संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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घड़े दूध और दहीसे भरे हुए अनेकों भाण्ड, आम, केला और नारियलके दिव्य फल, आँवले, कूष्माण्ड, राजकदलीके फल, कटहल, बिजौरा नींबू, शक्करसे भरे हुए घड़े, सोना, मणि, मोती, करोड़ों रेशमी वस्त्र, हजारों दास-दासी, करोड़ों गाय, हंस और चन्द्रमाके समान श्वेत रंगके दस हजार घोड़े और सदा उन्मत्त रहनेवाले सौसे अधिक ऊँचे-ऊँचे हाथी—ये सारी वस्तुएँ भगवान् विष्णुको भेंट करके आकाशराज उनके आगे खड़े हुए।
पद्मावती और लक्ष्मीदेवीके साथ वेंकटनाथ भगवान् विष्णु दहेजकी वह सब सामग्री देखकर बड़े प्रसन्न हुए और अपने श्वसुरसे बोले—'राजन्! इस समय आप मेरे गुरु हैं। आपकी जो इच्छा हो मुझसे वर माँगिये।' भगवान्की यह बात सुनकर आकाशराजने कहा—'देव! इस संसारमें आपकी अनन्य सेवा ही मेरे द्वारा होती रहे, मेरा मन आपके चरणारविन्दोंमें रमता रहे और आपमें मेरी निरन्तर भक्ति बनी रहे।'
श्रीभगवान् बोले—राजेन्द्र! आपने जो कहा है, वह सब पूर्ण होगा। तत्पश्चात् ब्रह्मा आदि देवताओने और शुक आदि मुनिगणोंने भगवान् पुरुषोत्तमका स्तवन किया। फिर ब्रह्मा आदि सब देवताओंका यथायोग्य सत्कार करके श्रीहरिने उन्हें स्वर्गलोकमें जानेके लिये प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा दे दी। उन सबके चले जानेपर भगवान् नारायण स्वामिपुष्करिणीके तटपर लक्ष्मीदेवी और पद्मावतीके साथ अपने दिव्य धाममें रहने लगे।
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तोण्डमानको निषादके साथ भगवान् श्रीनिवासका दर्शन होना
पृथ्वीने पूछा— मुझे धारण करनेवाले प्रियतम! कलियुगमें आपका दर्शन किसको होगा तथा परम सुन्दर विग्रहवाले भगवान् श्रीनिवासका दर्शन भी किसे प्राप्त हो सकेगा? यह मुझे बतलाइये।
भगवान् वराह बोले— देवि! सुनो। जो भविष्यमें होनेवाली बात है उसे भूतकालकी भाँति बतला रहा हूँ। इस पवित्र पर्वतपर एक वसु नामक निषाद था, जो श्यामाक वन (सावाँके जंगल)-की रक्षा किया करता था। भगवान् पुरुषोत्तमके प्रति उसके मनमें बड़ी भक्ति थी। वह सावाँके चावलोंका भात बनाकर उसमें मधु मिला देता और श्रीदेवी तथा भूदेवीसहित देवाधिदेव भगवान् विष्णुको निवेदन करके स्वयं प्रसाद पाता था। इस प्रकार भक्ति करनेवाले उस निषादकी कल्याणमयी भार्या चित्रवतीने एक उत्तम पुत्रको जन्म दिया, जिसका नाम वीर था। वसु अपने पुत्र तथा पतिव्रता पत्नीके साथ आनन्दपूर्वक रहता था।
एक दिन वह अपने पुत्रको सावाँकी रक्षा करनेका आदेश दे स्वयं पत्नीके साथ मधुकी खोजमें चला। मधुका छाता देखनेकी इच्छासे वह एक वनसे दूसरे वनमें शीघ्रतापूर्वक चला जा रहा था। इधर उसके पुत्रने सावाँके तैयार किये हुए भातको लेकर कुछ अग्निमें डाल दिया और कुछ पीसकर वृक्षकी जड़में भगवान् श्रीपतिको भोग लगाया। फिर भगवान्का प्रसाद खाकर वीर वहाँ सुखसे बैठा रहा। तदनन्तर वसु मधु लेकर आया और सावाँके चावलोंको खाया हुआ देख अपने पुत्रको फटकारने लगा। उसने बड़ी उतावलीके साथ वीरको मार डालनेके लिये तलवार लेकर हाथको ऊपर उठाया। उस समय भगवान् विष्णु उस वृक्षपर ही विराजमान थे। उन्होंने वसुकी तलवार हाथसे पकड़ ली। तब उसने वृक्षकी ओर देखा। भगवान् विष्णु हाथमें शंख, चक्र