भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 309

२८० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वाराहभगवान् तथा अस्थिसरोवर तीर्थकी महिमा, भक्त कुम्हार तथा राजा तोण्डमानका परमधामगमन

भगवान् वाराह कहते हैं—एक दिन निषादराज वसु तोण्डमानके द्वारपर आया। द्वारपालोंसे उसके आगमनकी सूचना पाकर महाराजने उसे दरबारमें बुलाया और मन्त्रियोंके साथ पुत्र और परिवारसहित उसका स्वागत-सत्कार किया। तत्पश्चात् प्रसन्न होकर उन्होंने वसुसे पूछा—‘वनेचर ! किस कार्यसे तुम्हारा यहाँ आगमन हुआ है?’

वसुने कहा—राजन् ! मैंने वनमें एक बड़े आश्चर्यकी बात देखी है, उसे सुनिये। रातमें कोई श्वेत रंगका वाराह आकर मेरा सावाँ चरने लगा। तब मैंने हाथमें धनुष लेकर उसका पीछा किया। खदेड़नेपर वह वायुके समान वेगसे भागा और मेरे देखते-देखते स्वामिपुष्करिणीके तटपर वल्मीकमें घुस गया। तब मैंने क्रोधवश उस वल्मीकको खोदना आरम्भ किया। इतनेमें ही मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसी समय मेरा यह पुत्र भी आ गया और मुझे पृथ्वीपर मूर्च्छित होकर पड़ा देख, पवित्र होकर देवाधिदेव भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगा। तब भगवान् वाराहका मुझमें आवेश हुआ, उन्होंने मेरे पुत्रसे कहा—‘निषादराज ! तुम शीघ्र राजाके पास जाकर मेरा सारा वृत्तान्त उनसे कहो। राजा काली गौके दूधसे अभिषेक करते हुए इस वल्मीकको धो डालें, तब इसके भीतर एक परमसुन्दर शिला दिखायी देगी। उसे लेकर किसी कारीगरसे मेरी मूर्ति बनवावें, जिसमें मैं भूमिदेवीको अपने बायें अंकमें लेकर खड़ा रहूँ और मेरा मुख सूकरके समान हो। मूर्ति तैयार हो जानेपर बड़े-बड़े मुनीश्वरों और वैखानस महात्माओंद्वारा उसकी स्थापना कराकर स्वयं तोण्डमान भी उसकी पूजा करें।’ यों कहकर भगवान् वाराहने मुझे छोड़ दिया, तब मैं स्वस्थ हो गया। देवाधिदेव भगवान् वाराह आपसे क्या कराना चाहते हैं, यह बतलानेके लिये ही मैं यहाँ आया हूँ।

राजा तोण्डमान भी यह सुनकर बहुत प्रसन्न और विस्मित हुए। तदनन्तर पुष्कर आदि मन्त्रियोंके साथ कार्यका निश्चय करके वेंकटाचल जानेका विचार किया और सब ग्वालोंको बुलाकर कहा—‘गोपगण ! जितनी भी मेरी काली और कपिला गौएँ हैं, उन सबको बछड़ोंसहित वेंकटाचलके समीप लाओ।’ गोपोंको ऐसी आज्ञा देकर राजाने मन्त्रियोंको सूचित किया—‘कल ही यात्रा करनी है।’ इसके बाद सब प्रजाको विदा करके जितेन्द्रिय राजाने अन्तःपुरमें प्रवेश किया और अपनी पत्नियोंसे वाराहजीकी वह कथा सुनाकर वे रातमें वहीं सोये। सपनेमें भगवान् श्रीनिवासने राजाको बिलका मार्ग दिखाया और उनके नगरसे लेकर बिलके अन्ततक मार्गमें पल्लव बिछा दिये। राजा यह स्वप्न देखकर जब सबेरे उठे, तब उन्होंने शीघ्र ही मन्त्रियों, प्रजाओं और ब्राह्मणोंको भी बुलाया। उन सबसे अपना देखा हुआ स्वप्न सुनाकर जब उन्होंने दरवाजेपर दृष्टि डाली, तब वहाँ पल्लव बिछे हुए दिखायी दिये। तब उपयुक्त मुहूर्तमें घोड़ेपर सवार हो राजा तोण्डमान घरसे चले और बिलके पास पहुँचकर वहीं उन्होंने नगर बनाया। उस समय देवाधिदेव भगवान्‌ने स्वयं राजाको यह आदेश दिया अर्थात् संकेत किया कि ‘इमली और चम्पा—ये दो वृक्ष बहुत उत्तम हैं, इनका पालन करो। इमली मेरा आश्रय है और चम्पा लक्ष्मीजीका स्थान है। अतः राजाओं, ऋषियों, देवताओं तथा मनुष्योंको इन दो वृक्षोंकी वन्दना करनी चाहिये।’

तोण्डमानसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णु चुप

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