसे ही भगवान् सदाशिवके स्वरूपको जाना जा सकता है। उन्हींसे यह सम्पूर्ण सुख-दुःखात्मक जगत् जन्म और जीवन धारण करता है। (इस समय तुम्हारी विजयका कोई उपाय नहीं दिखायी देता।) इन्द्र! तुम मूर्खता और लोलुपताके वश इन लोकपालोंके साथ यहाँ आ गये हो। बताओ तो इस समय क्या करोगे? ये परम शोभायमान गण भगवान् शिवके किंकर हैं; वे ही इनके सहायक हैं। ये महाभाग कुपित होनेपर जब संहार आरम्भ करते हैं तब किसीको शेष नहीं छोड़ते।'
बृहस्पतिजीका यह कथन सुनकर वे सम्पूर्ण देवता, लोकपाल तथा इन्द्र भी चिन्तामें डूब गये। तदनन्तर शिवगणोंसे घिरे हुए वीरभद्रने कहा—'तुम सब देवता मूर्खताके कारण यहाँ भेंट लेनेके लिये आ गये हो। मेरे निकट तो आओ। मैं तुम्हें भेंट देता हूँ। सखे इन्द्र! मित्रवर सूर्य! चन्द्रमा! धनाध्यक्ष कुबेर! पाशधारी वरुण! मृत्यो! यमुनाके बड़े भैया यमराज! मैं आपलोगोंकी तृप्तिके लिये शीघ्र ही भेंट अर्पित करूँगा।' यों कहकर क्रोधमें भरे वीरभद्रने सब देवताओंपर बाणोंकी बौछार आरम्भ की। उन बाणोंके आघातसे पीड़ित होकर वे सब-के-सब दसों दिशाओंमें भाग गये। लोकपालोंके और देवताओंके पलायन कर जानेपर भगवान् विष्णु भी चले गये। फिर वीरभद्र अपने गणोंके साथ यज्ञशालामें आये। उस समय देवता, ऋषि तथा अन्य जो यज्ञोपजीवी लोग थे, उन सबको भगवान् शिवके गणोंने परास्त कर दिया। महर्षि भृगुको धरतीपर पटककर उनकी दाढ़ी और मूँछ नोंच ली। पूषाने दाँत दिखाकर हँसी उड़ायी थी, अतः शिवगणोंने उनके सारे दाँत उखाड़ लिये। अग्निपत्नी स्वधा और स्वाहाको भी अपमानित किया तथा क्रोधमें भरकर उन्होंने और भी ऐसे-ऐसे बर्ताव किये, जो वाणीद्वारा कहने योग्य नहीं हैं। दक्ष महान् भयके मारे अन्तर्वेदीमें छिपे हुए थे। इस बातका पता लगनेपर रोषमें भरे हुए वीरभद्र उन्हें पकड़ लाये और उनका जबड़ा पकड़कर सिरके ऊपर तलवारसे चोट की। फिर दक्षके कटे हुए सिरको उन्होंने तुरंत ही यज्ञकुण्डमें डालकर जला दिया। उस यज्ञशालामें दूसरे-दूसरे जो देवता, पितर, ऋषि, यक्ष और राक्षस रह गये थे, वे सब शिवगणोंके उपद्रवसे भयभीत होकर भाग चले। चन्द्रमा, आदित्यगण, ग्रहमण्डल, नक्षत्र और तारे—इन सबको शिवगणोंने भगा दिया। ब्रह्माजी अपने पुत्र दक्षके शोकसे पीड़ित होकर सत्यलोकको चले गये और वहाँ स्वस्थचित्तसे विचार करने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? इस अपमानके कारण ब्रह्माजीको शान्ति नहीं मिलती थी। 'यह सब कुछ उस दक्षके ही पापका फल है' यह जानकर पितामहने कैलास पर्वतपर जानेका निश्चय किया। महातेजस्वी ब्रह्माजी हंसपर आरूढ़ हो सब देवताओंके साथ पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर गये। वहाँ उन्होंने नन्दीके साथ एकान्तमें बैठे हुए भगवान् सदाशिवका दर्शन किया। उनके मस्तकपर जटा-जूट शोभा पा रहा था। भगवान् शिवको देखकर ब्रह्माजी दण्डकी भाँति पृथ्वीपर पड़ गये और अपना अपराध क्षमा करानेके