भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 281

२५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


दुर्गादेवीके अंगोंसे योगिनियोंकी मण्डली तथा सहस्रों रोषमें भरी हुई मातृकाएँ प्रकट हुईं। उन सबकी कान्ति कमलके समान थी, उन्होंने व्याघ्रपर सवार हो रणके लिये प्रस्थान किया। उनके साथ घर्घर शब्द करनेवाले बहुत-से गण तथा अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाली करोड़ों मातृकाएँ भी चलीं। चन्द्रमाके समान गौर वर्णवाली उन मातृकाओंने आश्रमके बाहर पहुँचकर हठपूर्वक चौसठ करोड़ दैत्योंको घेर लिया। तदनन्तर योगिनीमण्डल तथा दानवसेनामें परस्पर घोर युद्ध होने लगा, जो समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर था। योगिनियोंके छोड़े हुए बाणोंसे दैत्योंके मस्तक कट-कटकर पृथ्वीको इस प्रकार आच्छादित करने लगे, मानो वे स्थलसे ही उत्पन्न हुए हैं। थोड़ी ही देरमें रक्तकी नदियाँ बह चलीं। कुछ दैत्य डंडोंसे, कुछ शूलोंसे, कुछ शक्तियोंसे, कुछ वज्रोंसे और कुछ योगिनियोंकी तलवारोंसे मौतके घाट उतारे गये। इस प्रकार मारे हुए दानवेश्वर बिना सेनापतिके सैनिकोंकी भाँति सर्वथा नष्ट हो गये। चामुण्डाने चक्रके अग्रभागसे चण्ड-मुण्डके मस्तक काट डाले, इन्हीं दोनों दैत्योंका संहार करनेसे इनका यह (चामुण्डा) नाम प्रसिद्ध हुआ। तब महिषासुरने क्रोधमें भरकर युद्ध करनेके लिये देवीपर आक्रमण किया। उस समय प्रचण्ड, चामर, महामौलि, महाहनु, उग्रास्य, विकटाक्ष, ज्वालास्य तथा दहन भी उसके पीछे-पीछे चले। ठीक वैसे ही, जैसे कालनेमि आदि असुर विप्रचित्तिके पीछे चलते हैं। वे सभी शिरस्त्राण (टोप) धारण किये, रथपर बैठे, तरकस बाँधे और धनुष लिये युद्ध-भूमिमें पहुँचे। दैत्य बाणोंकी वर्षा करते हुए मातृमण्डलकी ओर दौड़े। उस समय वे मातृकाएँ देवीकी इस प्रकार स्तुति करने लगीं—
'देवि! आप ही ब्रह्माकी सृष्टिशक्ति, विष्णुकी पालनशक्ति तथा रुद्रकी संहारशक्ति कही जाती हैं। आप ही यशोदा और नन्दसे उत्पन्न हुई देवी हैं, जो एका और अनंशाके नामसे प्रसिद्ध हैं। आप ही कंस आदि असुरोंका संहार करनेके कार्यमें भगवान् विष्णुकी सहायता करेंगी। देवि! दुर्गे! आप ही महामाया, लक्ष्मी, सरस्वती तथा पार्वती हैं।'

इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर दुर्गादेवीने मातृकाओंको अभयदान दिया और स्वयं महिषासुरसे युद्ध करनेके लिये निकलीं। उन्होंने हलके अग्रभागसे प्रचण्डको, भिन्दिपालसे चामरको, छुरीसे महामौलिको, कृपाणसे महाहनुको, कुठारसे उग्रवक्त्रको, शक्तिसे विकटाक्षको, मुद्गरसे ज्वालामुखको और मुसलसे दहनको मार गिराया। फिर महिषासुरके सामने स्वयं ही रोषपूर्वक युद्ध करती हुई देवीने बड़ा भयंकर सिंहनाद किया। उस समय वे मन-ही-मन प्रसन्न थीं। देवीका सिंहनाद सुनकर महिषासुरको बड़ा क्रोध हुआ। उसने बाणोंसे दुर्गाजीके तालू और नेत्रोंपर प्रहार किया। तब दुर्गाने भी कुपित होकर उस असुरेश्वरकी दोनों बाहों, छाती और मुखमें जलती हुई धारवाले बाणोंसे प्रहार किया। यह देख दैत्यने तीन बाणोंसे दुर्गाके मुखको बींध डाला, पाँच-पाँच बाणोंसे उनकी दोनों भुजाओंमें और दो-दो बाणोंसे दोनों नेत्रोंमें आघात किया। फिर दुर्गाने भी एक बाणसे दैत्यके सारथिको और आठ बाणोंसे घोड़ोंको मार डाला। तीन बाणोंसे उसके धनुषको और चार सायकोंसे रथकी ध्वजाको भी काट गिराया। तब दैत्यराज महिषने पैदल होकर दुर्गाजीके ऊपर सब ओरसे प्रज्वलित एक शतघ्नी चलायी, जो कालदण्डके समान भयंकर थी। देवता हाहाकार कर उठे, मातृकाएँ भाग खड़ी हुईं; परंतु दुर्गाने अपनी ओर आती हुई उस शतघ्नीको लीलापूर्वक पकड़ लिया। तब प्रलयकालीन मेघके समान महिषासुरने एकके बाद एक करके धनुष, पाश, भुशुण्डी, तलवार, कील, शक्ति, गदा, चक्र, तोमर, फलक, अंकुश, फरसा, भिन्दिपाल, पट्टिश और दण्ड आदि अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा की, परंतु शत्रुके चलाये