भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 1406 में से

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२८६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

करो।' 'बहुत अच्छा' कहकर सभी राजाको फल देने लगे। उस समय तक्षक भी किसी बेरके फलमें कृमिका रूप धारण करके राजाको डँसनेके लिये बैठ गया। ब्राह्मणरूपी सर्पोंके दिये हुए सभी फल राजा परीक्षित्‌ने बूढ़े मन्त्रियोंको देकर कौतूहलवश एक मोटे फलको हाथमें ले लिया। इसी समय सूर्य भी अस्ताचलपर पहुँच गये। उस फलमें सब लोगोंने तथा राजाने भी एक लाल रंगका कीट देखा, वही तक्षक था। उसने शीघ्र ही फलसे निकलकर राजाके शरीरको लपेट लिया। यह देख आसपास बैठे हुए सब लोग भयसे भाग गये। ब्राह्मणो! तक्षककी अत्यन्त प्रबल विषाग्निसे राजा परीक्षित् मण्डपसहित तत्काल जलकर भस्म हो गये। पुरोहित और मन्त्रियोंने उनका और्ध्वदेहिक संस्कार करके प्रजाकी रक्षाके लिये उनके पुत्र जनमेजयको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया।

तक्षकसे राजाकी रक्षा करनेके लिये जो काश्यप नामक ब्राह्मण आया था, उसकी सब लोग निन्दा करने लगे। अन्तमें वह शाकल्य मुनिकी शरणमें गया और उन्हें प्रणाम करके बोला—'भगवन्! आप सब धर्मोंके ज्ञाता और भगवान् विष्णुके प्रिय भक्त हैं। ये मुनि, ब्राह्मण, सुहृद् तथा अन्य लोग जो मेरी निन्दा करते हैं, इसका क्या कारण है, यह मैं नहीं जानता। यदि आप जानते हों तो बतायें।' तब महामुनि शाकल्यने क्षणभर ध्यान करके काश्यपसे कहा—'तुम तक्षकसे महाराज परीक्षित्‌को बचानेके लिये जा रहे थे, किंतु आधे मार्गमें तक्षकने तुम्हें मना कर दिया। जो मनुष्य विष, रोग आदिकी चिकित्सा करनेमें समर्थ होकर भी काम, क्रोध, भय, लोभ, मात्सर्य अथवा मोहसे विष एवं रोगसे पीड़ित मनुष्यकी रक्षा नहीं करता, वह ब्रह्महत्यारा, शराबी, चोर, गुरुपत्नीगामी तथा इन सबके संसर्गदोषसे दूषित है। उसके उद्धारका कोई उपाय नहीं है। महाराज परीक्षित् पवित्र यशवाले, धर्मात्मा, विष्णुभक्त, महायोगी तथा चारों वर्णोंकी रक्षा करनेवाले थे। उन्होंने व्यासपुत्र शुकदेवजीसे भक्तिपूर्वक श्रीमद्भागवतकी कथा सुनी थी। ऐसे पुण्यात्मा राजाकी रक्षा न करके जो तुम तक्षकके कहनेसे (धन लेकर) लौट गये उसी कारणसे श्रेष्ठ ब्राह्मण और बन्धु-बान्धव तुम्हारी निन्दा करते हैं। मरनेवाले मनुष्यके प्राण जबतक कण्ठमें रहते हैं, तबतक उसकी चिकित्सा करनी चाहिये। तुम चिकित्सा करनेमें समर्थ होकर भी उनकी दवा किये बिना ही आधे मार्गसे लौट आये। इसलिये तुम वास्तवमें निन्दाके पात्र हो।'

काश्यप बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शाकल्यजी! मेरे दोषकी शान्तिके लिये कोई उपाय बताइये। जिससे मेरे बन्धु-बान्धव और सुहृद् मुझे ग्रहण करें। आप भगवान्‌के प्रिय भक्त हैं, मुझपर अवश्य कृपा करें।

तब मुनिवर शाकल्यने क्षणभर ध्यान करके कृपापूर्वक काश्यपसे कहा—ब्रह्मन्! इस पापकी शान्तिके लिये मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ। सुवर्णमुखरी नदीके तटपर भगवान् लक्ष्मीपतिकी निवासभूमि है, उसका नाम वेंकटाचल है, जो सब लोगोंमें पूजित है। उसका दूसरा नाम शेषाचल भी है। वह परमपवित्र तथा देवता और दानवोंसे भी वन्दित है। ब्रह्महत्या, सुरापान तथा सुवर्णकी चोरी आदि बड़े-बड़े पापोंका वह नाश करनेवाला है। उसी पर्वतपर स्वामिपुष्करिणी है, जो सब पापोंका निवारण करनेवाली है। वह मंगलदायिनी पुष्करिणी भगवान् श्रीनिवासके स्थानसे उत्तर दिशामें है। तुम वेंकटाचलपर जाकर कल्याणमयी स्वामिपुष्करिणीमें संकल्पपूर्वक स्नान करो। फिर पश्चिम तटपर बसे हुए वाराह-स्वामीकी सेवा करके भगवान्‌के मुख्य मन्दिरमें

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