संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्थान हिंसक जन्तुओंसे घिरा हो तथा जिस घरमें जुआ खेला जाता हो, वहाँ विद्वान् पुरुष पवित्र कथा न कहे। जो उत्तम ग्राम हो, जहाँ अच्छे लोग बसते हों, जो उत्तम क्षेत्र, पवित्र देवालय अथवा नदीका पवित्र तट हो, वहीं विद्वान् पुरुष पवित्र कथा बाँचे। जो श्रद्धा और भक्तिसे युक्त हों, अन्य कार्योंमें जिनका मन न लगा हो तथा जो मौन, पवित्र और शान्त भावसे सुनते हों ऐसे श्रोता पुण्यके भागी होते हैं। जो अधम मनुष्य बिना भक्ति-भावके पवित्र कथा सुनते हैं, उनको पुण्य फलकी प्राप्ति नहीं होती। जो पान चबाते हुए भगवान्की पवित्र कथा सुनते हैं, वे नरकमें पड़ते हैं। जो पाखण्डी ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे नरकोंको भोगकर अन्तमें कौवे होते हैं। जो वीरासन लगाकर अथवा सिंहासनपर बैठकर भगवान्की कथा सुनते हैं, वे टेढ़े-मेढ़े वृक्ष होते हैं। जो प्रणाम न करके कथा सुनते हैं, वे विषवृक्ष होते हैं और जो स्वस्थ होकर भी सोकर कथा सुनते हैं, वे अजगर होते हैं। जो वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह पापका भागी होकर नरकमें पड़ता है। जो पुराणके ज्ञाता विद्वान्की तथा सब पापोंका नाश करनेवाली उत्तम कथाकी निन्दा करते हैं, वे कुत्ते होते हैं। जब कथा बाँची जाती हो, उस समय जो दुष्टतापूर्ण उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं, वे गधे होते हैं तथा उसके बाद गिरगिटकी योनिमें जन्म लेते हैं। जो कथा होते समय उसमें विघ्न डालते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक भोगकर अन्तमें ग्राम-सूकर होते हैं। जो नरश्रेष्ठ पुराणवेत्ता विद्वान्के बैठनेके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र तथा चौकी देते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर मनोवांछित भोगोंको भोगकर ब्रह्मादि देवताओंके लोकोंमें स्थित होते और निरामय पदको प्राप्त हो जाते हैं। जो पुराणके बेठनके लिये सूत और नया कपड़ा देते हैं, वे प्रत्येक जन्ममें भोगवान् और ज्ञानसम्पन्न होते हैं।
इस प्रकार वेंकटाचलके माहात्म्यको सुनकर सब ऋषियोंने पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीका यथायोग्य सम्मान करके अनुपम हर्ष प्राप्त किया।
ऋषि बोले— सूतजी ! अब हमलोग कटाह-तीर्थका माहात्म्य सुनना चाहते हैं।
सूतजी बोले— विप्रवरो ! कटाहतीर्थ सब लोकोंमें प्रसिद्ध है। वह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको देनेवाला, शुद्ध तथा सब पापोंका नाश करनेवाला है। उससे दुःस्वप्नोंका नाश हो जाता है। वह महापातकोंका नाश करनेवाला, बड़े-बड़े विघ्नोंका निवारण करनेवाला तथा मनुष्योंको परम शान्ति देनेवाला है। कटाहतीर्थ स्मरण करनेमात्रसे सब पापोंका संहार कर देता है। अतः 'केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः'—इन नामोंसे पृथक्-पृथक् उस तीर्थके जलका आचमन करे। अथवा तीनों नामोंसे एक ही बार उस तीर्थके कल्याणप्रद जलका पान करे अथवा भगवान् वेंकटेश्वरके अष्टाक्षर मन्त्रसे भोग, मोक्ष प्रदान करनेवाले उक्त तीर्थका जल पीये। पहले यह प्रार्थना करे कि हे तीर्थवर ! जन्मान्तरमें किये हुए मेरे महापापका शीघ्र नाश करो। उसके बाद मोक्षमार्गके एकमात्र साधन कटाहतीर्थके जलका नित्य पान करे। स्वामिपुष्करिणी-तीर्थका स्नान, वाराह स्वामीका दर्शन और कटाहतीर्थके जलका पान—ये तीन बातें त्रिलोकीमें दुर्लभ हैं। कटाहतीर्थका यत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये; क्योंकि उस तीर्थका परम उत्तम जल पीकर पापी भी कृतार्थ हो जाते हैं। ब्राह्मणो ! कटाहतीर्थका माहात्म्य मैंने जैसा सुना था, उसी प्रकार तुम्हें बताया है।
अब मैं एक दिव्य पापनाशक कथा सुनाता हूँ, तुम सब लोग सावधान होकर सुनो। द्वापरकी बात है। कुन्तीके पुत्र पाँचों पाण्डव परम
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बुद्धिमान् राजा द्रुपदसे उनकी पुत्री याज्ञसेनीको पाकर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे हस्तिनापुरमें गये। वहाँ पितामह भीष्म तथा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रके द्वारा सम्मानित होकर उन्होंने दुर्योधन आदिके साथ पाँच वर्षोंतक निवास किया। तदनन्तर भीष्म आदिके समझानेसे महायशस्वी धृतराष्ट्रने अपने कुलके सभी बड़े-बूढ़ोंके सामने और भगवान् श्रीकृष्णके आगे पाण्डवोंकी सेवासे प्रसन्न हो, उन्हें आधे राज्यके साथ खाण्डवप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली) नामक नगर प्रदान किया। तब धृतराष्ट्र आदि कौरवोंकी अनुमति ले सब पाण्डव श्रीकृष्णके साथ खाण्डवप्रस्थमें चले गये। वहाँ विश्वकर्मासे सुरक्षित इन्द्रप्रस्थ नामक पुरमें रहते हुए भाइयोंसहित युधिष्ठिरने पृथ्वीका पालन किया। भगवान् श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर धर्मके जाननेवाले कुन्तीपुत्रोंने नारदजीके उपदेशसे द्रौपदीके विषयमें यह प्रतिज्ञा की कि द्रौपदी क्रमशः एक-एक वर्ष एक-एक पाण्डवके घरमें निवास करेगी। इस निर्णयके बाद जो दूसरे भाईके घरमें रहती हुई पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीको देख लेगा, उसे एक वर्षतक तीर्थ-सेवन करना पड़ेगा। इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे पाण्डव आलस्य छोड़कर सामान्य लौकिक व्यापारोंमें संलग्न हो समय व्यतीत करने लगे।
तदनन्तर एक दिन उसी जनपदके निवासी ब्राह्मणने राजाके आँगनमें खड़े होकर कई बार पुकार लगायी—'महाराज! चोरोंने मेरी गाय चुरा ली।' उसकी आवाज सुनकर अर्जुन वहाँ आये और ब्राह्मणको सान्त्वना देकर अपने अस्त्र-शस्त्र लानेके लिये शीघ्रतापूर्वक शस्त्रागारको गये। वहाँ उन्होंने द्रौपदी और राजा युधिष्ठिरको एक जगह बैठे देखा। इस विषयमें की हुई प्रतिज्ञाको जानते हुए भी उन्होंने वहाँसे धनुष और बाण ले लिये और युद्धमें लुटेरोंको मारकर ब्राह्मणकी गाय लौटा ली। फिर उसे ले जाकर ब्राह्मणको आदरपूर्वक समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् अर्जुनने धर्मनन्दन युधिष्ठिरको सूचित किया कि मेरे द्वारा प्रतिज्ञाका उल्लंघन हुआ है, इसलिये मुझे तीर्थयात्रा करनी चाहिये।
अपने छोटे भाईकी बात सुनकर सब धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ धर्मनन्दन युधिष्ठिरने आदरपूर्वक कहा, 'सुव्रत! तुमने ब्राह्मण और गायके लिये ऐसा किया है। प्रजाकी रक्षा करना राजाका कर्तव्य है; यदि उसके द्वारा चोरोंकी उपेक्षा हो जाय तो उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है और चोरोंको दण्ड देनेपर वह पुण्यका भागी होता है। तुमने राजा और प्रजा दोनोंके लिये जो हितकर कार्य है, वही किया है; इसलिये तुम्हारा दोष नहीं है।' धर्मराजका यह वचन सुनकर सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले अर्जुनने हाथ जोड़कर कहा, 'भूपाल! आप ऐसी बात न कहें, आप धर्मके सर्वस्वको जानते हैं, धर्मके साक्षात् स्वरूप हैं तथा कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञाता हैं। समर्थ पुरुषको अपनी की हुई प्रतिज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिये। आर्य! यदि मुझपर दया करके मुझे तीर्थोंमें जानेसे रोक देंगे, तो संसारके मनुष्य यदि मुझे हतप्रतिज्ञ कहने लगें, तो उन्हें कौन रोक सकता है। मेरा मन भी तीर्थयात्राकी उत्कण्ठासे उतावला हो रहा है। राजन्! नारदजीने जो अनुशासन किया है, वह हमारे लिये सर्वथा कर्तव्य है। अतः महाराज! तीर्थयात्राके लिये मैंने जो यह उद्योग किया है, इससे आपको प्रसन्न होना चाहिये। स्वामीको सेवकोंकी प्रतिज्ञाका उनके द्वारा निर्वाह करवाना चाहिये।'
तब भाइयोंकी सलाह ले 'बहुत अच्छा' कहकर युधिष्ठिरने अर्जुनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। अर्जुनने प्रणाम और विनय आदिके द्वारा अपने बड़े भाईको सन्तुष्ट किया। फिर यथायोग्य भीमसेन आदि बन्धुओंसे भी विदा ले, ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अर्जुनने वहाँसे
