संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 334, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड *
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बुद्धिमान् राजा द्रुपदसे उनकी पुत्री याज्ञसेनीको पाकर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे हस्तिनापुरमें गये। वहाँ पितामह भीष्म तथा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रके द्वारा सम्मानित होकर उन्होंने दुर्योधन आदिके साथ पाँच वर्षोंतक निवास किया। तदनन्तर भीष्म आदिके समझानेसे महायशस्वी धृतराष्ट्रने अपने कुलके सभी बड़े-बूढ़ोंके सामने और भगवान् श्रीकृष्णके आगे पाण्डवोंकी सेवासे प्रसन्न हो, उन्हें आधे राज्यके साथ खाण्डवप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली) नामक नगर प्रदान किया। तब धृतराष्ट्र आदि कौरवोंकी अनुमति ले सब पाण्डव श्रीकृष्णके साथ खाण्डवप्रस्थमें चले गये। वहाँ विश्वकर्मासे सुरक्षित इन्द्रप्रस्थ नामक पुरमें रहते हुए भाइयोंसहित युधिष्ठिरने पृथ्वीका पालन किया। भगवान् श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर धर्मके जाननेवाले कुन्तीपुत्रोंने नारदजीके उपदेशसे द्रौपदीके विषयमें यह प्रतिज्ञा की कि द्रौपदी क्रमशः एक-एक वर्ष एक-एक पाण्डवके घरमें निवास करेगी। इस निर्णयके बाद जो दूसरे भाईके घरमें रहती हुई पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीको देख लेगा, उसे एक वर्षतक तीर्थ-सेवन करना पड़ेगा। इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे पाण्डव आलस्य छोड़कर सामान्य लौकिक व्यापारोंमें संलग्न हो समय व्यतीत करने लगे।
तदनन्तर एक दिन उसी जनपदके निवासी ब्राह्मणने राजाके आँगनमें खड़े होकर कई बार पुकार लगायी—'महाराज! चोरोंने मेरी गाय चुरा ली।' उसकी आवाज सुनकर अर्जुन वहाँ आये और ब्राह्मणको सान्त्वना देकर अपने अस्त्र-शस्त्र लानेके लिये शीघ्रतापूर्वक शस्त्रागारको गये। वहाँ उन्होंने द्रौपदी और राजा युधिष्ठिरको एक जगह बैठे देखा। इस विषयमें की हुई प्रतिज्ञाको जानते हुए भी उन्होंने वहाँसे धनुष और बाण ले लिये और युद्धमें लुटेरोंको मारकर ब्राह्मणकी गाय लौटा ली। फिर उसे ले जाकर ब्राह्मणको आदरपूर्वक समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् अर्जुनने धर्मनन्दन युधिष्ठिरको सूचित किया कि मेरे द्वारा प्रतिज्ञाका उल्लंघन हुआ है, इसलिये मुझे तीर्थयात्रा करनी चाहिये।
अपने छोटे भाईकी बात सुनकर सब धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ धर्मनन्दन युधिष्ठिरने आदरपूर्वक कहा, 'सुव्रत! तुमने ब्राह्मण और गायके लिये ऐसा किया है। प्रजाकी रक्षा करना राजाका कर्तव्य है; यदि उसके द्वारा चोरोंकी उपेक्षा हो जाय तो उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है और चोरोंको दण्ड देनेपर वह पुण्यका भागी होता है। तुमने राजा और प्रजा दोनोंके लिये जो हितकर कार्य है, वही किया है; इसलिये तुम्हारा दोष नहीं है।' धर्मराजका यह वचन सुनकर सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले अर्जुनने हाथ जोड़कर कहा, 'भूपाल! आप ऐसी बात न कहें, आप धर्मके सर्वस्वको जानते हैं, धर्मके साक्षात् स्वरूप हैं तथा कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञाता हैं। समर्थ पुरुषको अपनी की हुई प्रतिज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिये। आर्य! यदि मुझपर दया करके मुझे तीर्थोंमें जानेसे रोक देंगे, तो संसारके मनुष्य यदि मुझे हतप्रतिज्ञ कहने लगें, तो उन्हें कौन रोक सकता है। मेरा मन भी तीर्थयात्राकी उत्कण्ठासे उतावला हो रहा है। राजन्! नारदजीने जो अनुशासन किया है, वह हमारे लिये सर्वथा कर्तव्य है। अतः महाराज! तीर्थयात्राके लिये मैंने जो यह उद्योग किया है, इससे आपको प्रसन्न होना चाहिये। स्वामीको सेवकोंकी प्रतिज्ञाका उनके द्वारा निर्वाह करवाना चाहिये।'
तब भाइयोंकी सलाह ले 'बहुत अच्छा' कहकर युधिष्ठिरने अर्जुनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। अर्जुनने प्रणाम और विनय आदिके द्वारा अपने बड़े भाईको सन्तुष्ट किया। फिर यथायोग्य भीमसेन आदि बन्धुओंसे भी विदा ले, ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अर्जुनने वहाँसे