संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पालन और पृथ्वीकी रक्षा करो।' पुत्रको यह आज्ञा देकर बुद्धिमान् राजाने बड़ी भारी तपस्या की। तपस्या करते समय भगवान्ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। वे श्री तथा भूदेवियोंके साथ गरुड़पर आरूढ़ होकर वहाँ आये थे।
श्रीभगवान् बोले—नृपश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत सन्तुष्ट हूँ, बोलो—तुम्हारी किस इच्छाको पूर्ण करूँ?
देवाधिदेव भगवान्के ऐसा कहनेपर सम्राट् तोण्डमान अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़कर गद्गद वाणीमें बोले—'माधव! मैं आपके जरा-मृत्यु-रहित धाममें निवास करना चाहता हूँ, मुझे यही मनोवांछित वरदान दीजिये।' ऐसा कहकर राजा भगवान्के समीप पृथ्वीपर साष्टांग पड़ गये और शरीर त्यागकर विमानपर जा बैठे। उस समय गन्धर्वगण उनकी स्तुति कर रहे थे। राजा भगवान् विष्णुका सारूप्य प्राप्त करके शोक-मोहरहित, जरा-मरणवर्जित तथा पुनरावृत्तिशून्य वैकुण्ठधामको चले गये।
सूतजी कहते हैं—देवाधिदेव भगवान् वाराहके द्वारा कहे हुए इस भविष्य-प्रसंगको जो सुनता है तथा पुण्यमयी पुराणकथाका भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह सब कामनाओंको भोगकर अन्तमें भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है।
## राजा परीक्षित्को ब्राह्मणका शाप, तक्षकके काटनेसे उनकी मृत्यु तथा उनकी रक्षा न करनेके पापसे कलंकित काश्यप ब्राह्मणका स्वामिपुष्करिणीमें स्नान करके शुद्ध होना
श्रीसूतजी कहते हैं—महर्षियो! अब मैं श्रीस्वामिपुष्करिणीके माहात्म्यका प्रतिपादन करनेवाला इतिहास कहता हूँ, जो इसे पढ़नेवालोंके भी पापका नाश करनेवाला है। अभिमन्युके पुत्र राजा परीक्षित् धर्मके अनुसार इस पृथ्वीका पालन करते हुए हस्तिनापुरमें निवास करते थे। एक समय वे मृगयामें अनुरक्त होकर वनमें घूम रहे थे। उस समय उनकी अवस्था साठ वर्षकी हो गयी थी। वे भूख और प्याससे पीड़ित थे। घूमते-घूमते उन्होंने एक ध्यानमग्न मुनिको देखकर पूछा—'मुने! मैंने इस समय वनमें अपने बाणसे एक मृगको घायल किया है। वह भयसे कातर होकर भाग गया है। क्या आपने उसे देखा है?' मुनिकी समाधि लग गयी थी, उन्होंने मौन रहनेका व्रत भी लिया था, इस कारण राजाको कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब राजाने कुपित हो एक मरे हुए साँपको धनुषसे उठाकर मुनिके कंधेपर रख दिया और अपने नगरकी राह ली। मुनिके एक पुत्र था, जिसका नाम शृंगी रखा गया था। शृंगीके कृष नामवाला कोई श्रेष्ठ द्विज मित्र था। उसने विवादमें अपने मित्र शृंगीसे व्यंगपूर्वक कहा—'सखे! तुम्हारे पिता इस समय मरा हुआ साँप कंधेपर ढो रहे हैं। तुम बहुत घमंड न दिखाया करो और मेरे आगे यह व्यर्थ क्रोध न किया करो।'
यह सुनकर शृंगी कुपित हो उठा और शाप देते हुए बोला—'जिस मूढ़बुद्धि मानवने मेरे पिताके कंधेपर मरा हुआ साँप रखा है, वह सातवें दिन तक्षक नागके काटनेपर मृत्युको प्राप्त होगा।' इस प्रकार उस मुनिकुमारने उत्तरानन्दन परीक्षित्को शाप दे दिया। उसके पिता शमीक मुनिने जब यह सुना कि मेरे पुत्रने राजाको शाप दिया है, तब वे उससे बोले—'अरे! समस्त लोगोंकी रक्षा करनेवाले राजाको तूने क्यों शाप दिया? राजाके न रहनेपर हमलोग संसारमें सुखपूर्वक कैसे रह