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यात्रा की। राजकुमार अर्जुनने पहले गंगा नदीके तटपर पहुँचकर उसीके किनारे-किनारे निकटवर्ती मार्गसे जाते हुए हरिद्वार, प्रयाग और काशी आदि तीर्थोंका सेवन किया और अन्य तीर्थोंका दर्शन करते हुए वे ऊँची-ऊँची तरंगोंसे लहराते हुए दक्षिण समुद्रतक जा पहुँचे। फिर परम पवित्र महानदी, प्रसिद्ध पुरुषोत्तम तीर्थ और सिंहाचलका दर्शन करके उन्होंने अपनेको कृतकृत्य माना। तत्पश्चात् अर्जुनने समस्त पातकसमूहका विनाश करनेके कारण अतिशय गौरवको प्राप्त हुई पुण्यमयी गोदावरी नदीका दर्शन किया। उसके जलसे विधिपूर्वक स्नान करके वे मलापहा नदीके तटपर गये। उसके दर्शनसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उसके बाद वे सरिताओंमें श्रेष्ठ कृष्णवेणी नदीके समीप जा पहुँचे और भगवान् शंकरके निवास-स्थान श्रीपर्वतका दर्शन किया। फिर पिनाकिनी नदीको पार करके देवताओं और ऋषियोंद्वारा सेवित वेंकटाचल पर्वतका दर्शन किया, जो भगवान् नारायणका प्रिय निवास है। उस पर्वतके शिखरपर स्थित सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र स्वामी सुप्रसिद्ध भगवान् श्रीहरिका अर्जुनने कल्याणकी सिद्धिके लिये भक्तिपूर्वक पूजन किया। तदनन्तर महापर्वत वेंकटाचलके शिखरसे उतरकर उन्होंने सिद्धों और मुनियोंके समुदायसे सेवित सुवर्णमुखरी नामवाली नदीका दर्शन किया, जिसे मुनिवर अगस्त्यजी यहाँ ले आये थे।
अर्जुनका कालहस्तीश्वरके समीप भरद्वाजके आश्रमपर जाना और भरद्वाजजीके द्वारा अगस्त्यजीके प्रभावका वर्णन
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार सब तीर्थोंका दर्शन करके आये हुए अर्जुनके मनमें महानदी सुवर्णमुखरीने कई गुना आनन्द बढ़ा दिया। उस नदीके पूर्व तटपर अर्जुनने एक ऊँचा पर्वत देखा, जो कालहस्तीके नामसे प्रसिद्ध है। उस महानदीमें स्नान करके वे पर्वतके शिखरपर गये और वहाँ देवपूजित कालहस्तीश्वर नामक महादेवजीका दर्शन किया। पार्वतीके साथ महादेवजीका भक्तियुक्त चित्तसे पूजन करके वे कृतार्थ हो गये। तदनन्तर अर्जुन वहाँके अभूतपूर्व पदार्थोंका दर्शन करनेके लिये उस पर्वतपर विचरने लगे। वहाँ पर्वतीय शिखरोंपर एकान्त प्रदेशमें उन्होंने शिवजीके ध्यानमें तत्पर हुए अनेकानेक दिव्य योगियोंका दर्शन किया। साथ ही इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले अनेकों शान्त मुनियोंको भी देखा। उनमें कोई तो निराहार रहते थे, कोई वायु पीते थे, कोई पत्ते चबाते थे और कोई सूर्यकी धूपके ही आहारपर निर्वाह करते थे। उसके बाद उस पर्वतके दक्षिण भागमें घूमते हुए उन्होंने महर्षि भरद्वाजका पवित्र आश्रम देखा, जो सब प्रकारकी लक्ष्मीसे सुशोभित था। कौतुकका तो वह एकमात्र स्थान था। सिंह, हाथी, व्याघ्र, चीता, रूरू, रंकु तथा अन्य मृगोंसे भरा हुआ था और वे सभी जीव आपसका सहज वैर भुलाकर एक-दूसरेका हितसाधन करते थे। उस आश्रमको देखकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने तपस्वियोंके प्रभावकी प्रशंसा की। अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण उस यात्रामें अर्जुनके साथ थे। उन सभी मित्रोंके साथ उन्होंने आश्रममें प्रवेश किया और अपने सामने ही अनेक मुनियोंसे घिरे हुए प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भरद्वाजजीको बैठे देखा। उनके सब अंगोंमें भस्म लगा हुआ था और कंधेपर मृगचर्मका उत्तरीय शोभा पा रहा था। इससे वे नूतन श्याम मेघसे आच्छादित कैलासकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। सुवर्णके समान पीले रंगकी लम्बी जटाओंसे प्रकाशमान थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो श्रुति-स्मृति और
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पुराणोंके अर्थोंने एकीभूत होकर मुनिका शरीर धारण कर लिया हो। वे दिव्य ज्ञानके शुभ आश्रय थे। धृति, क्षान्ति, दया, तुष्टि और शान्ति आदि सद्गुण नित्य उनकी सेवामें रहते थे। वे अखण्ड ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान हो रहे थे। अर्जुनने धीरे-धीरे निकट जाकर मुनिके चरणारविन्दोंके आगे पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया।
अपने आश्रमपर आये हुए कुन्तीनन्दन अर्जुनको मुनिने स्वयं उठाकर अभ्युदयका आशीर्वाद दिया। उस समय उनका चित्त हर्षोल्लाससे परिपूर्ण था। यथायोग्य अर्घ्य आदि प्रस्तुत करके मुनिने अपने प्रिय अतिथिका सत्कार किया और एक आसनकी ओर संकेत करके उन्हें उसपर बिठाया। जब वे बैठ गये तब उनसे स्वास्थ्यसम्बन्धी कुशल-प्रश्न किया। तदनन्तर अर्जुन भोजन करके तपोनिधि भरद्वाज मुनिके समीप ही बैठे और कथा सुननेके कौतूहलसे दिनका शेष भाग वहीं व्यतीत किया। तत्पश्चात् सायं-सन्ध्या करके अग्निमें आहुति दे अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंसहित वे मुनिके कुटीगृहमें गये और वहाँ उनके आशीर्वादसे आनन्दित होकर बैठे। उस समय सुवर्णमुखरी नदीके शीतल जलको छूकर चलनेवाली ठंडी वायुसे अर्जुनको बड़ा हर्ष प्राप्त हो रहा था।
सूतजी कहते हैं—अर्जुनने सुखपूर्वक बैठे हुए भरद्वाज मुनिको प्रणाम करके विनयपूर्वक यह गम्भीर वचन कहा—'मुनिश्रेष्ठ! इस संसारमें एकमात्र मैं ही धन्य हूँ, जिसका आपने अपने पुत्रके समान भलीभाँति आदर किया है। भगवन्! यह महानदी किस पर्वतसे प्रकट हुई है और कौन इसे ले आया है? तथा इसमें स्नान, दान आदि करनेसे कौन सा पुण्य प्राप्त होता है?'
भरद्वाजजीने कहा—महाबाहु अर्जुन! तुम कौरवकुलको पवित्र करनेवाले हो और धर्मपुत्र युधिष्ठिरके छोटे भाई हो। मैंने अनेक राजा देखे हैं। परंतु वे तुम्हारे समान लीलायुक्त, सरलता, दया, उदारता, धीरता और गम्भीरता आदि गुणोंसे सुशोभित नहीं थे। कुल, विद्या और धन—ये बलवान् पुरुषोंके अभिमानमें कारण होते हैं। परंतु तुम्हारे-जैसे कल्याणमय पुरुषोंके लिये वे भी नम्रता लानेमें कारण हुए हैं। राजन्! मैंने मुनियोंके मुखसे जो दिव्य कथा सुनी है, वह तुमसे कहता हूँ, उसे सुनो। पूर्वकालकी बात है, दक्षकुमारी सती अपने पितासे अपमानित हो शरीर त्यागकर हिमालयकी पुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुईं। फिर सप्तर्षियोंने आकर जब प्रार्थना की, तब गिरिराज हिमालय विवाहके समय अपनी पुत्री भगवान् शंकरको देनेको उद्यत हुए। उसके बाद जगदीश्वर शिव पार्वतीको ब्याह लानेके लिये हिमालयके निवासस्थानपर गये। उस समय स्थावर-जंगम सभी प्राणी भगवान् शिवके मंगलमय विवाहका अभिनन्दन करनेके लिये वहाँ उपस्थित हुए। उन सबके भारी भारसे उत्तरकी भूमि नीची हो गयी और दक्षिणकी भूमि भार न होनेसे अत्यन्त हलकेपनके कारण ऊँची हो गयी। इससे सबको बड़ा भय हुआ। तब महादेवजीने अगस्त्यजीके समीप जाकर कहा, 'मुने! यह पृथ्वी अधिक भारसे दबकर विकृतावस्थाको प्राप्त हो गयी है, तुम्हीं इसको बराबर करनेमें समर्थ हो। अतः मेरे कहनेसे इस पृथ्वीको बराबर करो।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् शिवको प्रणाम करके अगस्त्यजी दक्षिण दिशामें चले गये। विन्ध्यगिरिको लाँघकर अगस्त्यके दक्षिण दिशामें जाते ही पृथ्वी समभावको प्राप्त हो गयी।
तदनन्तर अगस्त्यजीने आगे जाकर किसी ऊँचे पर्वतको देखा, जो अपनी फैली हुई घाटियोंसे पृथ्वीको धारण करके स्थित था। वे धीरे-धीरे उस पर्वतपर चढ़ गये और उसके मनोहर शिखरकी सुरम्य स्थलीमें उन्होंने रहनेका विचार किया। वहाँ अमृतके समान जलसे भरा हुआ एक सरोवर था, जिसमें पद्म और उत्पल आदि फूलोंकी शोभा फैली हुई थी। उसके चारों ओर बहुत-से वृक्ष
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लगे थे। अगस्त्यजीने उसी सरोवरके उत्तर तटपर एक मनोहर भूभागमें उत्तम आश्रम बनाकर तथा पितरों, देवताओं, ऋषियों और वास्तुदेवका विधिपूर्वक पूजन करके मुनिसमुदायके साथ उसमें दीर्घकालतक निवास किया। तपस्यामें मनकी वृत्तियोंको लगाकर वहाँके तपोवनमें जब अगस्त्य मुनि रहने लगे, तब वह उत्तम सौभाग्यसे सुशोभित पर्वत अगस्ति-शैलके नामसे प्रसिद्ध हुआ।
महर्षि अगस्त्यकी तपस्यासे सुवर्णमुखरी नदीका प्रादुर्भाव और उसका माहात्म्य
**भरद्वाजजी कहते हैं—**एक दिन मुनिवर अगस्त्यजी पूर्वाह्नकालका नित्य-नियम पूरा करके भगवान् शिवकी आराधना करनेके लिये देवमन्दिरमें गये। उसी समय आकाशवाणी हुई—'मुने! यह प्रदेश नदीसे हीन है, अतः ज्ञान-विज्ञानसे रहित केवल शरीरधारी ब्राह्मणकी भाँति, दक्षिणाहीन दीक्षा और चाँदनीशून्य रात्रिके समान शोभा नहीं पाता। इसलिये तुम सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये इस भूभागमें कोई ऐसी नदी बहाओ, जो अगाध पापराशिजनित भयका निवारण करके सदैव सुशोभित रहे। मुनिवर! देवसमुदायकी यही प्रार्थना है, जो सबके लिये हितकर है।'
इस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्मर्षि अगस्त्यजी क्षणभर कुछ विचार करते रहे। तत्पश्चात् देव-पूजन समाप्त करके वे बाहर वेदीपर बैठे। उनके आश्रमपर जितने मुनि रहते थे, उन सबको उन्होंने बुलवाया और आकाशवाणीकी कही हुई बात कह सुनायी। तब मुनियोंने अगस्त्यजीको प्रणाम करके कहा, 'महर्षे! आपके हुंकारमात्रसे राजा नहुष देवताओंके साम्राज्यसे नीचे गिर गये और सर्पयोनिको प्राप्त हुए। जिसने सम्पूर्ण भूमण्डलको घेर रखा है तथा जो अपनी उत्ताल तरंगोंसे आकाशको भी ताड़ित करता है, ऐसे महासागरको भी आपने अपने चुल्लूमें रख लिया। विन्ध्यपर्वत भगवान् सूर्यका मार्ग रोकनेके लिये उद्यत हुआ था, परंतु आपने उसे भी शान्त कर दिया। इन सबसे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है। महामुने! तीनों लोकोंमें हम सब लोग कृतार्थ हैं जो कि आपसे सनाथ होकर आपके इस आश्रममें निवास करते हैं। यह प्रदेश दक्षिण दिशामें वर्णनीय है और समस्त वस्तुओंसे परिपूर्ण है तो भी बहुत दूरतक यहाँ कोई नदी नहीं है, इसलिये यह शोभा नहीं पाता। अनघ! कब ऐसा शुभ अवसर प्राप्त होगा जब हम इस देशमें आपके द्वारा बहायी हुई किसी महानदीमें स्नान करके कृतार्थताका अनुभव करेंगे। हमारी भी प्रार्थना है कि आप यहाँ सबको शरण देनेवाली किसी सर्वश्रेष्ठ विश्ववन्द्य नदीको निश्चय ही ले आनेके लिये प्रयत्न कीजिये।'
