भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 314

* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २८५


सकेंगे? क्रोधसे पाप होता है और दयासे सुख मिलता है। जो मनुष्य मनमें आये हुए क्रोधको क्षमासे शान्त कर देता है, वह इहलोक और परलोकमें भी अतिशय सुखका भागी होता है। क्षमायुक्त मनुष्य ही उत्तम श्रेय प्राप्त करते हैं।' बेटेको इस प्रकार समझाकर शमीकने दौर्मुख नामवाले अपने शिष्यसे कहा—'वत्स दौर्मुख! तुम जाकर राजा परीक्षित्‌से मेरे पुत्रके दिये हुए शापका वृत्तान्त, जिसमें तक्षक नागके डँसनेकी बात है, बता दो। महामते! फिर शीघ्र मेरे पास लौट आना।'

शमीकके ऐसा कहनेपर दौर्मुखने उत्तराकुमार राजा परीक्षित्‌के पास जाकर कहा—राजन्‌! आपके द्वारा पिताके कंधेपर रखे हुए मृतक सर्पको देखकर, शमीकके पुत्र शृंगी ऋषिने रोषमें आकर आपको यों शाप दिया है—'आजसे सातवें दिन अभिमन्युपुत्र परीक्षित् महानाग तक्षकके काटनेपर उसकी विषाग्निसे जलकर भस्म हो जायँ।' राजासे ऐसा कहकर दौर्मुख शीघ्र लौट गया। उसके जानेपर राजाने गंगाकी बीच धारामें एक ही खंभेका एक बहुत ऊँचा और विस्तृत मण्डप बनवाया और भगवान्‌ विष्णुके प्रति भक्तिभाव बढ़ाते हुए अनेक देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा राजर्षियोंके साथ वे उस ऊँचे मण्डपमें रहने लगे। उसी अवसरपर मन्त्र जाननेवालोंमें श्रेष्ठ काश्यप नामवाला ब्राह्मण तक्षकके महान् विषसे राजाकी प्राणरक्षा करनेके लिये सातवें दिन वहाँ जा रहा था। दरिद्र होनेके कारण वह राजासे धन पानेकी इच्छा रखता था। इसी बीचमें तक्षक नाग भी ब्राह्मणका रूप धारण करके आ गया। मार्गमें काश्यपको देखकर उसने पूछा—'ब्रह्मन्‌! महामुने! तुम कहाँ जाते हो? मुझे बताओ।' काश्यपने उत्तर दिया—आज महाराज परीक्षित्‌को तक्षक नाग अपनी विषाग्निसे जलायेगा। उसकी विषाग्निको शान्त करनेके लिये मैं महाराजके समीप जाता हूँ।'


तक्षक बोला—विप्रवर! मैं ही तक्षक हूँ। मैं जिसे काट लूँ, उसकी चिकित्सा सौ वर्षोंमें भी, दस हजार महामन्त्रोंसे भी नहीं हो सकती। यदि तुममें मेरे काटे हुए को भी अपनी चिकित्साद्वारा जिला देनेकी शक्ति है, तो बहुत ऊँचे इस वृक्षको मैं डँसता हूँ, तुम जिला दो।

यों कहकर तक्षकने उस वृक्षको काट लिया। उसके डँसते ही वह अत्यन्त ऊँचा वृक्ष जलकर भस्म हो गया। उस वृक्षपर पहलेसे ही कोई मनुष्य चढ़ा हुआ था, वह भी तक्षकके विषकी ज्वालाओंसे दग्ध हो गया। तब मन्त्रज्ञोंमें श्रेष्ठ काश्यपने अपनी मन्त्रशक्तिसे उस जले हुए वृक्षको भी जिला दिया। उसके साथ ही वह मनुष्य भी जी उठा। यह देख तक्षकने मन्त्रकुशल काश्यपसे कहा—'ब्रह्मन्‌! राजा तुम्हें जितना धन दे सकते हैं, उससे दूना मैं देता हूँ। इसे लेकर शीघ्र लौट जाओ।' यों कहकर तक्षकने उसे बहुमूल्य रत्न देकर लौटा दिया।

तत्पश्चात् तक्षकने सब सर्पोंको बुलाकर कहा—'तुम सब लोग मुनियोंके वेष धारण करके राजाके पास जाओ और उन्हें भेंटमें फल समर्पित

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