भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 333

३०४

  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्थान हिंसक जन्तुओंसे घिरा हो तथा जिस घरमें जुआ खेला जाता हो, वहाँ विद्वान् पुरुष पवित्र कथा न कहे। जो उत्तम ग्राम हो, जहाँ अच्छे लोग बसते हों, जो उत्तम क्षेत्र, पवित्र देवालय अथवा नदीका पवित्र तट हो, वहीं विद्वान् पुरुष पवित्र कथा बाँचे। जो श्रद्धा और भक्तिसे युक्त हों, अन्य कार्योंमें जिनका मन न लगा हो तथा जो मौन, पवित्र और शान्त भावसे सुनते हों ऐसे श्रोता पुण्यके भागी होते हैं। जो अधम मनुष्य बिना भक्ति-भावके पवित्र कथा सुनते हैं, उनको पुण्य फलकी प्राप्ति नहीं होती। जो पान चबाते हुए भगवान्‌की पवित्र कथा सुनते हैं, वे नरकमें पड़ते हैं। जो पाखण्डी ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे नरकोंको भोगकर अन्तमें कौवे होते हैं। जो वीरासन लगाकर अथवा सिंहासनपर बैठकर भगवान्‌की कथा सुनते हैं, वे टेढ़े-मेढ़े वृक्ष होते हैं। जो प्रणाम न करके कथा सुनते हैं, वे विषवृक्ष होते हैं और जो स्वस्थ होकर भी सोकर कथा सुनते हैं, वे अजगर होते हैं। जो वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह पापका भागी होकर नरकमें पड़ता है। जो पुराणके ज्ञाता विद्वान्‌की तथा सब पापोंका नाश करनेवाली उत्तम कथाकी निन्दा करते हैं, वे कुत्ते होते हैं। जब कथा बाँची जाती हो, उस समय जो दुष्टतापूर्ण उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं, वे गधे होते हैं तथा उसके बाद गिरगिटकी योनिमें जन्म लेते हैं। जो कथा होते समय उसमें विघ्न डालते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक भोगकर अन्तमें ग्राम-सूकर होते हैं। जो नरश्रेष्ठ पुराणवेत्ता विद्वान्‌के बैठनेके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र तथा चौकी देते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर मनोवांछित भोगोंको भोगकर ब्रह्मादि देवताओंके लोकोंमें स्थित होते और निरामय पदको प्राप्त हो जाते हैं। जो पुराणके बेठनके लिये सूत और नया कपड़ा देते हैं, वे प्रत्येक जन्ममें भोगवान् और ज्ञानसम्पन्न होते हैं।

इस प्रकार वेंकटाचलके माहात्म्यको सुनकर सब ऋषियोंने पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीका यथायोग्य सम्मान करके अनुपम हर्ष प्राप्त किया।

ऋषि बोले— सूतजी ! अब हमलोग कटाह-तीर्थका माहात्म्य सुनना चाहते हैं।

सूतजी बोले— विप्रवरो ! कटाहतीर्थ सब लोकोंमें प्रसिद्ध है। वह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको देनेवाला, शुद्ध तथा सब पापोंका नाश करनेवाला है। उससे दुःस्वप्नोंका नाश हो जाता है। वह महापातकोंका नाश करनेवाला, बड़े-बड़े विघ्नोंका निवारण करनेवाला तथा मनुष्योंको परम शान्ति देनेवाला है। कटाहतीर्थ स्मरण करनेमात्रसे सब पापोंका संहार कर देता है। अतः 'केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः'—इन नामोंसे पृथक्-पृथक् उस तीर्थके जलका आचमन करे। अथवा तीनों नामोंसे एक ही बार उस तीर्थके कल्याणप्रद जलका पान करे अथवा भगवान् वेंकटेश्वरके अष्टाक्षर मन्त्रसे भोग, मोक्ष प्रदान करनेवाले उक्त तीर्थका जल पीये। पहले यह प्रार्थना करे कि हे तीर्थवर ! जन्मान्तरमें किये हुए मेरे महापापका शीघ्र नाश करो। उसके बाद मोक्षमार्गके एकमात्र साधन कटाहतीर्थके जलका नित्य पान करे। स्वामिपुष्करिणी-तीर्थका स्नान, वाराह स्वामीका दर्शन और कटाहतीर्थके जलका पान—ये तीन बातें त्रिलोकीमें दुर्लभ हैं। कटाहतीर्थका यत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये; क्योंकि उस तीर्थका परम उत्तम जल पीकर पापी भी कृतार्थ हो जाते हैं। ब्राह्मणो ! कटाहतीर्थका माहात्म्य मैंने जैसा सुना था, उसी प्रकार तुम्हें बताया है।

अब मैं एक दिव्य पापनाशक कथा सुनाता हूँ, तुम सब लोग सावधान होकर सुनो। द्वापरकी बात है। कुन्तीके पुत्र पाँचों पाण्डव परम