तब मुनीश्वरोंकी आज्ञा ले देवताओं तथा भगवान् शिवकी विशेष पूजा करके मुनिने महान् क्लेशमय दुःसह व्रतको अंगीकार किया और बड़े यत्नसे भारी तपस्या प्रारम्भ की। गरमीमें पंचाग्निका ताप सहन किया। वर्षामें आँधी-पानी और विद्युत्का सामना किया तथा सर्दीमें गलेतक पानीमें खड़े हो जप-ध्यान करते रहे। तत्पश्चात् मनकी वृत्तियोंको रोककर, निराहार रह, इन्द्रियोंको काबूमें करके वे पत्थरकी भाँति स्थिर हो गये। उस समय उन्हें बाहरकी बातोंका कुछ भी भान नहीं होता था। तदनन्तर तपस्यामें लगे हुए अगस्त्यजीके आगे ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्हें देखकर मुनिने प्रणाम किया और अनेक प्रकारके
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स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की। तब विनयावनत अगस्त्यजीकी ओर देखकर प्रसन्नवदन हो ब्रह्माजीने पवित्र वाणीमें कहा, 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! तुम्हारे इस दुष्कर तपसे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हें जो-जो अभीष्ट हो, माँगो, मैं उसे दूँगा।'
अगस्त्यजी बोले—प्रभो! आपकी कृपासे मुझे सब कुछ प्राप्त है, किंतु इस प्रदेशको नदीसे हीन देखकर मेरे मनमें खेद होता है। देवेश्वर! यहाँकी भूमिको पवित्र और सुरक्षित करनेमें समर्थ किसी महानदीको प्रकट करनेकी कृपा करें। यही मेरे लिये अभीष्ट वर है।
अगस्त्यजीका वचन सुनकर ब्रह्माजीने कहा, 'ऐसा ही होगा।' फिर उन्होंने अपने मनसे आकाशगंगाका स्मरण किया और जब वह उनके आगे आकर खड़ी हो गयी तब उससे कहा, 'गंगे! संसारका उपकार करनेवाले कार्यमें संलग्न होनेके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। इस नदीहीन देशमें सब लोगोंके हितके लिये कोई नदी प्रवाहित करनेके लिये ये अगस्त्यजी तपस्या एवं चेष्टा कर रहे हैं। इसलिये तुम अपने एक अंशसे पृथ्वीपर उतरकर अगस्त्यजीके दिखाये हुए मार्गसे जाओ और यहाँके रहनेवाले मनुष्योंको पवित्र करो। समस्त नदियों में तुम्हारा श्रेष्ठ स्थान हो और तुम अपनी शरणमें आये हुए लोगोंकी रक्षा करो।' यों कहकर ब्रह्माजी उस आकाशगंगा और अगस्त्य मुनिके द्वारा किये गये प्रणाम, पूजा तथा विशेष स्तुतियोंसे अभिनन्दित होकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् मुनीश्वर अगस्त्यके आगे अपने अंशसे उत्पन्न दिव्य तेजोमयी मूर्तिका दर्शन कराकर आकाशगंगाने कहा, 'मुनीश्वर! यह मेरा अंश है, यह पृथ्वीपर पहुँचकर नदीरूपमें परिणत हो तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेगा।'
ऐसा कहकर आकाशगंगा तो चली गयीं और उनके अंशसे उत्पन्न हुई दिव्य मूर्तिने पूछा—'मुने! मुझे किस मार्गसे चलना होगा?' तब मुनिने कहा—'कल्याणि! मैं आगे-आगे चलकर तुम्हारे जानेयोग्य मार्ग दिखाऊँगा। तुम मेरे पीछे-पीछे आओ।' तदनन्तर मुनिवर अगस्त्यजी अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर गंगाजीको अभीष्ट मार्ग दिखलाते हुए आगे-आगे चले। उस नदीको देखकर उस भूमिके निवासी मनुष्य बड़े प्रसन्न हुए। 'अहो! हमारे सौभाग्यसे यह सुधाके समान मधुर एवं निर्मल जल प्राप्त हुआ'—ऐसा कहते हुए वे अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये। उस समय ब्रह्माजीकी आज्ञासे सब देवताओंके सुनते हुए वायुदेवने कहा—'यह नदी लोकोंके सौभाग्यसे सुवर्णकी भाँति प्राप्त हुई है तथा महर्षि अगस्त्यके द्वारा इस पृथ्वीपर लायी जानेपर अपनी कल-कलध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको मुखरित कर रही है। इसलिये यह सुवर्णमुखरीके नामसे प्रसिद्ध होगी तथा मोक्ष-सम्पत्ति प्रदान करनेवाले अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंद्वारा प्रशंसित होगी।' इस प्रकार यह दिव्य नदी स्नान-पान आदिकी व्यवस्थासे सब मनुष्योंको सुख पहुँचाती हुई इस पृथ्वीपर प्रतिष्ठित हुई। जो रोगोंसे पीड़ित और अधिक व्याकुल मनुष्य हैं,
३१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उन सबके रोगोंका निवारण करके उन्हें स्वस्थ बना देनेवाला एकमात्र सुवर्णमुखरीका जल है। अर्जुन ! वह नदी कीचड़से रहित, अत्यन्त निर्मल, पापनाशक, मंगलयुक्त और अत्यन्त स्वादिष्ट अमृतके समान जल धारण करती है। अगस्त्य पर्वतसे इसकी उत्पत्ति हुई है तथा उत्तम तीर्थसमूहोंसे सुशोभित होकर यह दक्षिण समुद्रमें जाकर मिली है। महर्षि अगस्त्य इस नदीका दक्षिण समुद्रसे संगम कराकर इसकी स्तुति करके कृतार्थताका अनुभव करते हुए पुनः इच्छानुसार अपने आश्रमपर लौट आये।
अर्जुनने कहा—भगवन् ! आपने इस महानदीकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कहा—अब मैं इसके प्रभावको सुनना चाहता हूँ।
भरद्वाजजी बोले—पाण्डुनन्दन ! सौ योजन दूरसे भी इस सुवर्णमुखरीका स्मरण करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि सुवर्णमुखरीके जलमें देहधारियोंकी अस्थि डाल दी जाय, तो वह उनके ब्रह्मलोकपर चढ़नेके लिये सीढ़ी बन जाती है। सुवर्णमुखरीका स्मरण करते हुए मनुष्य जहाँ कहीं भी अन्य जलोंमें स्नान कर लें, तो उन्हें उत्तम पदकी प्राप्ति होती है। इन्द्र आदि देवता सुवर्णमुखरी नदीमें स्नान करनेके लिये ललचाये हुए चित्तसे मनुष्य-शरीरको ही प्राप्त करना चाहते हैं। यदि तोला भर भी सुवर्णमुखरी नदीका जल पी लिया जाय तो वह देहधारियोंके पर्वतसमान पापोंका भी शीघ्र नाश कर देता है। देवताओंमें विष्णु, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, मनुष्योंमें राजा, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, महाभूतोंमें आकाश, समस्त शक्तियोंमें मायाशक्ति, मन्त्रोंमें गायत्री मन्त्र, देवताओंके अस्त्र-शस्त्रोंमें वज्र, तत्त्वोंमें आत्मतत्त्व, यजुर्वेदके मन्त्रोंमें रुद्राष्टाध्यायी, नागोंमें शेषनाग, पर्वतोंमें हिमालय, क्षेत्रोंमें वराहक्षेत्र तथा इन्द्रियोंमें मनके समान सम्पूर्ण नदियोंमें सुवर्णमुखरी नदी श्रेष्ठ है। 'अगस्त्य पर्वतसे प्रकट हो दक्षिण समुद्रमें मिलनेवाली और सब पापोंका नाश करनेवाली तुम स्वर्णमुखरी नदीकी मैं शरण लेता हूँ। जगदम्बे ! बड़े-बड़े पातकोंसे दग्ध हुए अपने इस शरीरको मैं तुम्हारे जलसे धोता हूँ। मुझे कल्याणसे युक्त करो।'* इन दो सूक्तोंका भलीभाँति उच्चारण करके जो मनुष्य नियमपूर्वक सुवर्णमुखरीके जलमें स्नान करता है, वह शुद्ध होकर आनन्दका भागी होता है। कुन्तीनन्दन ! चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय सुवर्णमुखरीके तटपर किया हुआ स्नान, दान आदि अनन्त फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है। संक्रान्ति, अयन तथा व्यतीपातके दिन सुवर्णमुखरी नदीमें किया हुआ स्नान मनुष्यका उद्धार कर देता है। सुवर्णमुखरीके जलमें स्नान करके मनुष्य दुःस्वप्नके विघ्नसे तथा ग्रहोंके दुष्ट स्थानमें रहनेसे प्राप्त होनेवाले पाप-तापसे तर जाता है। सुवर्णमुखरीके तटपर किया हुआ जप, होम, तप, दान, श्राद्ध और देवपूजन सौगुना फल देनेवाला होता है।
अर्जुन ! इस प्रकार तुमसे महानदी सुवर्णमुखरीकी उत्पत्ति और प्रभावका भलीभाँति वर्णन किया गया।
$\sim\sim\sim\sim\sim$
* अगस्त्याचलसम्भूतां दक्षिणोदधिगामिनीम्। समस्तपापहर्त्रीं त्वां सुवर्णमुखरीं श्रये॥
महापातकविप्लुष्टं गात्रं मम तवोदकैः। क्षालयामि जगद्धात्रि श्रेयसा योजयस्व माम्॥
(स्क० पु०, वै० वे० ३३। ४२-४३)
* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३११
सुवर्णमुखरी नदीके तीर्थोंका वर्णन, भगवान् विष्णुकी महिमा, प्रलयकालकी स्थिति तथा श्वेतवाराहरूपमें भगवान्का प्राकट्य
अर्जुनने पूछा—मुने! सुवर्णमुखरी नदीमें किन-किन पवित्र नदियोंका संगम हुआ है तथा इसमें कहाँ स्नान करनेसे समस्त पाप कट जानेके कारण मनुष्य यमराजके भयको नहीं प्राप्त होते हैं?
