संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ध्यानमें संलग्न रहने लगे। वहाँ उन्होंने तपस्या भी की। इसी समय सैकड़ों मुनियोंसे घिरे हुए अगस्त्यजी भी उस आदिपर्वतपर आये और वहाँकी आश्चर्यमयी वस्तुओंको देखते हुए सब ओर विचरते रहे। स्कन्दधारा आदि तीर्थोंमें स्नान करके वहाँ उन्होंने जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी बहुत समयतक आराधना की। परंतु कमलनयन भगवान् श्रीहरिको कहीं भी प्रत्यक्ष नहीं देखा। इससे वे चिन्ता और शोकमें डूब गये। उस समय बृहस्पति, शुक्र तथा राजा उपरिचर और वसु—ये सब महानुभाव अगस्त्यजीके पास आये और इस प्रकार बोले—"मुनिश्रेष्ठ! लोकनाथ ब्रह्माजीने हमें जो आज्ञा दी है, उसे हम आपको बता रहे हैं—'दक्षिण दिशामें वेंकटाचल नामक पर्वत है। वहाँका निवासस्थान भगवान् विष्णुको श्वेतद्वीपसे भी अधिक प्रिय है। जगद्गुरु गोविन्द उस पर्वतपर महर्षि अगस्त्य तथा राजा शंखको अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन करायेंगे। उस समय सब देवताओं, ऋषियों तथा अन्य सब लोगोंको भी देवाधिदेव श्रीहरिका दर्शन होगा। यह बात शीघ्र ही होनेवाली है।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर हमलोग यहाँ आये हैं और भाग्यवश यहाँ आपका दर्शन भी हमें मिल गया। अब हम आपके साथ स्वामिपुष्करिणीके तटपर भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ राजा शंखका भी दर्शन करेंगे।" यह सुनकर अगस्त्य मुनि शोकसमूहका त्याग करके शीघ्र ही उन सबके साथ चल दिये। उस समय वहाँ यत्र-तत्र चौड़ी शिलाओंपर बैठे हुए तथा भगवान् विष्णुके गुण-वैभवका गान करते हुए अनेकानेक सिद्ध पुरुष उन्हें दिखायी दिये। फिर उन्होंने निर्मल जलवाली दिव्य स्वामिपुष्करिणीका भी दर्शन किया और उसके किनारे आश्रम बनाकर रहनेवाले राजा शंखको भी देखा, जो मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले समस्त कर्म भगवान् विष्णुको समर्पित करके विराजमान थे। उन्हें आया देख राजाने सबका यथावत् सत्कार किया। फिर सब लोग एक-दूसरेका समादर करते हुए वहाँ बैठे और उत्कण्ठित होकर गोविन्दके नामोंका कीर्तन करते हुए कृतार्थ हो गये।
सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् विष्णुमें मन लगाकर उन्हींकी पूजा और स्तुतिमें लगे हुए उन सब लोगोंके तीन दिन व्यतीत हो गये। तीसरे दिन रातमें उन सबको नींद आ गयी। फिर चौथे पहरमें उत्तम सपना देखा—भगवान् पुरुषोत्तम हाथोंमें शंख, चक्र और गदा धारण किये प्रसन्नमुखसे वर देनेके लिये खड़े हैं। उनके नेत्र खिले हुए हैं। भगवान्की यह झाँकी देखकर सभी प्रसन्नचित्त होकर उठे और कुटीसे निकलकर सबने स्वामिपुष्करिणीके पावन जलमें विधिपूर्वक स्नान किया। तत्पश्चात् प्रातःकालोचित समस्त कर्मोंका अनुष्ठान करके भगवान् विष्णुकी आराधना करनेके लिये वे राजाके आश्रमपर लौटे। मार्गमें पक्षियोंद्वारा ऐसे शुभ शकुनकी सूचना मिली जो तत्काल कल्याणकी प्राप्ति करानेवाला था। उस शकुनको देखकर सबको यह विश्वास हो गया कि भगवान्का कृपाप्रसाद अवश्य प्राप्त होगा।