भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 294
* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड *२६५

पृथ्वीदेवीको साथ लेकर, गरुड़पर आरूढ़ हो, वहाँसे वृषाभाचल (वेंकटगिरि)-को प्रस्थान किया। नारद आदि मुनीश्वरोंसे प्रशंसित होकर पृथ्वीपति भगवान् वाराह स्वामिपुष्करिणीके लोकपूजित पश्चिम तटपर निवास करते हैं। वहाँ अनेकानेक मुनीश्वर, महाभाग वैखानस तथा ब्रह्माजीके तुल्य महात्मा पुरुष वाराहमुख भगवान् विष्णुकी आराधनामें संलग्न रहते हैं। | सूत! जो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय पावन संवादको सुनता अथवा देवता और ब्राह्मणोंके आगे पढ़ता है, वह प्रतिष्ठाको प्राप्त होता है। तथा जितने लोग सुनते हैं, उन सभीको अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होती है।<br>सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो! भगवान् व्यासने यह माहात्म्य मुझसे कहा है और मैंने जैसा सुना है, वैसा ही आपलोगोंके सामने वर्णन किया है।

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भगवान् वाराहका मन्त्र, उसके जपकी विधि, ध्यान तथा उसके अनुष्ठानका फल

ऋषियोंने कहा—सूतजी! पृथ्वीके साथ भगवान् वाराह जब वृषभाचलपर चले गये, तब वहाँ उन्होंने पृथ्वीसे क्या कहा? महामते! वह सब प्रसंग हमें सुनाइये।

सूतजी बोले—मुनियो! आप सब लोग पूर्व-कालकी पुण्यमयी कथा श्रवण करें। पहले वैवस्वत मन्वन्तरके परम पवित्र सत्ययुगमें वाराहरूपधारी पृथ्वीपति देवेश्वर भगवान् विष्णु नारायणगिरिपर निवास करते थे। उस समय पृथ्वीदेवी अपनी सखियोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुईं और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उन्होंने भगवान्‌के सामने यह प्रश्न उपस्थित किया—'देवेश! आप किस मन्त्रसे आराधना करनेपर प्रसन्न होंगे? जो मन्त्र आपको सदा ही प्रिय है और नियमपूर्वक रहनेवाले मनुष्योंको आपके परमधामकी प्राप्ति करा देता है, उसका मुझे उपदेश कीजिये।'

भूदेवीके इस प्रकार प्रश्न करनेपर भगवान् वाराहने प्रेमसे मुसकराते हुए कहा—देवि! सुनो। यह परम गोपनीय मन्त्र है, इसे कभी अनधिकारीके सामने प्रकाशमें नहीं लाना चाहिये। जो सेवा करनेवाला भक्त तथा मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला है, उसीको इस मन्त्रका उपदेश करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ नमः श्रीवराहाय धरण्युद्धारणाय स्वाहा'। मुमुक्षु पुरुषोंको इस मन्त्रका सदैव जप करना चाहिये। भूदेवि! यह मन्त्र सब सिद्धियोंको देनेवाला है। इस मन्त्रके संकर्षण ऋषि हैं और मैं ही देवता कहा गया हूँ। इसका छन्द पंक्ति है, श्री बीज है। सद्गुरुसे इस मन्त्रकी दीक्षा लेकर इसका चार लाख जप करना चाहिये और घी तथा मधु मिलाये हुए खीरका हवन करना चाहिये।

अब मैं अपने स्वरूपका ध्यान बतला रहा हूँ, जो अन्तःकरणको शुद्ध करनेवाला है। समुद्रवसने! मेरे अंगोंकी कान्ति शुद्ध स्फटिक गिरिके समान श्वेत है। खिले हुए लाल कमलदलोंके समान सुन्दर नेत्र हैं, वाराहके समान मुख है, स्वरूप सौम्य है, चार भुजाएँ हैं, मस्तकपर किरीट शोभा पाता है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न है। हाथोंमें चक्र, शंख, अभयदायिनी मुद्रा और कमल सुशोभित हैं। मेरी बायीं जाँघपर तुम बैठी हो। मैंने लाल, पीले वस्त्र पहनकर लाल रंगके ही आभूषणोंसे अपनेको विभूषित किया है। श्रीकच्छपके पृष्ठके मध्यभागमें शेषनागकी मूर्ति है। उसके ऊपर सहस्रदल कमलका आसन है