भरद्वाजजी बोले—कुन्तीनन्दन! अगस्त्य पर्वतसे जहाँ पहले-पहल महानदी सुवर्णमुखरी पृथ्वीपर उतरी है, उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। वह पावन तीर्थ त्रिभुवनमें अगस्त्यतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। उस तीर्थमें जो प्रयत्नशील साधक अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए स्नान करते हैं, वे सम्पूर्ण फल प्राप्त करते हैं। वहाँ सब लोगोंको आनन्द देनेवाले अगस्त्य मुनिके द्वारा स्थापित किये हुए भगवान् शिव अगस्त्येश्वरके नामसे प्रसिद्ध हैं। उस महानदीमें स्नान करके जो लोग अगस्त्येश्वरकी पूजा करते हैं, उन्हें दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। अगस्त्यतीर्थसे ईशानकोणकी ओर एक कोसकी दूरीपर तीन तीर्थ हैं, जो देवतीर्थ, ऋषितीर्थ तथा पितृतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हैं। वहींपर अगस्त्यमुनिने देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका पूजन किया था। जो लोग स्नान करके उन तीर्थोंमें तर्पण करते हैं, वे तीनों ऋणोंसे मुक्त होकर अक्षय स्वर्गको प्राप्त होते हैं। वहाँसे पूर्व-उत्तरकी ओर दो योजनकी सीमामें वेणा नामवाली महानदी सुवर्णमुखरीमें मिली है। इन दोनों नदियोंके संगममें विधिपूर्वक स्नान करनेवाले मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त करते हैं। वेणासे मिलकर परम पवित्र सुवर्णमुखरी नदी पर्वतोंके दुर्गम मार्गसे उत्तरवाहिनी होकर गयी है। फिर पर्वतोंके बीचसे होकर विषम मार्गसे आगे बढ़ती हुई चार योजन दूर जाकर प्रकाशमें आयी है। वहाँसे पूर्व डेढ़ योजनकी दूरीपर उदक्कल नामक मनोहर स्थानमें यह महानदी पूर्ववाहिनी हो गयी है। वहीं भगवान् शंकरका अगस्त्येश्वर नामसे प्रसिद्ध एक और शिवलिंग है, जो स्मरणमात्रसे मनुष्योंके समस्त पापोंका निवारण करता है। जो मनुष्य उस महानदीमें स्नान करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए अगस्त्य-मुनिके द्वारा स्थापित भगवान् पार्वतीनाथका दर्शन करते हैं, वे अनेक जन्मोंकी उपार्जित पापराशिको दूर करके अनन्त कालतक स्वर्गलोकमें सुख भोगते हैं। वहाँसे तीर्थसमुदायसे सुशोभित सुवर्णमुखरी नदी पुनः आधे योजनतक उत्तरकी ओर गयी है। वह प्रदेश हिन्ताल, ताल और शाल आदि वृक्षोंसे बड़ा मनोहर प्रतीत होता है। वहीं व्याघ्रपदा नामवाली नदी सुवर्णमुखरी नदीमें मिली है। उन दोनों नदियोंके संगममें स्नान करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञोंका पूर्ण फल प्राप्त करते हैं। व्याघ्रपदा नदीके तटपर शंखतीर्थ सुशोभित है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। अर्जुन! वहाँ शंखेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव विराजमान हैं। जो उस तीर्थमें भलीभाँति स्नान करके भगवान् शंकरका दर्शन करते हैं, वे दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त करके देवलोकमें जाते हैं। व्याघ्रपदासंगमसे एक योजन भूमि आगे जाकर शुभ एवं निर्मल जल बहानेवाली मुनीन्द्रसेवित सुवर्णमुखरी नदी वृषभाचलके समीप पहुँची है।
वहाँ मंगलदायिनी कल्या नामवाली पवित्र नदी सुवर्णमुखरीमें आकर मिली है। वह वृषभाचलसे प्रकट हुई है। तीर्थराजसे उसकी शोभा और बढ़ गयी है। नदियोंमें उत्तम कल्या नदी पापसमूहका नाश करनेवाली है। उन दोनों नदियोंके संगमकी महिमा बतलानेमें कौन समर्थ है? जहाँ नदीके
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बीचमें ब्रह्मशिला विराजमान है और अगस्त्यजीकी तपस्याके प्रभावसे जहाँ गयातीर्थका वास है। उन दोनों नदियोंके पवित्र संगममें स्नान करनेवाले मनुष्य सौ पुण्डरीक यज्ञोंका फल प्राप्त करते हैं और उनके ब्रह्महत्या आदि समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। तदनन्तर महानदी सुवर्णमुखरीके उत्तर भागमें आधे योजन दूर सुप्रसिद्ध वेंकटाचल पर्वत विराजमान है, जिसकी ऊँचाई एक योजनकी है। भगवान् मधुसूदनने पहले वाराह शरीरसे इस पर्वतको अपने रहनेके लिये स्वीकार किया था, इसलिये श्रेष्ठ पुरुषोंने इसे वाराहक्षेत्र कहा है। वेंकटाचलपर भगवान् विष्णु श्रीलक्ष्मीजीके साथ सदैव निवास करते हैं। जो लोग वेंकटाचलनिवासी जगदीश्वर विष्णुका स्मरण करते हैं, वे सब दोषोंसे रहित हो सनातन अविनाशी पदको प्राप्त होते हैं।
अर्जुनने पूछा— महामुने! लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु परम पवित्र वेंकटाचलपर कैसे प्रकट हुए? किस पुण्यात्मापर प्रसन्न होकर उन्होंने भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले अपने अद्भुत रूपको प्रकाशित किया है?
भरद्वाजजी बोले— कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें भागीरथीके तटपर यज्ञदीक्षापरायण तथा विशुद्ध ज्ञानसे विभूषित महात्मा राजा जनकसे वामदेवजीने जो पापनाशक कथा कही थी, वह भगवान् विष्णुके कीर्तनसे युक्त होनेके कारण सबको पवित्र करनेवाली है। वही कथा अब मैं तुम्हें सुनाऊँगा। भगवान् नारायण ही समस्त प्राणियोंके आदिकारण हैं। सम्पूर्ण विश्व उन्हींका रूप है, वे जगत्के स्रष्टा हैं, उनका स्वरूप चिन्मय तथा निरंजन है। उनके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों चरण हैं। उन्हींके तेजसे यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है। उनसे बढ़कर तेज, उनसे बड़ा तप, उनसे बड़ा ज्ञान, उनसे बड़ा योग तथा उनसे बड़ी विद्या भी नहीं है। वे भगवान् श्रीहरि सदा समस्त प्राणियोंमें विद्यमान हैं। समस्त जीव उन्हींमें सुखपूर्वक निवास करते हैं। वे ही यज्ञ, यजमान और यज्ञके स्रुक्-स्रुवा आदि साधन हैं। वे ही फल हैं, वे ही फलदाता हैं और वे ही सबके प्राप्त करनेयोग्य परमगति हैं। हरि, सदाशिव, ब्रह्मा, महेन्द्र, परम तथा स्वराट् आदि सभी नाम उन सर्वेश्वर विष्णुके ही पर्याय कहे गये हैं। जो एकाग्रचित्त होकर परमात्मा नारायणके इस माहात्म्यका अनुसन्धान करता है, वह पुनः संसारमें जन्म नहीं लेता। भगवान् विष्णु चिदानन्दस्वरूप, सबके साक्षी, निर्गुण, उपाधिशून्य तथा नित्य होते हुए भी स्वेच्छासे भिन्न-भिन्न अवस्थाओंको अंगीकार करते हैं। वे पवित्रोंमें परम पवित्र हैं, निराश्रितोंकी परम गति हैं, देवताओंके भी देवता हैं तथा कल्याणमय वस्तुओंमें भी परम कल्याणस्वरूप हैं।* बोध्य पदार्थोंमें एकमात्र वे ही बोध्य हैं। ध्येय तत्त्वोंमें वे ही सर्वोत्तम ध्येय हैं। विनयियोंमें सबसे अधिक विनय और नय भी वे ही हैं। वे सम्पूर्ण तेजोंको उत्पन्न करनेवाले तेज हैं, तपस्याओंमें उच्चकोटिकी तपस्या हैं तथा सब प्राणियोंके परम आधार हैं। जनार्दन भगवान् विष्णुका आदि और अन्त नहीं है। उनके स्वरूपको इदमित्थम् रूपसे जान लेनेमें ब्रह्मा आदि भी मूढ़ हैं। वे अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं, सर्वात्मा होकर भी शत्रुओंका वध करते हैं तथा स्वतन्त्र होकर भी अपने भक्तोंके परतन्त्र रहते हैं। सर्वज्ञ भगवान् गरुडध्वज ही कर्मोंकि साक्षी हैं। मुनिलोग एकाग्रचित्त होकर उनके स्वरूपकी खोज करते हैं। भगवान्की चतुर्व्यूह नामसे प्रसिद्ध चार मूर्तियाँ हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध। पहले प्रणवका उच्चारण हो, तत्पश्चात्
* पवित्राणां पवित्रं यो ह्यगतीनां परा गतिः। दैवतं देवतानां च श्रेयसां श्रेय उत्तमम्॥ (स्क० पु०, वै० वे० ३५। ३८)
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१३
भगवान्के प्रकाशमान हृदयस्वरूप नमः पदका उच्चारण हो, उसके बाद भगवान् और वासुदेव—ये दो पद हों, इनसे जो मन्त्र बनता है, वह (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) मन्त्र भगवान्के स्वरूपका प्रकाशक है। जो प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर इस मन्त्रराजका जप करता है, वह भगवान् विष्णुकी कृपासे समस्त सिद्धियोंका भाजन होता है। आपत्तियोंका निवारण और सम्पत्तियोंकी प्राप्ति करानेवाले भोग-मोक्षप्रदाता श्रीहरिने कल्पके आदिमें जिस प्रकार प्राणियोंकी सृष्टि की है, वह सुनो। सृष्टिका चिन्तन करते समय भगवान् विष्णुका जो रजोगुणयुक्त तेजोमय स्वरूप प्रकट हुआ, वह ब्रह्माके नामसे विख्यात हुआ। उन्हीं भगवान्के मुखसे त्रिभुवनके स्वामी इन्द्र और अग्नि उत्पन्न हुए। उनके नित्य करुणापूर्ण शीतल हृदयसे चन्द्रमा प्रकट हुए, जो जल, समस्त ओषधिवर्ग तथा ब्राह्मणोंके रक्षक हैं। भगवान्के नेत्रोंसे सम्पूर्ण विश्वको प्रकाशित करनेवाले तेजोनिधि सूर्य उत्पन्न हुए, जो जाड़ा, गरमी और वर्षाकालके कारण हैं। श्रीहरिके प्राणोंसे समस्त जगत्के प्राणस्वरूप महाबली वायुका प्रादुर्भाव हुआ, जो ग्रह, नक्षत्र आदिको धारण करनेवाले हैं। महात्मा भगवान्की नाभिसे अन्तरिक्ष और मस्तकसे आकाशकी उत्पत्ति हुई, जो समस्त भूतोंके आविर्भावका कारण है। भगवान् विष्णुके चरणारविन्दोंसे सब भूतोंको आश्रय देनेवाली पृथ्वी उत्पन्न हुई। उन परमात्माके कानोंसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकट हुईं। उनके चिन्तनमात्रसे भूर्भुवः आदि लोक, रसातल आदि पाताल और यक्ष-राक्षसगण आदि उत्पन्न हुए। भगवान्ने अपने मुख, बाहु, ऊरु और चरणोंसे क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र आदिको जन्म दिया। वेद, यज्ञ, घोड़े, गौ और भेड़ आदि जीव, जिनकी उत्पत्तिका कारण अचिन्त्य है, जिन परमेश्वरसे उत्पन्न हुए हैं, उन्हीं देवाधिदेव भगवान् विष्णुके संकल्पसे स्थावर-जंगम प्राणियोंका समुदाय तथा भूत, भविष्य, वर्तमान काल भी प्रकट हुआ है।
