भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 32

* माहेश्वरखण्ड-केदारखण्ड * ९१


भगवान् शिवको मैं शीश झुकाता हूँ। अपनी भक्तिसे प्राप्त होने योग्य सर्वरूप भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जो वरदायक हैं, वरस्वरूप हैं और वरण करनेयोग्य हैं, उन भगवान् शिवको मैं मस्तक नवाता हूँ।^१

दक्षके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शंकरने कहा—सुरश्रेष्ठ! चार प्रकारके पुण्यात्मा जन मेरा सदा भजन करते हैं—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी। (इन सबमें ज्ञानी श्रेष्ठ है।) इसलिये समस्त ज्ञानी पुरुष मुझे विशेष प्रिय हैं। इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जो ज्ञानके बिना ही मुझे पानेका यत्न करते हैं, वे अज्ञानी हैं। तुम केवल यज्ञादि कर्मके द्वारा संसार-सागरके पार जाना चाहते हो; परंतु कर्ममें आसक्त हुए मूढ़ पुरुष वेद, यज्ञ, दान और तपस्यासे भी मुझे कभी नहीं प्राप्त कर सकते। अतएव तुम अन्तःकरणको एकाग्र करके ज्ञाननिष्ठ होकर कर्म करो। सुख और दुःखमें समान भाव रखकर सदा प्रसन्न रहो।^२

तदनन्तर दक्षको वहीं कनखल तीर्थमें रहनेका आदेश देकर भगवान् शिव अपने निवास-स्थान कैलास पर्वतपर चले गये। फिर ब्रह्माजीने भृगु आदि सम्पूर्ण महर्षियोंको आश्वासन तथा बोध प्रदान किया। वे सब ऋषि-मुनि तत्क्षण ज्ञानी हो गये। इसके बाद पितामह ब्रह्माजी अपने धामको गये। इधर प्रजापति दक्षको भगवान् शंकरके उपदेशसे उत्तम ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी। वे शिवजीके ध्यानमें तत्पर होकर तपस्या करने लगे। इसलिये सर्वथा प्रयत्न करके सबको भगवान् शंकरकी आराधना करनी चाहिये।


१. नमामि देवं वरदं वरेण्यं नमामि देवं च सदा सनातनम्।
नमामि देवाधिपमीश्वरं हरं नमामि शम्भुं जगदेकबन्धुम्॥
नमामि विश्वेश्वरविश्वरूपं सनातनं ब्रह्म निजात्मरूपम्।
नमामि सर्वं निजभावगम्यं वरं वरेण्यं वरदं नतोऽस्मि॥
(स्क० पु०, मा० के० ५।३९-४०)

२. दक्षेण संस्तुतो रुद्रो बभाषे प्रहसन् हरः॥
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनः सदा । आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च सुरसत्तम॥
तस्मान्मे ज्ञानिनः सर्वे प्रियाः स्युर्नात्र संशयः । विना ज्ञानेन मां प्राप्तुं यतन्ते ते हि बालिशाः॥
केवलं कर्मणा त्वं हि संसारं तर्तुमिच्छसि । न वेदैश्च न यज्ञैश्च न दानैस्तपसा क्वचित्॥
न शक्नुवन्ति मां प्राप्तुं मूढाः कर्मवशा नराः । तस्माज्ज्ञानपरो भूत्वा कुरु कर्म समाहितः॥
सुखदुःखसमो भूत्वा सुखी भव निरन्तरम्॥
(स्क० पु०, मा० के० ५।४१—४६)