भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

३१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ध्यानमें संलग्न रहने लगे। वहाँ उन्होंने तपस्या भी की। इसी समय सैकड़ों मुनियोंसे घिरे हुए अगस्त्यजी भी उस आदिपर्वतपर आये और वहाँकी आश्चर्यमयी वस्तुओंको देखते हुए सब ओर विचरते रहे। स्कन्दधारा आदि तीर्थोंमें स्नान करके वहाँ उन्होंने जगदीश्वर भगवान् विष्णुकी बहुत समयतक आराधना की। परंतु कमलनयन भगवान् श्रीहरिको कहीं भी प्रत्यक्ष नहीं देखा। इससे वे चिन्ता और शोकमें डूब गये। उस समय बृहस्पति, शुक्र तथा राजा उपरिचर और वसु—ये सब महानुभाव अगस्त्यजीके पास आये और इस प्रकार बोले—"मुनिश्रेष्ठ! लोकनाथ ब्रह्माजीने हमें जो आज्ञा दी है, उसे हम आपको बता रहे हैं—'दक्षिण दिशामें वेंकटाचल नामक पर्वत है। वहाँका निवासस्थान भगवान् विष्णुको श्वेतद्वीपसे भी अधिक प्रिय है। जगद्गुरु गोविन्द उस पर्वतपर महर्षि अगस्त्य तथा राजा शंखको अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन करायेंगे। उस समय सब देवताओं, ऋषियों तथा अन्य सब लोगोंको भी देवाधिदेव श्रीहरिका दर्शन होगा। यह बात शीघ्र ही होनेवाली है।' ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर हमलोग यहाँ आये हैं और भाग्यवश यहाँ आपका दर्शन भी हमें मिल गया। अब हम आपके साथ स्वामिपुष्करिणीके तटपर भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ राजा शंखका भी दर्शन करेंगे।" यह सुनकर अगस्त्य मुनि शोकसमूहका त्याग करके शीघ्र ही उन सबके साथ चल दिये। उस समय वहाँ यत्र-तत्र चौड़ी शिलाओंपर बैठे हुए तथा भगवान् विष्णुके गुण-वैभवका गान करते हुए अनेकानेक सिद्ध पुरुष उन्हें दिखायी दिये। फिर उन्होंने निर्मल जलवाली दिव्य स्वामिपुष्करिणीका भी दर्शन किया और उसके किनारे आश्रम बनाकर रहनेवाले राजा शंखको भी देखा, जो मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाले समस्त कर्म भगवान् विष्णुको समर्पित करके विराजमान थे। उन्हें आया देख राजाने सबका यथावत् सत्कार किया। फिर सब लोग एक-दूसरेका समादर करते हुए वहाँ बैठे और उत्कण्ठित होकर गोविन्दके नामोंका कीर्तन करते हुए कृतार्थ हो गये।

सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् विष्णुमें मन लगाकर उन्हींकी पूजा और स्तुतिमें लगे हुए उन सब लोगोंके तीन दिन व्यतीत हो गये। तीसरे दिन रातमें उन सबको नींद आ गयी। फिर चौथे पहरमें उत्तम सपना देखा—भगवान् पुरुषोत्तम हाथोंमें शंख, चक्र और गदा धारण किये प्रसन्नमुखसे वर देनेके लिये खड़े हैं। उनके नेत्र खिले हुए हैं। भगवान्की यह झाँकी देखकर सभी प्रसन्नचित्त होकर उठे और कुटीसे निकलकर सबने स्वामिपुष्करिणीके पावन जलमें विधिपूर्वक स्नान किया। तत्पश्चात् प्रातःकालोचित समस्त कर्मोंका अनुष्ठान करके भगवान् विष्णुकी आराधना करनेके लिये वे राजाके आश्रमपर लौटे। मार्गमें पक्षियोंद्वारा ऐसे शुभ शकुनकी सूचना मिली जो तत्काल कल्याणकी प्राप्ति करानेवाला था। उस शकुनको देखकर सबको यह विश्वास हो गया कि भगवान्‌का कृपाप्रसाद अवश्य प्राप्त होगा।