वे ही बडवानलका रूप धारण करके समुद्रोंका जल पीते हैं और प्रलयकालमें अपने भीतर विलीन हुए समस्त जगत्की पुनः कल्पके आरम्भमें सृष्टि करते हैं। सूर्य और चन्द्रमाका रूप धारण करके वे ही अन्धकारका नाश करते और सबको कालके अनुसार धर्ममें लगाते हैं। इस प्रकार वे सब जीवोंकी जीवनवृत्ति चलाते हैं। फिर कल्पान्तके समय समस्त संसारको अपने उदरमें रखकर लीलासे शिशुकी आकृति धारण किये एकार्णवके जलमें वटके पत्रपर शयन करते हैं। इसके बाद प्रचण्ड नागराजके शरीरकी सुखशय्यापर सोकर केवल भगवती लक्ष्मीजीके साथ योगनिद्राका आश्रय लेते हैं। यह सब अपनी इच्छाके अनुसार योगशक्तिको प्रवृत्त करनेवाले भगवान् मुकुन्दकी लीला है। उन परमेश्वरको यथार्थ रूपसे कोई भी नहीं जानता। जब-जब धर्मकी हानि होती और अधर्म बढ़ने लगता है। अथवा जब-जब देवताओंको बड़ी भारी पीड़ा भोगनी पड़ती है और जब-जब अपने भक्त साधु पुरुषोंपर भय उत्पन्न करनेवाली भारी विपत्ति अनिवार्यरूपसे आ जाती है, तब-तब कौतुकवश उस अवसरके अनुकूल रूप धारण करके भगवान् शीघ्र ही अधर्मका निवारण और जगत्का कल्याण करते हैं। स्वयं ही रजोगुणका आश्रय लेकर वे ब्रह्माके नामसे प्रसिद्ध हो सृष्टि करते हैं, सत्त्वगुणमें स्थित हो हरि-नाम धारण करके सारे संसारके पालन-पोषणका भार ढोते हैं और तमोगुणी वृत्तिको अपनाकर हर-नामसे प्रसिद्ध हो सबका संहार करते हैं। भगवान् मधुसूदनकी महिमाको यथार्थ रूपसे जाननेवाला कोई नहीं है।
साठ विनाडिकाकी एक नाड़ी (घटिका) और साठ नाड़ियोंका एक दिन होता है। तीस दिनका एक मास कहा गया है, जिसमें दो पक्ष होते हैं। दो मासकी एक ऋतु और छः ऋतुओंका एक वर्ष होता है। वर्षमें दो अयन होते हैं। यह वर्ष ही जाड़ा, गरमी और वर्षाका आधार है। देवताओं
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और दैत्योंका दिन-रात एक-दूसरेके विपरीत है। सूर्यका उत्तरायण देवताओंका दिन और दैत्योंकी रात्रि, इसी प्रकार दक्षिणायन दैत्योंका दिन और देवताओंकी रात्रि है। यह सब क्रमके अनुसार समझना चाहिये। अर्जुन! तैंतालीस लाख बीस हजार वर्षोंका एक महायुग होता है, जिसमें सत्ययुगसे लेकर कलियुगतक सभी युग सम्मिलित हैं। इकहत्तर महायुगोंका एक मन्वन्तर होता है। स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत तथा चाक्षुष—ये छः मनु अपने इन्द्र, देवता और ऋषियोंसहित व्यतीत हो चुके हैं। इस समय सातवें मनु वर्तमान हैं। इनके समयमें आदित्य, वसु तथा रुद्र आदि देवतागण हैं। सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके तेजस्वीने इन्द्रपद प्राप्त किया है। विश्वामित्र, मैं (भरद्वाज), अत्रि, जमदग्नि, कश्यप, वसिष्ठ तथा गौतम ये ही सप्तर्षि हैं। वैवस्वत मनुके महाबली शूरवीर पुत्र धर्मपरायण राजा इक्ष्वाकु आदिने इस पृथ्वीका पालन किया है। सूर्य, दक्ष, ब्रह्म, धर्म तथा रुद्र इन पाँचोंके पाँच सावर्णिसंज्ञक पुत्र और रौच्य तथा भौम आदि ये सात भविष्यमें होनेवाले मनु हैं। ये चौदहों मनु ब्रह्माके एक दिनमें पूरे हो जाते हैं। इसीका नाम कल्प है। उसके अन्तमें उसीके समान रात्रि होती है। ब्रह्माके दिनकी समाप्ति होते समय पृथ्वीपर सौ वर्षोंतक बड़ा भयंकर उत्पात होता है। उस उपद्रवके समय पृथ्वी सूखकर रसहीन हो जाती है, जिससे उसपर रहनेवाले चार प्रकारके प्राणी नष्ट हो जाते हैं। तब सूर्यदेव अग्निके समान आगकी ज्वाला उगलती हुई प्रज्वलित लपटोंकी आकारवाली किरणोंसे संयुक्त होते हैं। उनके दुःसह तापसे गाँव, नगर, शैल, वन और वृक्ष आदिके भस्म हो जानेपर कछुएकी पीठकी-सी आकृति धारण करनेवाली यह पृथ्वी तपाये हुए लोहेके पिण्डकी भाँति जान पड़ती है। तब ब्रह्माजीके अंगोंसे महामेघ उत्पन्न होते हैं और घोर गर्जना करते हुए समस्त आकाशको आच्छादित कर लेते हैं। वे सौ वर्षोंतक बड़ी भारी वर्षा करते हैं। उस जलसे सूर्यद्वारा उत्पन्न की हुई प्रचण्ड आग बुझ जाती है। वे महामेघ पुनः सौ वर्षोंतक भयंकर वृष्टि करते हैं। उस वृष्टिके जलसे समुद्र अपनी मर्यादा लाँघकर क्षोभको प्राप्त होते हैं। उस समय पृथ्वी जलमें डूबकर पातालके मूलमें चली जाती है। वह ब्रह्माजीकी शक्तिसे अवलम्बित होनेके कारण किसी प्रकार नष्ट नहीं होती। तदनन्तर ब्रह्माजीके निःश्वाससे वायु प्रकट होती है, जो कल्पान्तमें उत्पन्न हुए समस्त महामेघोंको छिन्न-भिन्न कर देती है। फिर वह वायु भी सौ वर्षोंतक दुर्निवार वेगसे बहती रहती है। तत्पश्चात् उस वायुको भगवान्के नाभिकमलमें छोड़कर भगवान् ब्रह्मा उस जलमें योगनिद्राका आश्रय लेकर सोते हैं। योगनिद्रामें पड़े-पड़े ब्रह्माजीकी उतनी ही बड़ी रात व्यतीत होती है, जितना बड़ा उनका दिन है। रात बीतनेपर ब्रह्माजी उठते हैं और भगवान् विष्णुकी आज्ञासे पूर्ववत् सब जीवोंकी वेगपूर्वक सृष्टि करने लगते हैं। प्रत्येक कल्पमें समुचित रूप धारण करके भगवान् विष्णु जगत्का पालन करते हैं। इस कल्पमें उन्होंने श्वेत वर्णके यज्ञ वाराहका रूप धारण किया और उसी वाराह-शरीरसे भूतलपर विहार करते हुए उन्होंने अपने पूर्व कल्पोंके निश्चित निवासस्थान वेंकटाचल पर्वतपर पदार्पण किया। स्वामिपुष्करिणीके तटपर चिरकालतक विचरण करते हुए वाराहजीने कमलके आसनपर विराजमान भक्तियुक्त ब्रह्माजीको देखा। ब्रह्माजीने भक्तिभावन भगवान्की पूजा करके प्रार्थना की—'प्रभो! अपने पुरातन दिव्य स्वरूपको धारण कीजिये।' ब्रह्माजीकी यह विनय सुनकर भगवान्ने वाराहकी आकृति त्याग दी और अनन्य भावसे भजन करनेयोग्य विश्वमय रूपको ग्रहण कर लिया।
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- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१५
वेंकटाचलपर राजा शंख और महर्षि अगस्त्य आदिको भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन तथा वरप्राप्ति
अर्जुनने पूछा—मुने! भगवान् श्रीहरि नेत्रोंद्वारा दर्शन और मनद्वारा चिन्तन आदिके विषय नहीं हैं, तो भी वे यहाँ मनुष्योंको प्रत्यक्ष कैसे हुए?
भरद्वाजजीने कहा—अर्जुन! हैहयवंशमें श्रुत नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जिन्होंने पृथ्वी और यहाँकी प्रजाका दीर्घकालतक अपनी सन्तानकी भाँति पालन किया था। उनके पुत्र शंख हुए, जो समस्त गुणोंके निधि और सब शास्त्रोंमें कुशल थे। उन्होंने भी पृथ्वीका न्यायपूर्वक शासन किया। कमलके समान नेत्रोंवाले जगदीश्वर भगवान् विष्णुमें राजा शंखकी निश्चल एवं अनन्य भक्ति थी। उन्होंने दृढ़ निश्चयपूर्वक अद्भुत महिमावाले देवाधिदेव जगत्पति अनन्य पुरुषोत्तमका सदैव ध्यान करते हुए नाना प्रकारके व्रत, दान और पुण्य किये तथा वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य भगवान् मधुसूदनकी प्रीतिके लिये ही अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान किया। भक्तवत्सल केशवमें मन लगाकर वे प्रतिदिन गोविन्दका स्मरण, अविनाशी अच्युतका जप, कमलनयन विष्णुका पूजन तथा शार्ङ्ग धनुषधारी श्रीहरिका कीर्तन करते थे। पुराणके विद्वानोंद्वारा कही जानेवाली पवित्र भगवत्कथाओंको, जो संसार-समुद्रसे पार उतारनेवाली हैं, वे सदैव सुना करते थे। भगवत्प्रीतिके लिये ही ब्राह्मणोंकी पूजा-अर्चा करते थे। इस प्रकार सर्वथा अविराम गतिसे श्रीहरिकी आराधनामें संलग्न होनेपर भी राजा शंखने परम स्वतन्त्र भगवान् पुरुषोत्तमका कभी प्रत्यक्ष दर्शन नहीं पाया। भगवान्का दर्शन न पानेसे उनका हृदय शोकसे व्याकुल हो गया, वे बड़ी चिन्ताको प्राप्त हुए।
शंख बोले—मैंने बीते हुए सहस्राधिक जन्मोंमें बहुत बड़ा पाप किया है, जिसके कारण आजतक मुझे भगवान् विष्णुका दर्शन नहीं प्राप्त हुआ। अनेक जन्मोंमें उपार्जित सम्पूर्ण तपस्याओंका यह एक ही अखण्ड फल है कि मधुसूदन भगवान् विष्णुका दर्शन प्राप्त हो। अहो! भगवान् मेरे नेत्रोंके समक्ष कैसे प्रकट होंगे? कानोंसे उनके वचन सुननेका सौभाग्य कैसे प्राप्त होगा?
