भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है और स्वामिपुष्करिणीके तटपर भगवान्‌के समीप विचरता रहता है। उस सुन्दर शुकको कोई भी पकड़ नहीं सकता। राजकुमार! अब मैं भगवान्‌की आराधनाके लिये जाऊँगा, जबतक मैं लौटकर न आऊँ तबतक आप यहीं वृक्षके नीचे विश्राम कीजिये।

राजा बोले—वनेचर! मैं भी तुम्हारे साथ भगवान् जनार्दनका दर्शन करनेके लिये चलूँगा। तुम मुझे वेंकटाचलनिवासी देवेश्वरका दर्शन कराओ।

राजाकी यह बात सुनकर निषादने मधुमिश्रित साँवाँका भात आमके पत्तेके दोनेमें रख लिया और राजाको भी साथ लेकर वह भगवान्‌के समीप गया। वहाँ राजासहित विधिपूर्वक स्नान करके निषादराजने स्वामिपुष्करिणीके तटपर बिल्ववृक्षके नीचे विराजमान भगवान् विष्णुका राजाको दर्शन कराया। उनके श्रीअंगोंकी कान्ति अलसीके फूलकी भाँति श्याम थी। कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल नेत्र थे। वे चार भुजाओंसे सुशोभित थे। उनके अंग-अंगसे उदारता प्रकट हो रही थी। मुखारविन्दपर मन्द-मन्द मुसकानकी छटा छा रही थी। उनके अंगोंपर दिव्य पीताम्बर शोभा पा रहा था। मस्तकपर किरीट और हाथोंमें कंकण आदि आभूषणोंसे उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। भगवान्‌के दोनों पार्श्वमें परमसुन्दरी श्रीदेवी और भूदेवी विराज रही थीं। शंख, चक्र, खड्ग, गदा, शार्ङ्गधनुष और बाण आदि आयुध मूर्तिमान् होकर सब ओरसे भगवान्‌की सेवामें उपस्थित थे। इस प्रकार उन पुरुषोत्तमका दर्शन करके उन दोनोंने आनन्दमग्न होकर उन्हें प्रणाम किया। निषादने भी मधुमिश्रित साँवाँका भात भगवान्‌को निवेदन किया। फिर राजाके साथ श्यामाक वनमें अपनी पवित्र पर्णकुटीपर वह लौट आया। राजा एक रात उसकी कुटीमें रहे और सबेरे उठकर अपनी सेनाके साथ पुनः नगरकी ओर लौटे। फिर देवीके वनमें जाकर वे घोड़ेसे उतरे और चैत्र शुक्ला नवमीको उन्होंने रेणुकादेवीका पूजन किया। उनसे पूजित होकर देवीने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया—'राजन्! तुम्हारा राज्य निष्कण्टक होगा। राजधानी तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगी। मेरे समीप तुम दीर्घकालतक राज्य करोगे और तुम्हारे ऊपर देवाधिदेव भगवान् विष्णुका कृपाप्रसाद सदा बना रहेगा।'

इस प्रकार वरदान पाकर राजा पुनः शुकमुनिके आश्रमपर गये और उन्हें प्रणाम करके उनके द्वारा सम्मानित हो हर्षको प्राप्त हुए। फिर उन्होंने मुनिसे कहा—'महर्षे! आप कमल्सरोवरका माहात्म्य बतलाइये।'

**श्रीशुक मुनिने कहा—**राजन्! यह कमल्सरोवर नामक तड़ाग सब पापोंका नाश करनेवाला है। कीर्तन, स्मरण और स्नान करनेसे यह मनुष्योंको इस पृथ्वीपर लक्ष्मी प्रदान करनेवाला होता है। तुम भी इसमें स्नान करके अपने पिताके समीप जाओ।

शुक मुनिका यह वचन सुनकर राजकुमारने कमल्सरोवरमें स्नान किया और मुनिको प्रणाम करके घोड़ेपर सवार हो अपने नगरको प्रस्थान किया। पिताने तोण्डमानको तीन वर्षके लिये युवराज बनाकर देख लिया कि मेरे पुत्रमें प्रजाको प्रसन्न रखनेकी योग्यता, सामर्थ्य, पराक्रम, शौर्य, सुशीलता और ब्राह्मणभक्ति है। तब उन्होंने मन्त्रियोंसे सलाह करके विधिपूर्वक पुत्रका राज्याभिषेक किया और उन्हें अपने पदपर स्थापित करके उनकी अनुमति ले राजा सुवीर वनमें चले गये। तोण्डमानने वह विशाल साम्राज्य पाकर धर्मपूर्वक राज्य किया।

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