संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २८१
हो गये। उनका वचन सुनकर राजाने चाहरदीवारी बनवायी और वैखानस कुलके मुनियोंसे पूजन कराया। वे प्रतिदिन बिलके मार्गसे आकर भगवान्को प्रणाम करते और लौट जाते थे। उन्होंने उत्तम भोग भोगते हुए धर्मपूर्वक राज्य किया। इसी समय दक्षिण देशके एक श्रेष्ठ ब्राह्मण गंगास्नानके लिये स्त्रीसहित घरसे चले। मार्गमें ब्राह्मणी गर्भवती हो गयी। उसे इस दशामें देखकर और अपने साथ चलनेमें असमर्थ जानकर ब्राह्मण देवता राजाके द्वारपर आये। द्वारपालसे उनके आगमनकी सूचना पाकर राजाने उन्हें दरबारमें बुलाया और उनकी विधिपूर्वक पूजा करके उनसे कुशल-समाचार पूछा—'ब्रह्मन्! आपके आगमनका क्या हेतु है? बताइये, मैं आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ?'
ब्राह्मणने कहा—नृपश्रेष्ठ! मैं वसिष्ठकुलमें उत्पन्न वीरशर्मा नामक सामवेदी ब्राह्मण हूँ। घरसे गंगास्नान करनेके लिये पत्नीको साथ लेकर निकला था। मार्गमें यह गर्भवती हो गयी। यह कुशिकवंशकी कन्या तथा बड़ी पुण्यशालिनी है। इसका नाम लक्ष्मी है। यह बड़ी सुशील और पतिव्रता है। इसे मैं आपके घरमें रखकर अपना व्रत पूर्ण करना चाहता हूँ। अतः जबतक मैं लौटकर न आ जाऊँ, तबतक आप इसकी रक्षा करें।
ब्राह्मणकी बात सुनकर राजाने छः महीनेके लिये चावल और धन देकर ब्राह्मणीके लिये अन्तःपुरमें एक घर दे दिया। अपनी पत्नीको वहाँ रखकर ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक गंगास्नानके लिये चले गये। उत्तम क्षेत्र प्रयागमें भागीरथी गंगाके तटपर पहुँचकर उन्होंने स्नान किया। वहाँसे काशीकी यात्रा की और वहाँ भी तीन दिनोंतक रहकर वे गया चले गये। वहाँ उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने अपने पितरोंका श्राद्ध किया। तत्पश्चात् अयोध्यापुरीकी यात्रा करके वे बद्रिकाश्रमको गये। फिर शालिग्राम-तीर्थका सेवन करके अपने देशकी ओर लौटे। इसीमें दो वर्ष बीत गये। वैशाखमासकी शुक्लपक्षीय एकादशी तिथिको वे पुनः राजाके पास गये। राजा ब्राह्मणीको भूल गये थे। उन्होंने उसका कभी स्मरण नहीं किया। ब्राह्मणी स्वाभिमानिनी थी, (छः महीने बाद अन्न समाप्त हो जानेपर भी वह माँगने नहीं गयी) घरमें ही मरकर सूख गयी थी। तदनन्तर वीरशर्मा ब्राह्मणने गंगाजलकी पिटारी खोलकर एक शीशी गंगाजल राजाको भेंट किया और पूछा—'मेरी धर्मपत्नी कुशलसे तो है न?' तब राजाने ब्राह्मणको स्मरण करके कहा, 'आप ठहरिये, मैं अभी आता हूँ।' यों कहकर उन्होंने अन्तःपुरमें जाकर देखा तो ब्राह्मणी घरमें मर गयी थी। ब्राह्मणको यह बात न बताकर राजाने उसी उत्तम बिलमें प्रवेश किया और श्री तथा भूदेवीके सहित भगवान् श्रीनिवासका दर्शन करनेके लिये वे वेंकटाचलपर गये। राजाको सहसा आते देख श्रीदेवी और भूदेवी—दोनों छिप गयीं। उन्हें प्रणाम करते देख भगवान्ने पूछा, 'राजन्! यह असमयमें तुम्हारा आगमन कैसे हुआ?' राजाने भयभीत होकर ब्राह्मणीकी मृत्युका वृत्तान्त बतलाया। उसे सुनकर देवदेव भगवान् विष्णुने कहा—'राजन्! उस श्रेष्ठ ब्राह्मणसे भय न करो। तुम ब्राह्मणीके शवको डोलीमें बैठाकर अपनी रानियोंके साथ यहाँ ले आओ और मेरे निवासस्थानसे पूर्व भागमें जो अस्थिसरोवर है, उसीमें द्वादशीको नहलाओ। वह सरोवर अपमृत्युका निवारण करनेवाला है। उसमें स्नान करके ब्राह्मणी जीवित हो जायगी और अन्य स्त्रियोंके साथ ही सरोवरसे बाहर निकलेगी। फिर उसका ब्राह्मणके साथ संयोग होगा।'
भगवान् श्रीनिवासका यह वचन सुनकर राजा अपने नगरमें गये और सुन्दर-सुन्दर डोलियोंमें अपनी रानियोंको तथा एक डोलीमें मरी हुई ब्राह्मणीको भी बैठाकर ब्राह्मणको आगे करके वहाँसे भगवान्का दर्शन करनेके लिये चले। अस्थिकूटसरोवरपर पहुँचकर राजाने उन सब