इस प्रकार चिन्तासे व्याकुल होकर जब राजाके मनमें जीवित रहनेकी अभिलाषा नहीं रह गयी, तब अव्यक्तमूर्ति भगवान् विष्णुने सबके सुनते हुए कहा—'राजन्! तुम शोकके अधीन न होओ। तुम तो एकमात्र मेरी शरणमें आये हुए साधु भक्त हो। मैं तुम्हारा त्याग कैसे कर सकता हूँ। यह वेंकट नामक पर्वत तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। राजन्! यहाँका निवास मुझे वैकुण्ठसे भी अधिक प्रिय है। उस श्रेष्ठ पर्वतपर जाकर भक्तिपूर्वक तपस्या करते रहनेपर मैं तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा। तुम्हारी ही तरह महर्षि अगस्त्य भी ब्रह्माजीकी आज्ञासे अंजनाचलके महानिवासमें तपस्या करनेके लिये आवेंगे। उसी पवित्र पर्वतपर निवास करते हुए तुम भी मेरी आराधना करो। इससे मेरा दर्शन प्राप्त कर लोगे।'
भगवान्के इस प्रकार आज्ञा देनेपर राजा शंखको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मन-ही-मन अपनेको धन्य माना और अपने पुत्र वज्रको प्रजापालनके कार्यमें नियुक्त करके भगवान् विष्णुके दर्शनकी आकाङ्क्षासे नारायणगिरिको प्रस्थान किया। उस पर्वतके ऊँचे शिखरपर पहुँचकर उन्होंने अमृतके समान दिव्य जलसे परिपूर्ण कल्याणमयी स्वामिपुष्करिणी देखी और उसके किनारे कुटी बनाकर स्नान, पान आदिके द्वारा सन्तोष लाभ किया। जगदीश जनार्दनको अपने समस्त कर्म समर्पित करके राजा शंख प्रतिदिन जप और
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ध्यानमें संलग्न रहने लगे। वहाँ उन्होंने तपस्या भी की। इसी समय सैकड़ों मुनियोंसे घिरे हुए अगस्त्यजी भी उस आदिपर्वतपर आये और वहाँकी आश्चर्यमयी वस्तुओंको देखते हुए सब ओर विचरते रहे। स्कन्दधारा आदि तीर्थोंमें स्नान करके वहाँ उन्होंने जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी बहुत समयतक आराधना की। परंतु कमलनयन भगवान् श्रीहरिको कहीं भी प्रत्यक्ष नहीं देखा। इससे वे चिन्ता और शोकमें डूब गये। उस समय बृहस्पति, शुक्र तथा राजा उपरिचर और वसु—ये सब महानुभाव अगस्त्यजीके पास आये और इस प्रकार बोले—"मुनिश्रेष्ठ! लोकनाथ ब्रह्माजीने हमें जो आज्ञा दी है, उसे हम आपको बता रहे हैं—'दक्षिण दिशामें वेंकटाचल नामक पर्वत है। वहाँका निवासस्थान भगवान् विष्णुको श्वेतद्वीपसे भी अधिक प्रिय है। जगद्गुरु गोविन्द उस पर्वतपर महर्षि अगस्त्य तथा राजा शंखको अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन करायेंगे। उस समय सब देवताओं, ऋषियों तथा अन्य सब लोगोंको भी देवाधिदेव श्रीहरिका दर्शन होगा। यह बात शीघ्र ही होनेवाली है।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर हमलोग यहाँ आये हैं और भाग्यवश यहाँ आपका दर्शन भी हमें मिल गया। अब हम आपके साथ स्वामिपुष्करिणीके तटपर भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ राजा शंखका भी दर्शन करेंगे।" यह सुनकर अगस्त्य मुनि शोकसमूहका त्याग करके शीघ्र ही उन सबके साथ चल दिये। उस समय वहाँ यत्र-तत्र चौड़ी शिलाओंपर बैठे हुए तथा भगवान् विष्णुके गुण-वैभवका गान करते हुए अनेकानेक सिद्ध पुरुष उन्हें दिखायी दिये। फिर उन्होंने निर्मल जलवाली दिव्य स्वामिपुष्करिणीका भी दर्शन किया और उसके किनारे आश्रम बनाकर रहनेवाले राजा शंखको भी देखा, जो मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले समस्त कर्म भगवान् विष्णुको समर्पित करके विराजमान थे। उन्हें आया देख राजाने सबका यथावत् सत्कार किया। फिर सब लोग एक-दूसरेका समादर करते हुए वहाँ बैठे और उत्कण्ठित होकर गोविन्दके नामोंका कीर्तन करते हुए कृतार्थ हो गये।
सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् विष्णुमें मन लगाकर उन्हींकी पूजा और स्तुतिमें लगे हुए उन सब लोगोंके तीन दिन व्यतीत हो गये। तीसरे दिन रातमें उन सबको नींद आ गयी। फिर चौथे पहरमें उत्तम सपना देखा—भगवान् पुरुषोत्तम हाथोंमें शंख, चक्र और गदा धारण किये प्रसन्नमुखसे वर देनेके लिये खड़े हैं। उनके नेत्र खिले हुए हैं। भगवान्की यह झाँकी देखकर सभी प्रसन्नचित्त होकर उठे और कुटीसे निकलकर सबने स्वामिपुष्करिणीके पावन जलमें विधिपूर्वक स्नान किया। तत्पश्चात् प्रातःकालोचित समस्त कर्मोंका अनुष्ठान करके भगवान् विष्णुकी आराधना करनेके लिये वे राजाके आश्रमपर लौटे। मार्गमें पक्षियोंद्वारा ऐसे शुभ शकुनकी सूचना मिली जो तत्काल कल्याणकी प्राप्ति करानेवाला था। उस शकुनको देखकर सबको यह विश्वास हो गया कि भगवान्का कृपाप्रसाद अवश्य प्राप्त होगा।
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१७
तदनन्तर त्रिभुवन-विधाता भगवान् जनार्दनका पूजन करके उन्होंने वेदवर्णित पवित्र स्तोत्रोंद्वारा उनका स्तवन किया। स्तुतिके अन्तमें महर्षि अगस्त्य और राजा शंख भगवान्के अष्टाक्षर (ॐ नमो नारायणाय) मन्त्रका जप करने लगे।
इस प्रकार जगत्स्वामी श्रीहरिमें चित्त लगाये हुए उन महात्माओंके आगे एक महान् अद्भुत तेज प्रकट हुआ, जो कोटि-कोटि सूर्य-चन्द्रमा और अग्नियोंके तेजपुंज-सा प्रतीत होता था। उस तेजका दर्शन करके सबको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने उसके भीतर परमानन्दविग्रह दिव्यरूपधारी भगवान् श्रीनारायणका चिन्तन किया, जो मन और वाणीके मार्गसे सर्वथा दूर हैं, अपने विख्यात ऐश्वर्यसे सदा प्रकाशित होते हैं, सहस्र नेत्र, सहस्र भुजा और सहस्र चरणोंसे संयुक्त हैं, तपाये हुए सुवर्णके समान देदीप्यमान कान्तिसे जिनका रूप बड़ा मनोहर लगता है। जो अपने वक्षःस्थलपर लक्ष्मीको धारण करते और कौस्तुभमणिसे सुशोभित होते हैं। जिनका स्वरूप अचिन्त्य है। जो अनादि और अनन्त हैं, समस्त ब्रह्माण्डको अपने-आपमें ही प्रकाशित करते हैं और सर्वत्र व्यापक हैं। उन्हीं भगवान् जगन्नाथको अपने सामने देखकर अगस्त्य और शंख आदि सब मुनियोंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। सबने बार-बार भगवान्के चरणोंमें मस्तक झुकाया। उस समय लोकरक्षाके लिये सब ओर भ्रमण करनेवाले भगवान्के तेज-बलसम्पन्न आयुध उनकी सेवामें उपस्थित हो गये। सूर्यके समान तेजस्वी चक्र, दिव्य गदा, नन्दक नामक खड्ग, कमल तथा भयानक गर्जना करनेवाला चन्द्रमाके समान कान्तिमान् पांचजन्य शंख—ये सभी उपस्थित हो गये। शंखने अपनी ध्वनिसे समस्त ब्रह्माण्डको परिपूर्ण कर दिया। उस शंखनादको सुनकर वसिष्ठ आदि मुनि, गन्धर्व, नाग, किन्नर, विष्वक्सेन, गरुड़ तथा जय-विजय आदि श्वेतद्वीपनिवासी पार्षद भी आये। देववृक्षोंसे उत्पन्न पारिजात आदि फूलोंकी वहाँ अद्भुत वर्षा होने लगी, जिसकी घनीभूत सुगन्धसे सबका अन्तःकरण आमोदित हो उठा। भक्तवत्सल कमलनयन भगवान् विष्णुको प्रसन्न देखकर सब देवताओं और ऋषियोंने नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे साष्टांग प्रणामपूर्वक स्तवन किया।
ब्रह्मा आदि देवता बोले— दयासागर भगवान् विष्णु! आपकी जय हो। कमलनयन! आपकी जय हो। समस्त लोकोंको एकमात्र वर देनेवाले भक्तार्तिभंजन ! आपकी जय हो, जय हो। आप अनन्त हैं, अविनाशी हैं, परम शान्त हैं। मन और वाणीकी आपतक पहुँच नहीं है। आपका स्वरूप विशुद्ध सच्चिदानन्दमय है। आपको सम्यक् रूपसे कौन जानता है? विद्वान् पुरुष आपको सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, स्थूलसे भी स्थूल, सबके भीतर विराजमान, प्रकृतिसे परे अच्युत पुरुष कहते हैं। वेदान्तका सारभूत ब्रह्म आपका स्वरूप है। आप सबके भीतर और बाहर भी विद्यमान हैं। मायाके अधीन रहनेवाले देहाभिमानी पुरुषोंमेंसे कौन आपका वर्णन करनेमें समर्थ है? आपका यह स्वरूप अत्यन्त भयदायक है, इसे देखकर हम भयसे उद्विग्न हुए जाते हैं; अतः आप शान्तरूप धारण करें।
ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् गरुडध्वजने उसी क्षण सौम्यरूप धारण कर लिया। उनका मुख चन्द्रमण्डलके समान शोभा पाने लगा। प्रचण्ड तेज शान्त हो गया। श्रीअंगोंकी श्यामकान्ति नील कमलदलके समान सुशोभित हुई। दिव्य शरीरपर सुनहरे रंगका पीताम्बर छवि पा रहा था। भगवान् रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित दिखायी देने लगे। उनके चारों हाथ शंख, चक्र, गदा और पद्मसे शोभायमान थे। भगवान् लक्ष्मीपतिके इस मनोहर रूपको देखकर सबने बार-बार प्रणाम किया। भगवान्ने अभीष्ट वरदानसे ब्रह्मा आदि देवताओंको सन्तुष्ट करके मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे कहा— 'मुनीन्द्र! तुमने
३१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मेरे लिये कठोर व्रतोंका अनुष्ठान करके बहुत क्लेश उठाया है। अतः मैं तुम्हें अभीष्ट वरदान दूँगा। बोलो क्या चाहते हो?' भगवान् लक्ष्मीपतिका यह वचन सुनकर अगस्त्यजीके सम्पूर्ण अंगोंमें रोमांच हो आया। वे भगवान्को बार-बार प्रणाम करके बोले—'प्रभो! आपने जो मेरा इतना आदर किया, इसीसे मैंने जो भी हवन किया है, जो भी तप, स्वाध्याय और श्रवण किया है वह सब सफल हो गया। भगवन्! मैं तो आपको ढूँढ़ रहा था और आप मुझे ढूँढ़ते हुए आ गये। आपकी कृपासे मैं सब कुछ पहले ही पा गया हूँ। माधव! इस समय बहुत सोचने-विचारनेपर भी मुझे ऐसी कोई वस्तु नहीं दिखायी देती, जो प्राप्त करने योग्य हो। अतः आपके चरणारविन्दोंमें निरन्तर ऐसी ही भक्ति बनी रहे, यही कृपा कीजिये। सुवर्णमुखरी नदीके जलमें स्नान करके जो लोग वेंकटाचलपर विराजमान आपका दर्शन करें, वे भोग और मोक्षके भी भागी हों। भगवन्! थोड़ी आयुवाले अज्ञानी मनुष्य व्रत, स्वाध्याय और कर्मोंद्वारा आपका दर्शन नहीं कर सकते। अतः आप सबपर कृपा करनेके लिये सदैव उस पर्वतपर निवास कीजिये और सबको मनोवांछित वस्तु देनेवाले होइये।'
श्रीभगवान्ने कहा—ब्रह्मन्! तुमने जो प्रार्थना की है वह सब पूर्ण होगी। आजसे वैकुण्ठ नामवाले इस पर्वतपर मैं सदा निवास करूँगा। सुवर्णमुखरी नदीके जलमें स्नान करके अपने पाप-पंकको धोकर जो लोग एकाग्रचित्तसे इस वैकुण्ठ शैलपर मेरा दर्शन करेंगे, वे पुनरावृत्तिसे रहित तथा केवल परमानन्दसे प्रकाशमान मेरे परम धामको प्राप्त होंगे। जो मनुष्य जिन कामनाओंकी अपेक्षासे यहाँ आकर मेरा दर्शन करेंगे, वे उन-उन कामनाओंको निःसन्देह प्राप्त कर लेंगे।
अगस्त्य मुनिसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने राजा शंखकी ओर देखा और ब्रह्मा आदिके सुनते हुए कहा—राजन्! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ, तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।
शंख बोले—भगवन्! आपके चरण-कमलोंकी सेवाके अतिरिक्त दूसरा मैं कुछ नहीं माँगता। आपके भक्त जिस गतिको पाते हैं, उसी उत्तम गतिके लिये मैं भी याचना करता हूँ।
श्रीभगवान्ने कहा—शंख! तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब उसी रूपमें प्राप्त होगा। मेरी सेवामें लगे रहनेवाले कल्याणमय पुरुषोंके लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?
तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवताओंको विदा करके भगवान् कमलनयन विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। अर्जुन! यह वेंकटाचलका प्रभाव तुम्हें बताया गया है। इस पावन कथाको श्रवण करके सब मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। ब्रह्माण्डमें भगवान् वेंकटेश्वरके समान दूसरा कोई देवता न हुआ है न होगा और वेंकटाचलके समान कोई तीर्थस्थान न हुआ है न होगा। स्वामीतीर्थके समान सरोवर अन्यत्र कहीं नहीं है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर भगवान् वेंकटेश्वरका स्मरण करते हैं, मोक्ष उनके हाथमें है। जो श्रेष्ठ मानव वेंकटाचलका माहात्म्य सुनते हैं, उन्हें इहलोक ओर परलोकमें भोग और मोक्ष प्राप्त होते हैं।
आकाशगंगातीर्थमें अंजनाकी तपस्या और उसे वायुदेवद्वारा वरदानकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें पुत्ररहित अंजना दुःखी होकर तपस्यामें संलग्न हुई। उसे देखकर मुनियोंमें श्रेष्ठ विष्णुभक्त मतंगजीने कहा—'अंजना देवि! उठो, तुम किस लिये तपस्यामें लगी हो?' अंजनाने कहा—'मुनिश्रेष्ठ! केशरी नामक श्रेष्ठ वानरने मेरे पितासे मेरे लिये याचना की। तब
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१९
पिताजीने मुझे उनकी सेवामें समर्पित कर दिया। पतिदेवके साथ सुखपूर्वक विहार करते हुए मुझे बहुत समय व्यतीत हो गया, परंतु अबतक मुझे कोई पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। मैंने किष्किन्धा महापुरीमें अनेक प्रकारके व्रत भी किये तथापि पुत्र न पाकर मुझे दुःख हुआ। अतः अब मैं तपस्यामें तत्पर हुई हूँ। विप्रवर! किस प्रकार मुझे त्रिभुवनमें प्रसिद्ध पुत्र प्राप्त होगा, यह बताइये। मैं आपके आगे मस्तक झुकाकर यही माँगती हूँ।' तब मुनिवर मतंगने अंजनासे कहा—'देवि! सुनो। यहाँसे दक्षिण दिशामें दस योजनकी दूरीपर घनाचल नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जो भगवान् नृसिंहका निवासस्थान है। उसके ऊपर परम मनोहर ब्रह्मतीर्थ है। उसके पूर्वभागमें दस योजन दूर सुवर्णमुखरी नामवाली श्रेष्ठ नदी बहती है। उस नदीके उत्तरभागमें वृषभाचल (वेंकटाचल) नामक पर्वत है और उस पर्वतके शिखरपर स्वामिपुष्करिणी तीर्थ है। वहाँ जाकर उसके शुभ जलका दर्शन करते ही तुम्हारा मन पवित्र हो जायगा। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके वाराहस्वामीको प्रणाम करो और भगवान् वेंकटेश्वरको नमस्कार करके स्वामितीर्थके उत्तर जाओ। वहाँ आकाशगंगा नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ शोभा पाता है। उसमें संकल्पपूर्वक विधिवत् स्नान करके उसके शुभ जलको पी लेना। फिर उस तीर्थके सामने खड़ी हो वायुदेवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे तपस्या करना। ऐसा करनेसे तुम्हें देवता, राक्षस, ब्राह्मण, मनुष्य तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे भी अवध्य पुत्र प्राप्त होगा।'
मुनिके ऐसा कहनेपर अंजना देवीने उन्हें बार-बार प्रणाम किया और पतिको साथ लेकर वह शीघ्र ही वेंकटाचल पर्वतपर गयी। वहाँ स्वामिपुष्करिणीमें नहाकर उसने वाराह स्वामीको प्रणाम किया और भगवान् वेंकटेश्वरके चरणोंमें भी मस्तक नवाया। तत्पश्चात् वह शीघ्र ही आकाशगंगाके तटपर गयी और उसमें नहाकर उसके उत्तम जलको पीकर उसीके तटपर तीर्थकी ओर मुख करके खड़ी हो प्राणस्वरूप वायुदेवताकी प्रसन्नताके लिये संयम एवं व्रतका पालन करती हुई तपस्या करने लगी। तब सूर्यदेवके मेषराशिपर रहते समय चित्रानक्षत्रयुक्त पूर्णिमा तिथिको परम बुद्धिमान् वायुदेव प्रकट हुए और इस प्रकार बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि! तुम कोई वर माँगो। मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा।' उनकी बात सुनकर सती अंजनाने कहा—'महाभाग! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये।' वायुदेवताने कहा—'सुमुखि! मैं ही तुम्हारा पुत्र होऊँगा और तुम्हारे नामको विश्वमें विख्यात कर दूँगा।' अंजनाको ऐसा वरदान देकर महाबली वायु वहीं रहने लगे और अंजना देवी भी वह वरदान पाकर अपने पतिके साथ बहुत प्रसन्न हुई।
वेंकटाचल-माहात्म्य (अथवा भूमिवाराहखण्ड) सम्पूर्ण।
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६. वैष्णवखण्ड (पुरुषोत्तमक्षेत्रमाहात्म्य)
३२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उत्कलखण्ड या पुरुषोत्तमक्षेत्र-माहात्म्य
o
भगवान् विष्णुका ब्रह्माजीको पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जानेका आदेश
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
'भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके तत्पश्चात् भगवान्की विजय-कथासे परिपूर्ण इतिहास-पुराणादिका कीर्तन करे।'
मुनि बोले— भगवान्! आप सब शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ तथा सब तीर्थोंके महत्त्वको जाननेवाले हैं। भगवान्! पुरुषोत्तमक्षेत्र परम पावन है, जहाँ भगवान् लक्ष्मीपति विष्णु मानवलीलाके अनुसार काष्ठमय विग्रह धारण करके विराजमान हैं, जो दर्शनमात्रसे ही सबको मोक्ष देनेवाले और सब तीर्थोंका फल प्रदान करनेवाले हैं, उनकी महिमाका हमसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।
जैमिनिजीने कहा— मुनियो! यह अत्यन्त गूढ़ रहस्य है, सुनो। यद्यपि ये भगवान् जगन्नाथ सर्वत्र व्यापक और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं तथापि यह परम उत्तम पुरुषोत्तमक्षेत्र इन महात्मा जगदीश्वरका साक्षात् स्वरूप है। वहाँ वे स्वयं ही शरीर धारण करके निवास करते हैं। इसीलिये उस क्षेत्रको भगवान्ने अपने नामसे प्रसिद्ध किया। वह क्षेत्र दस योजनके विस्तारमें है। उसका प्रादुर्भाव तीर्थराज समुद्रके जलसे हुआ है तथा वह सब ओर बालुकाराशिसे व्याप्त है। उसके मध्यभागमें महान् नीलगिरि उस तीर्थकी शोभा बढ़ाता है। पूर्वकालमें वराहरूपधारी भगवान्ने इस पृथ्वीको समुद्रके जलसे निकालकर जब सब ओरसे बराबर करके स्थापित किया और पर्वतोंद्वारा सुस्थिर कर दिया, तब ब्रह्माजीने पहलेकी भाँति समस्त चराचर जगत्की सृष्टि करके तीर्थों, सरिताओं, नदियों और क्षेत्रोंको यथास्थान स्थापित किया। तत्पश्चात् सृष्टिके भारसे पीड़ित होकर वे सोचने लगे। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—इन तीन प्रकारके तापोंसे पीड़ित होनेवाले संसारके जीव इनसे किस प्रकार मुक्त होंगे। इस प्रकार विचार करते हुए ब्रह्माजीके मनमें यह भाव आया कि मैं मुक्तिके एकमात्र कारण परमेश्वर श्रीविष्णुका स्तवन करूँ।
तब ब्रह्माजी बोले— शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगदाधार! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाला मैं ब्रह्मा आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुआ हूँ। अतः जगन्मय! अपने यथार्थ स्वरूपको आप ही जानते हैं। जिनकी मायासे महत्तत्त्व आदि सम्पूर्ण जगत् रचा गया है और जिनके निःश्वाससे प्रकट हुआ शब्दब्रह्म (वेद) ऋक्, साम और यजु—इन तीन भेदोंमें अभिव्यक्त हुआ है, जिसका सहारा लेकर मैंने सम्पूर्ण भुवनोंकी सृष्टि की है, उन्हीं आप परमात्मासे भिन्न स्थूल-सूक्ष्म, ह्रस्व-दीर्घ आदि कोई भी वस्तु नहीं है। भगवन्! तीनों गुणोंके विभागपूर्वक भिन्न-भिन्न कार्योंके रूपमें आप ही यह चराचर जगत् हैं; ठीक उसी तरह जैसे सुवर्ण ही कंकण, कुण्डल आदिके रूपमें विभासित होता है। प्रभो! आप ही सृष्टिकर्ता और सृज्य पदार्थ हैं तथा आप ही पोषक और पोष्य जगत् हैं। परमेश्वर! आप ही आधार, आधेय और उन दोनोंको धारण करनेवाले हैं। मनुष्य आपकी ही प्रेरणासे कर्म करता है और आप ही द्वारा की हुई व्यवस्थासे वह कर्मानुसार गति प्राप्त करता है। परमेश्वर! आप ही इस जगत्की गति, भर्ता और साक्षी हैं। चराचरगुरो! आप अखिल जीवस्वरूप हैं। दयामय जगन्नाथ! मैं सदा आपकी शरणमें हूँ, आप मुझपर प्रसन्न होइये।
