भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31
१०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लिये उद्यत हो अपने चारों मुकुटोंसे भगवान् शिवके चरणारविन्दोंका स्पर्श करते हुए उनकी स्तुति करने लगे।

ब्रह्माजी बोले— शान्तस्वरूप, सर्वत्र व्यापक, परब्रह्मरूप परमात्मा भगवान् रुद्रको नमस्कार है; मस्तकपर जटा-जूट धारण करनेवाले महान् ज्योतिर्मय महेश्वरको नमस्कार है। भगवन्! आप जगत्की सृष्टि करनेवाले प्रजापतियोंके भी स्रष्टा हैं। आप ही सबका धारण-पोषण करते हैं। आप सबके प्रपितामह हैं। आप ही रुद्र, महान्, नीलकण्ठ और वेधा हैं; आपको नमस्कार है। यह सम्पूर्ण विश्व आपका स्वरूप है। आप ही इसके बीज (आदिकारण) हैं। इस जगत्को आनन्दकी प्राप्ति करानेवाले भी आप ही हैं, आपको नमस्कार है। आप ही ओंकार, वषट्कार तथा सम्पूर्ण आयोजनोंके प्रवर्त्तक हैं। यज्ञ, यजमान और यज्ञ-प्रवर्त्तक भी आप ही हैं। प्रभो! देवेश्वर! यज्ञ-प्रवर्त्तक होकर भी आपने इस यज्ञका विनाश कैसे किया? महादेव! आप ब्राह्मणोंके हितैषी हैं, तो भी आपके द्वारा दक्षका वध कैसे हुआ? रुद्र! आप तो गौओं और ब्राह्मणोंके प्रतिपालक हैं। समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं। रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।

श्रीमहादेवजीने कहा— पितामह! सावधान होकर मेरी बात सुनिये, दक्ष अपने ही कर्मसे मारा गया। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इसलिये किसीको भी कदापि ऐसा कर्म नहीं करना चाहिये जो दूसरोंको क्लेश पहुँचानेवाला हो। ब्रह्मन्! जो दूसरोंको कष्ट देनेवाला कर्म किया जाता है, वह एक दिन अपने ही ऊपर आ पड़ता है।

यों कहकर भगवान् शंकर उस समय ब्रह्मा आदि देवताओंके साथ कनखल तीर्थमें, जहाँ प्रजापति दक्षका यज्ञमण्डप था, गये। वहाँ जाकर उन्होंने वीरभद्रके द्वारा जो कुछ किया गया था, सब देखा। स्वाहा, स्वधा, पूषा, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भृगु, अन्यान्य ऋषि, समस्त पितर, यक्ष, गन्धर्व और किन्नर—जो भी वहाँ जिस अवस्थामें पड़े थे, सबको भगवान् शिवने देखा। किसीके अंग-भंग हो गये थे, किसीकी दाढ़ी और मूँछें नोंच ली गयी थीं तथा कुछ लोग रणभूमिमें मरे पड़े थे। भगवान् शंकरको आया देख वीरभद्रने समस्त गणोंके साथ उनके चरणोंमें दण्डवत्-प्रणाम किया और वे सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये। महाबली वीरभद्रको अपने आगे खड़ा देख महादेवजीने हँसते हुए कहा—‘वीरवर! यह तुमने क्या किया? दक्षको शीघ्र यहाँ ले आओ, जिसने ऐसा यज्ञ किया और उसका वैसा ही विलक्षण फल भी प्राप्त किया।’

शंकरजीके यों कहनेपर वीरभद्रने बड़ी उतावलीके साथ दक्षका धड़ लाकर उनके सामने डाल दिया। तब शंकरजीने कहा—‘वीर! इस दुरात्मा दक्षका मस्तक कौन ले गया? यदि मिल जाय तो कुटिल होनेपर भी इसे मैं जीवित कर दूँगा।’ यह सुनकर वीरभद्र फिर बोले—‘भगवन्! मैंने उसी समय इसके मस्तकको अग्निमें होम दिया था, अब तो केवल पशुका सिर बचा है। किंतु उसका मुख बहुत विकृत हो गया है।’ ये सब बातें जानकर भगवान् शिवने पशुके भयंकर मुखको, जिसमें दाढ़ी भी लगी थी, दक्षके धड़से जोड़ दिया। इस प्रकार भगवान् शंकरकी कृपासे दक्षको नया जीवन प्राप्त हुआ। दक्ष अपने सामने भगवान् रुद्रको उपस्थित देख लज्जासे गड़ गये, उन्होंने लोक-कल्याणकारी भगवान् शंकरके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उनका स्तवन किया।

दक्ष बोले— सबको वर देनेवाले सर्वश्रेष्ठ देव भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। सनातन देवता शिवको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। देवताओंके पालक और ईश्वर, पापहारी हरको मैं प्रणाम करता हूँ। जगत्के एकमात्र बन्धु शम्भुको मैं नमस्कार करता हूँ। जो सम्पूर्ण विश्वके स्वामी, विश्वरूप, सनातन ब्रह्म और स्वात्मरूप हैं, उन

संक्षिप्त स्कन्द पुराण · पृष्ठ 31, कुल 1406 में से · BharatKosha