भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 296

* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २६७


भगवान् विष्णु इस प्रकार बोले—देवर्षे! मैं तुम्हारे सन्तोषके लिये यहाँ समस्त देहधारियोंको प्रत्यक्ष दर्शन देता हुआ निवास करूँगा, परंतु यह विमान कभी किसीकी दृष्टिमें नहीं आवेगा। भगवान्‌का यह वचन सुनकर अगस्त्य मुनि प्रसन्न हो अपने आश्रमको चले गये। तबसे भगवान् विष्णु मुनियोंके ही ध्यानमें आनेवाले इस विमानपर मनुष्य आदि प्राणियोंकी दृष्टिके विषय होकर चतुर्भुज रूपसे निवास करते हैं और आगे भी निवास करते रहेंगे। स्कन्द-स्वामी सदा उनकी आराधना करते हैं और वायु देवता सेवामें संलग्न रहते हैं। एक समयकी बात है कि मित्रवर्माकी मनोरमा धर्मपत्नीके गर्भसे 'आकाश' नामक पुत्र हुआ, जो अपने कुलका आभूषण था। शकवंशमें उत्पन्न धरणी नामवाली कन्या राजकुमार आकाशकी धर्मपत्नी हुई। नृपश्रेष्ठ मित्रवर्माने अपने उस पुत्रको राज्यका सारा भार सौंपकर स्वयं वेंकटाचलके समीप पवित्र तपोवनको प्रस्थान किया। राजकुमार आकाश महान् चक्रवर्ती राजा हुए। वे एकपत्नीव्रती थे। केवल अपनी धर्मपत्नी धरणीके प्रति ही उनका मन अनुरक्त था। एक दिन उन्होंने यज्ञके लिये आरणी नदीके किनारे भूमिका शोधन कराया। जब सोनेके हलसे पृथ्वी जोती जाने लगी तब बीजकी मुट्ठी बिखेरते समय राजाने देखा, पृथ्वीसे एक कन्या प्रकट हुई है, जो कमलकी शय्यापर सोयी हुई है। वह बड़ी सुन्दरी और समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी, सोनेकी पुतली-सी शोभा पा रही थी। उसे देखकर राजाके नेत्र आश्चर्यसे खिल उठे। उन्होंने उसे गोदमें उठा लिया और 'यह मेरी ही पुत्री है' ऐसा बार-बार कहते हुए मन्त्रियोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए। इसी समय आकाशवाणी हुई—'राजन्! वास्तवमें यह तुम्हारी ही पुत्री है। इस सुन्दर नेत्रवाली कन्याका तुम पालन-पोषण करो।'

यह सुनकर राजाके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने अपने नगरमें प्रवेश किया और महारानी धरणीदेवीको बुलाकर कहा—'प्रिये! यह भगवान्‌की दी हुई अपनी कन्या है, इसे देखो। यह पृथ्वीसे प्रकट हुई है। हम दोनों सन्तानहीन हैं। हमारे लिये यही पुत्री होगी।' यों कहकर आकाशराजने रानीके हाथमें प्रेमपूर्वक वह कन्या दे दी। उस कन्याके घरमें प्रवेश करनेपर धरणीदेवीने भी गर्भ धारण किया और समय आनेपर उन्होंने उत्तम मुहूर्तमें पुत्रको जन्म दिया। उस समय पाँच ग्रह उच्च स्थानोंमें स्थित थे और सूर्यदेव मेष राशिपर विराजमान थे। उस पुत्रके जन्म-कालमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं तथा राजाके घरमें फूलोंकी वर्षा हुई। उस समय सुखदायिनी हवा चल रही थी। जिन लोगोंने महाराजको पुत्र-जन्मका समाचार सुनाया, उन्हें अत्यन्त प्रसन्न होकर उन्होंने जो कुछ उनके पास था, सब दे डाला। केवल छत्र और चामर रख लिया। एक करोड़ कपिला गौएँ और एक करोड़ एक सौ बैल दान किये। बारहवें दिनका पुण्य-मुहूर्त आनेपर उन्होंने जातकर्म आदि क्रियाएँ सम्पन्न कीं और स्वयं ही पुत्रका नाम वसुदान रखा।

पृथ्वीदेवी! आकाशराजका पुत्र वसुदान बड़ा ही सुन्दर था। वह बालक प्रतिदिन शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति बढ़ने लगा। वेदोंके पारंगत विद्वान् गुरुजनोंने उस विनयशील कुमारका उपनयन-संस्कार किया। पितासे ही उसने मन्त्रपूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंकी शिक्षा पायी। अंग और उपांगोंसहित धनुर्वेदके चारों पादोंका अध्ययन किया।

**पृथ्वीदेवीने पूछा—**भगवन्! आपने आकाशराजके पुत्रका नाम बताया। अब यह बतानेकी कृपा करें कि उनकी अयोनिजा कन्याका नाम उस समय क्या रखा गया था?

**भगवान् वाराहने कहा—**देवि! बुद्धिमान्