ब्रह्मा और यमराजके द्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन
| ३२२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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| ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर मेघके समान श्याम, शंख, चक्र आदि चिह्नोंसे उपलक्षित भगवान् विष्णु गरुड़पर आरूढ़ हो वहाँ प्रकट हुए। उनका मुखकमल पूर्णतः प्रकाशमान था। उन्होंने ब्रह्माजीसे कहा— 'ब्रह्मन् ! तुम जिस कार्यके लिये मेरी स्तुति करते हो, वह सम्भव नहीं जान पड़ता। तथापि यदि इसके लिये तुम्हारा उद्योग है, तो जिस क्रमसे यह सिद्ध होता है, वह तुम्हें बतला रहा हूँ। ब्रह्मन् ! मैं तुम हो और तुम मैं हूँ। सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त (विष्णुमय) है। जहाँ तुम्हारी रुचि है, वहाँ मेरी है। अतः तुम्हारी मनोवांछाकी सिद्धिका उपाय बतलाता हूँ— समुद्रके उत्तर तटपर महानदीके दक्षिण भागमें जो प्रदेश है, वह इस भूतलपर सब तीर्थोंका फल देनेवाला है। वहाँ जो उत्तम बुद्धिवाले मनुष्य निवास करते हैं, वे अन्य जन्मोंमें किये हुए पुण्यका फल भोगते हैं। ब्रह्मन् ! समुद्रके किनारे जो नीलपर्वत सुशोभित हो रहा है, वह पग-पगपर अत्यन्त श्रेष्ठ और परम पावन है। वह स्थान इस पृथ्वीपर गुप्त है। वहाँ सब प्रकारके संगोंसे दूर रहनेवाला मैं देह धारण करके निवास करता हूँ और क्षर तथा अक्षर दोनोंसे ऊपर उठकर पुरुषोत्तमस्वरूपमें | विद्यमान हूँ। मेरा वह पुरुषोत्तमक्षेत्र सृष्टि और प्रलयसे आक्रान्त नहीं होता। ब्रह्मन् ! चक्र आदि चिह्नोंसे युक्त मेरा जैसा स्वरूप यहाँ देखते हो, वैसा ही वहाँ जाकर भी देखोगे। नीलाचलके भीतरकी भूमिमें कल्पोंतक रहनेवाले अक्षयवटकी जड़के समीप पश्चिम दिशामें जो रौहिण नामसे विख्यात कुण्ड है, उसके किनारे निवास करते हुए मुझ पुरुषोत्तमको जो चर्म-चक्षुओंसे देखते हैं, वे उसके जलसे क्षीणपाप होकर मेरे सायुज्यको प्राप्त कर लेते हैं। महाभाग ! वहाँ जाओ। उस तीर्थमें मेरा दर्शन करके ध्यान करते समय तुम्हारे समक्ष पुरुषोत्तमक्षेत्रकी श्रेष्ठ महिमा स्वतः प्रकाशमें आ जायगी। वह क्षेत्र श्रुतियों, स्मृतियों, इतिहासों और पुराणोंमें गुप्त है। मेरी मायासे वह किसीको ज्ञात नहीं होता। मेरी ही कृपासे अब वह प्रकाशमें आयेगा और सबको प्रत्यक्ष उपलब्ध होगा। व्रत, तीर्थ, यज्ञ और दानका जो पुण्य बताया गया है, वह सब यहाँ एक दिनके निवाससे ही प्राप्त हो जाता है और एक निःश्वासभर निवास करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है।' ब्राह्मणो ! इस प्रकार ब्रह्माजीको आदेश देकर भगवान् पुरुषोत्तम सबके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। |
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यमराज तथा मार्कण्डेयजीके द्वारा भगवान्की स्तुति और पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा
| जैमिनिजी कहते हैं—मनुष्य जिनका नाम लेकर सब पापोंसे मुक्त हो जाता है, उन्हींके दर्शन करनेपर क्या मोक्ष दुर्लभ होगा? मनसे भगवान् विष्णुका चिन्तन करते हुए यदि मनुष्य प्राणत्याग करता है, तो वह भी मुक्त हो जाता है। फिर जिसने साक्षात् भगवान्का दर्शन कर लिया, वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है तो क्या | आश्चर्य है?* पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा अद्भुत है। वह क्षेत्र अज्ञानियोंको भी मुक्ति देनेवाला है। फिर जो सदैव शान्त, वैराग्य और ज्ञानसे संयुक्त हैं, ऐसे मनुष्योंके लिये तो कहना ही क्या है? <br> ऋषियोंने पूछा—मुने! नीलाचलपर भगवान् विष्णुका दर्शन करके ब्रह्माजीने क्या किया?<br> जैमिनिजी बोले—पुरुषोत्तमक्षेत्रका अत्यन्त |
* मनसा ध्यायन् विष्णुं त्यजन् प्राणान् विमुच्यते। साक्षात्कृतो भगवतः किं चित्रं मुक्तिमेति यत्॥
\hspace{8cm}(स्क० पु०, वै० उ० २। ९-१०)$
- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३२३
अद्भुत माहात्म्य देखकर ब्रह्मा जबतक भगवान् विष्णुका ध्यान करते रहे, तबतक पितरोंके स्वामी यमराज अपने अधिकारके संकुचित होनेसे व्याकुल होकर दीनमुखसे नीलाचलपर्वतपर आये और वहाँ भगवान् लक्ष्मीपतिका दर्शन तथा उन्हें साष्टांग प्रणाम करके अपने अधिकारकी दृढ़ताके लिये भगवान् जगन्नाथकी स्तुति करने लगे।
यमराज बोले— सृष्टि, पालन और संहारके एकमात्र कारण देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। सूतमें मणियोंकी भाँति आपमें यह सब जगत् गुँथा हुआ है। आपने ही इस विश्वको धारण किया है, आपने ही इसकी सृष्टि की है तथा आपहीने इसका पालन-पोषण भी किया है। चन्द्रमा और सूर्य आदिका रूप धारण करके आप सदा समस्त संसारको प्रकाशित करते हैं। आप इस विश्वके स्वामी, जगत्की उत्पत्तिके कारण, संसारके आवासस्थान, जगद्गुरु, लोकसाक्षी तथा आदि-अन्तसे रहित हैं। आपको मैं प्रणाम करता हूँ। प्रभो! आप उत्तम करुणारूपी जलसे भरे हुए समुद्र हैं, आपको नमस्कार है। आपका वैभव पर, अपर एवं परात्परसे भी अतीत है। आप ही इस विश्वके उत्पादक हैं। संसारके सन्तापरूपी हिमको सुखा डालनेवाले सूर्य! आपको नमस्कार है। दीनबन्धो! आपको नमस्कार है। आपने अपनी मायासे समस्त वैभवोंकी रचना की है, तीनों गुण आपकी रज्जु (रस्सी) हैं, आपको मेरा नमस्कार है। कमल-केसरकी भाँति निर्मल पीत वस्त्र धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आपके कटाक्षपातमात्रसे ही संसारकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं तथा यह ऊँच-नीच जगत् बार-बार जन्म लेता है। नीलाचलकी गुफामें निवास करनेवाले आप कृपानिधान प्रभुको मैं प्रणाम करता हूँ। आप शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले तथा सबको शुभ प्रदान करनेवाले हैं। शरणागत प्राणियोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले मुरारिको मैं नमस्कार करता हूँ। आपका मनोहर एवं विशाल वक्ष श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणिसे उद्भासित है,आपको नमस्कार है। आपके युगल चरणारविन्दोंका आश्रय लेनेसे ऐश्वर्यभागिनी लक्ष्मीकी सब लोग शरण लेते हैं और वे सबको पृथक्-पृथक् ऐश्वर्य देनेमें समर्थ होती हैं। वे लक्ष्मी आपकी परा और अपरा प्रकृति हैं। वे समस्त शुभ लक्षणोंसे लक्षित होती हैं तथा आप लक्ष्मीपतिके वक्षःस्थलपर नित्य निवास करती हैं। भगवन्! आपकी प्रिया उन लक्ष्मीको मैं प्रणाम करता हूँ।
उस समय धर्मराजके इस प्रकार स्तुति करनेपर परम सन्तोषको प्राप्त हुए भगवान् लक्ष्मीपतिने अपने वामपार्श्वमें बैठी हुई लक्ष्मीजीकी ओर कटाक्षपूर्वक देखकर उनसे कुछ कहनेके लिये संकेत किया। उनकी प्रेरणा पाकर संसारदुःखका विनाश करनेवाली लक्ष्मीने सब लोगोंके कल्याणके लिये यमराजसे कहा—'सूर्यनन्दन! तुम जिस उद्देश्यसे यहाँ हम दोनोंकी स्तुति करते हो, उसकी सिद्धि इस क्षेत्रमें तो दुर्लभ है; क्योंकि हमारे लिये इस पुरुषोत्तमक्षेत्रका त्याग करना असम्भव है। इस क्षेत्रमें कभी कर्मोंके फल नहीं प्राप्त होते। यहाँ बसनेवाले मनुष्यों और पशु-पक्षियोंके पाप भी जलकर भस्म हो जाते हैं। इस क्षेत्रमें नीलेन्द्रमणिके समान मनोहर श्यामविग्रहधारी साक्षात् भगवान् नारायणका दर्शन करके मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। अतः इसको छोड़कर अन्यत्र कर्मभूमिमें ही तुम्हारा अधिकार है। जो तुम्हारे भी प्रपितामह हैं, वे ब्रह्माजी इस क्षेत्रका माहात्म्य जानकर भगवान् गदाधरकी स्तुति करते हैं। इसलिये जो प्राणी यहाँ निवास करते हैं, वे तुम्हारे वशमें जानेयोग्य नहीं हैं। वैवस्वत! यहाँ जीवन्मुक्त एवं मुमुक्षुपुरुष निवास करते हैं।'
लक्ष्मीजीके इस प्रकार समझानेपर लज्जासे विनीत हो यमराजने कहा—सुरेश्वरि! आपने जो