भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 282
  • माहेस्वरखण्ड-अरुणाचल-माहात्म्य * २५३

हुए उन सभी आयुधोंको अपने पास आते ही दुर्गादेवी हाथसे पकड़ लेतीं और जैसे हथिनी कमलकी नालको अनायास ही तोड़ डालती है, उसी प्रकार वे उनके टुकड़े-टुकड़े कर डालती थीं। महिषासुर क्षणमें सिंह, क्षणमें वाराह, क्षणमें व्याघ्र, क्षणमें हाथी तथा क्षणमें भैंसा होकर दुर्गाजीसे युद्ध कर रहा था। उसने अत्यन्त रोषमें भरकर अपने तीखे सींगोंसे दुर्गादेवी और उनके सिंहको भी बार-बार घायल किया। वह क्षणमें आकाशमें चला जाता, क्षणमें पृथ्वीपर उतर आता, क्षणमें चारों दिशाओंमें घूम आता और क्षणमें गर्जना करने लगता था।

इसी समय दानवराज महिष अपने असली रूपमें देवीके सामने आया। तब दुर्गाने तलवारसे ही उसके मस्तकको काट डाला और उस कटे हुए मस्तकको हाथमें लेकर वे रणभूमिमें नृत्य करने लगीं। इस प्रकार दुर्गादेवीके द्वारा समस्त भुवनोंके कण्टकरूप महिषासुरके मारे जानेपर देवता हर्षसे नाचने लगे, महर्षि अत्यन्त प्रसन्न हो गये और मेघोंने दिव्य पुष्पोंकी वर्षा की।


## खड्गतीर्थकी उत्पत्ति, ज्योतिदर्शन, पार्वतीपर अरुणाचलेश्वरकी कृपा तथा भगवान् शिवका वरदान

**मार्कण्डेयजी बोले—** प्रभो ! इस प्रकार भद्रकालीद्वारा महिषासुरके मारे जानेपर तपस्यामें लगी हुई गिरिराजनन्दिनी पार्वतीनै क्या किया ?

**नन्दिकेश्वरने कहा—** मुने ! तदनन्तर दुर्गादेवीने एक हाथमें दैत्यका मस्तक लिये दूसरे खड्गयुक्त हाथसे गौरीदेवीको प्रणाम किया। हर्षसे नृत्य करती हुई दुर्गाको दयार्द्रदृष्टिसे देखकर पार्वतींने अपने दाँतोंकी किरणोंसे आकाशमें प्रकाश बिखेरते हुए उनसे इस प्रकार कहा— **'विन्ध्यवासिनि !** तुमने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम किया है। तुम्हारे प्रभावसे मेरी तपस्याका विघ्न दूर हो गया। देवि ! तुम्हारा चरित्र सम्पूर्ण जगत्में पवित्र है। तुमने अपने हाथमें जो यह महिषासुरका अपवित्र एवं भयंकर मस्तक ले रखा है, उसे त्याग दो और एक नूतन पापनाशक तीर्थ उत्पन्न करो, जिसमें स्नान करनेसे पापका प्रायश्चित्त होगा।' गौरीदेवीके यों कहनेपर पापकी आशंकावाली सामर्थ्यशालिनी दुर्गाने अपनी तलवारसे एक शिलाखण्डको विदीर्ण किया। वह पत्थर पातालतक छिद्रयुक्त हो गया। फिर वहाँसे अत्यन्त निर्मल, परम पवित्र, तरंगयुक्त जल ऊपरकी ओर उठा। उस पावन एवं गम्भीर जलमें दुर्गादेवीने **'नमः शोणाद्रिनांथाय'** इस उत्तम मन्त्रका उच्चारण करके गोता लगाया। इतनेहीमें महिषासुरके कण्ठमें स्थित शिवलिंग उसमेंसे खिसककर जलके किनारे स्वयं प्रतिष्ठित हो गया और **'पापनाशन'** नामसे प्रसिद्ध हुआ। तत्पश्चात् तीर्थके जलसे समस्त पाप धुल जानेपर दुर्गादेवी बाहर निकलीं। फिर उनके हाथसे महिषासुरका मस्तक नीचे गिर पड़ा।

तदनन्तर कार्तिककी पूर्णिमाको रात्रिमें अरुणाचलके शिखरपर कोई अपूर्व ज्योति दिखायी दी।