भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 297

२६८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आकाशराजने उस कन्याका नाम पद्मिनी (पद्मावती, पद्मालया आदि) रखा था। धीरे-धीरे वह युवा अवस्थाको प्राप्त हुई। एक दिन पद्मिनी शुक और कोकिलोंके कलरवसे व्याप्त उपवनमें अपनी सखियोंके साथ विहार कर रही थी। उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारद अकस्मात् घूमते हुए वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने वनकी मूर्तिमती लक्ष्मीकी भाँति उस कन्याको देखकर विस्मयसे पूछा—‘भीरु! तुम कौन हो, किसकी कन्या हो? मुझे अपना हाथ तो दिखाओ।’ यह सुनकर पद्मिनीने नारदजीसे कहा—‘ब्रह्मन्! मैं आकाशराजकी कन्या हूँ। मेरे लक्षण बताइये।’

नारदजी बोले—सुन्दरि! सुनो, तुम्हारा मस्तक गोलाकार और सम है। इसके ऊपर चिकने और लंबे बाल शोभा पा रहे हैं। तुम्हारा मुख मन्द मुसकानसे सुशोभित है और तुम्हारे अधर बिम्बाफलके समान अरुण हैं। इस प्रकार तुम्हारा यह मुख भगवान् विष्णुके ही योग्य है। ऐसा मेरी बुद्धिका निश्चय है। तुम क्षीरसागरसे प्रकट हुई साक्षात् लक्ष्मीके समान दिखायी देती हो।

~~ ᴑ ~~

वेंकटाचलनिवासी श्रीहरि और पद्मावतीका विवाह

भगवान् वाराह कहते हैं—यों कहकर नारदजी पद्मिनी और उसकी सखियोंद्वारा सम्मानित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर सखियोंने पद्मिनीसे कहा—‘सखि! चलो वनमें फूल लानेके लिये चलें।’ यों कहकर आकाशराजकी कन्याके साथ वे सखियाँ वनमें गयीं और फूलोंको तोड़ती हुई इधर-उधर विचरने लगीं। फिर वे सब सखियाँ एक वनस्पतिके नीचे जा बैठीं। इसी समय उन्होंने चन्द्रमाके समान श्वेतवर्णवाले एक ऊँचे घोड़ेको देखा। उसके ऊपर श्यामवर्णका पुरुष सवार था, जिसकी आकृति और कान्ति कामदेवको भी लज्जित कर रही थी। उसके विशाल नेत्र पद्मपत्राकार कानोंके समीप पहुँचे हुए थे। उसने एक हाथमें दिव्य शार्ङ्ग धनुष और दूसरेमें सुवर्णमय बाण धारण कर रखा था। उसका कटिप्रदेश पीले रंगके रेशमी वस्त्रसे आच्छादित था। शरीरका मध्यभाग बहुत ही सुन्दर था। वह रत्ननिर्मित कंकण, बाजूबंद और करधनीसे सुशोभित था। उसकी छाती चौड़ी थी, जिससे उस पुरुषकी दक्षिणावर्तनाभि अधिक शोभा पा रही थी। उसका बायाँ कंधा स्वर्णमय यज्ञोपवीतसे चमक रहा था। इस प्रकार उस तरुणका सुन्दर रूप मनको मोह लेनेवाला था। उसे देखकर वे सब स्त्रियाँ चकित हो उठीं। वह घुड़सवार एक भेड़ियेको ढूँढ़ता हुआ वहाँ फूल तोड़नेवाली स्त्रियोंके समीप आया और उनसे पूछने लगा—‘इधर कोई भेड़िया आया है क्या?’ स्त्रियोंने उत्तर दिया—‘तुम धनुष धारण किये हमारे वनमें क्यों आये हो? यहाँके सभी मृग अवध्य हैं। आकाशराजके द्वारा सुरक्षित इस वनसे शीघ्र बाहर निकल जाओ।’ उनकी यह बात सुनकर सवार घोड़ेसे उतर पड़ा। उसने पूछा—‘तुम सब लोग कौन हो? यह कमलके समान रंगवाली परम सुन्दरी कन्या कौन है?’ उसका यह प्रश्न सुनकर एक सखीने उत्तर दिया—‘शूरवीर! ये हमारी स्वामिनी हैं। इनका नाम पद्मिनी है। ये आकाशराजकी पुत्री हैं, इनका प्रादुर्भाव पृथ्वीसे हुआ है। सुन्दर शरीरवाले पुरुष! तुम अपना परिचय दो। तुम्हारा नाम क्या है और निवासस्थान कहाँ है? तुम किसलिये यहाँ आये हो?’