  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१७

तदनन्तर त्रिभुवन-विधाता भगवान् जनार्दनका पूजन करके उन्होंने वेदवर्णित पवित्र स्तोत्रोंद्वारा उनका स्तवन किया। स्तुतिके अन्तमें महर्षि अगस्त्य और राजा शंख भगवान्‌के अष्टाक्षर (ॐ नमो नारायणाय) मन्त्रका जप करने लगे।

इस प्रकार जगत्स्वामी श्रीहरिमें चित्त लगाये हुए उन महात्माओंके आगे एक महान् अद्भुत तेज प्रकट हुआ, जो कोटि-कोटि सूर्य-चन्द्रमा और अग्नियोंके तेजपुंज-सा प्रतीत होता था। उस तेजका दर्शन करके सबको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने उसके भीतर परमानन्दविग्रह दिव्यरूपधारी भगवान् श्रीनारायणका चिन्तन किया, जो मन और वाणीके मार्गसे सर्वथा दूर हैं, अपने विख्यात ऐश्वर्यसे सदा प्रकाशित होते हैं, सहस्र नेत्र, सहस्र भुजा और सहस्र चरणोंसे संयुक्त हैं, तपाये हुए सुवर्णके समान देदीप्यमान कान्तिसे जिनका रूप बड़ा मनोहर लगता है। जो अपने वक्षःस्थलपर लक्ष्मीको धारण करते और कौस्तुभमणिसे सुशोभित होते हैं। जिनका स्वरूप अचिन्त्य है। जो अनादि और अनन्त हैं, समस्त ब्रह्माण्डको अपने-आपमें ही प्रकाशित करते हैं और सर्वत्र व्यापक हैं। उन्हीं भगवान् जगन्नाथको अपने सामने देखकर अगस्त्य और शंख आदि सब मुनियोंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। सबने बार-बार भगवान्‌के चरणोंमें मस्तक झुकाया। उस समय लोकरक्षाके लिये सब ओर भ्रमण करनेवाले भगवान्‌के तेज-बलसम्पन्न आयुध उनकी सेवामें उपस्थित हो गये। सूर्यके समान तेजस्वी चक्र, दिव्य गदा, नन्दक नामक खड्ग, कमल तथा भयानक गर्जना करनेवाला चन्द्रमाके समान कान्तिमान् पांचजन्य शंख—ये सभी उपस्थित हो गये। शंखने अपनी ध्वनिसे समस्त ब्रह्माण्डको परिपूर्ण कर दिया। उस शंखनादको सुनकर वसिष्ठ आदि मुनि, गन्धर्व, नाग, किन्नर, विष्वक्सेन, गरुड़ तथा जय-विजय आदि श्वेतद्वीपनिवासी पार्षद भी आये। देववृक्षोंसे उत्पन्न पारिजात आदि फूलोंकी वहाँ अद्भुत वर्षा होने लगी, जिसकी घनीभूत सुगन्धसे सबका अन्तःकरण आमोदित हो उठा। भक्तवत्सल कमलनयन भगवान् विष्णुको प्रसन्न देखकर सब देवताओं और ऋषियोंने नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे साष्टांग प्रणामपूर्वक स्तवन किया।

ब्रह्मा आदि देवता बोले— दयासागर भगवान् विष्णु! आपकी जय हो। कमलनयन! आपकी जय हो। समस्त लोकोंको एकमात्र वर देनेवाले भक्तार्तिभंजन ! आपकी जय हो, जय हो। आप अनन्त हैं, अविनाशी हैं, परम शान्त हैं। मन और वाणीकी आपतक पहुँच नहीं है। आपका स्वरूप विशुद्ध सच्चिदानन्दमय है। आपको सम्यक् रूपसे कौन जानता है? विद्वान् पुरुष आपको सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, स्थूलसे भी स्थूल, सबके भीतर विराजमान, प्रकृतिसे परे अच्युत पुरुष कहते हैं। वेदान्तका सारभूत ब्रह्म आपका स्वरूप है। आप सबके भीतर और बाहर भी विद्यमान हैं। मायाके अधीन रहनेवाले देहाभिमानी पुरुषोंमेंसे कौन आपका वर्णन करनेमें समर्थ है? आपका यह स्वरूप अत्यन्त भयदायक है, इसे देखकर हम भयसे उद्विग्न हुए जाते हैं; अतः आप शान्तरूप धारण करें।

ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् गरुडध्वजने उसी क्षण सौम्यरूप धारण कर लिया। उनका मुख चन्द्रमण्डलके समान शोभा पाने लगा। प्रचण्ड तेज शान्त हो गया। श्रीअंगोंकी श्यामकान्ति नील कमलदलके समान सुशोभित हुई। दिव्य शरीरपर सुनहरे रंगका पीताम्बर छवि पा रहा था। भगवान् रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित दिखायी देने लगे। उनके चारों हाथ शंख, चक्र, गदा और पद्मसे शोभायमान थे। भगवान् लक्ष्मीपतिके इस मनोहर रूपको देखकर सबने बार-बार प्रणाम किया। भगवान्‌ने अभीष्ट वरदानसे ब्रह्मा आदि देवताओंको सन्तुष्ट करके मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे कहा— 'मुनीन्द्र! तुमने

३१८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मेरे लिये कठोर व्रतोंका अनुष्ठान करके बहुत क्लेश उठाया है। अतः मैं तुम्हें अभीष्ट वरदान दूँगा। बोलो क्या चाहते हो?' भगवान् लक्ष्मीपतिका यह वचन सुनकर अगस्त्यजीके सम्पूर्ण अंगोंमें रोमांच हो आया। वे भगवान्‌को बार-बार प्रणाम करके बोले—'प्रभो! आपने जो मेरा इतना आदर किया, इसीसे मैंने जो भी हवन किया है, जो भी तप, स्वाध्याय और श्रवण किया है वह सब सफल हो गया। भगवन्! मैं तो आपको ढूँढ़ रहा था और आप मुझे ढूँढ़ते हुए आ गये। आपकी कृपासे मैं सब कुछ पहले ही पा गया हूँ। माधव! इस समय बहुत सोचने-विचारनेपर भी मुझे ऐसी कोई वस्तु नहीं दिखायी देती, जो प्राप्त करने योग्य हो। अतः आपके चरणारविन्दोंमें निरन्तर ऐसी ही भक्ति बनी रहे, यही कृपा कीजिये। सुवर्णमुखरी नदीके जलमें स्नान करके जो लोग वेंकटाचलपर विराजमान आपका दर्शन करें, वे भोग और मोक्षके भी भागी हों। भगवन्! थोड़ी आयुवाले अज्ञानी मनुष्य व्रत, स्वाध्याय और कर्मोंद्वारा आपका दर्शन नहीं कर सकते। अतः आप सबपर कृपा करनेके लिये सदैव उस पर्वतपर निवास कीजिये और सबको मनोवांछित वस्तु देनेवाले होइये।'

श्रीभगवान्ने कहा—ब्रह्मन्! तुमने जो प्रार्थना की है वह सब पूर्ण होगी। आजसे वैकुण्ठ नामवाले इस पर्वतपर मैं सदा निवास करूँगा। सुवर्णमुखरी नदीके जलमें स्नान करके अपने पाप-पंकको धोकर जो लोग एकाग्रचित्तसे इस वैकुण्ठ शैलपर मेरा दर्शन करेंगे, वे पुनरावृत्तिसे रहित तथा केवल परमानन्दसे प्रकाशमान मेरे परम धामको प्राप्त होंगे। जो मनुष्य जिन कामनाओंकी अपेक्षासे यहाँ आकर मेरा दर्शन करेंगे, वे उन-उन कामनाओंको निःसन्देह प्राप्त कर लेंगे।

अगस्त्य मुनिसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने राजा शंखकी ओर देखा और ब्रह्मा आदिके सुनते हुए कहा—राजन्! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ, तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।

शंख बोले—भगवन्! आपके चरण-कमलोंकी सेवाके अतिरिक्त दूसरा मैं कुछ नहीं माँगता। आपके भक्त जिस गतिको पाते हैं, उसी उत्तम गतिके लिये मैं भी याचना करता हूँ।

श्रीभगवान्ने कहा—शंख! तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब उसी रूपमें प्राप्त होगा। मेरी सेवामें लगे रहनेवाले कल्याणमय पुरुषोंके लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?

तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवताओंको विदा करके भगवान् कमलनयन विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। अर्जुन! यह वेंकटाचलका प्रभाव तुम्हें बताया गया है। इस पावन कथाको श्रवण करके सब मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। ब्रह्माण्डमें भगवान् वेंकटेश्वरके समान दूसरा कोई देवता न हुआ है न होगा और वेंकटाचलके समान कोई तीर्थस्थान न हुआ है न होगा। स्वामीतीर्थके समान सरोवर अन्यत्र कहीं नहीं है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर भगवान् वेंकटेश्वरका स्मरण करते हैं, मोक्ष उनके हाथमें है। जो श्रेष्ठ मानव वेंकटाचलका माहात्म्य सुनते हैं, उन्हें इहलोक ओर परलोकमें भोग और मोक्ष प्राप्त होते हैं।


आकाशगंगातीर्थमें अंजनाकी तपस्या और उसे वायुदेवद्वारा वरदानकी प्राप्ति

सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें पुत्ररहित अंजना दुःखी होकर तपस्यामें संलग्न हुई। उसे देखकर मुनियोंमें श्रेष्ठ विष्णुभक्त मतंगजीने कहा—'अंजना देवि! उठो, तुम किस लिये तपस्यामें लगी हो?' अंजनाने कहा—'मुनिश्रेष्ठ! केशरी नामक श्रेष्ठ वानरने मेरे पितासे मेरे लिये याचना की। तब

  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१९

पिताजीने मुझे उनकी सेवामें समर्पित कर दिया। पतिदेवके साथ सुखपूर्वक विहार करते हुए मुझे बहुत समय व्यतीत हो गया, परंतु अबतक मुझे कोई पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। मैंने किष्किन्धा महापुरीमें अनेक प्रकारके व्रत भी किये तथापि पुत्र न पाकर मुझे दुःख हुआ। अतः अब मैं तपस्यामें तत्पर हुई हूँ। विप्रवर! किस प्रकार मुझे त्रिभुवनमें प्रसिद्ध पुत्र प्राप्त होगा, यह बताइये। मैं आपके आगे मस्तक झुकाकर यही माँगती हूँ।' तब मुनिवर मतंगने अंजनासे कहा—'देवि! सुनो। यहाँसे दक्षिण दिशामें दस योजनकी दूरीपर घनाचल नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जो भगवान् नृसिंहका निवासस्थान है। उसके ऊपर परम मनोहर ब्रह्मतीर्थ है। उसके पूर्वभागमें दस योजन दूर सुवर्णमुखरी नामवाली श्रेष्ठ नदी बहती है। उस नदीके उत्तरभागमें वृषभाचल (वेंकटाचल) नामक पर्वत है और उस पर्वतके शिखरपर स्वामिपुष्करिणी तीर्थ है। वहाँ जाकर उसके शुभ जलका दर्शन करते ही तुम्हारा मन पवित्र हो जायगा। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके वाराहस्वामीको प्रणाम करो और भगवान् वेंकटेश्वरको नमस्कार करके स्वामितीर्थके उत्तर जाओ। वहाँ आकाशगंगा नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ शोभा पाता है। उसमें संकल्पपूर्वक विधिवत् स्नान करके उसके शुभ जलको पी लेना। फिर उस तीर्थके सामने खड़ी हो वायुदेवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे तपस्या करना। ऐसा करनेसे तुम्हें देवता, राक्षस, ब्राह्मण, मनुष्य तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे भी अवध्य पुत्र प्राप्त होगा।'

मुनिके ऐसा कहनेपर अंजना देवीने उन्हें बार-बार प्रणाम किया और पतिको साथ लेकर वह शीघ्र ही वेंकटाचल पर्वतपर गयी। वहाँ स्वामिपुष्करिणीमें नहाकर उसने वाराह स्वामीको प्रणाम किया और भगवान् वेंकटेश्वरके चरणोंमें भी मस्तक नवाया। तत्पश्चात् वह शीघ्र ही आकाशगंगाके तटपर गयी और उसमें नहाकर उसके उत्तम जलको पीकर उसीके तटपर तीर्थकी ओर मुख करके खड़ी हो प्राणस्वरूप वायुदेवताकी प्रसन्नताके लिये संयम एवं व्रतका पालन करती हुई तपस्या करने लगी। तब सूर्यदेवके मेषराशिपर रहते समय चित्रानक्षत्रयुक्त पूर्णिमा तिथिको परम बुद्धिमान् वायुदेव प्रकट हुए और इस प्रकार बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि! तुम कोई वर माँगो। मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा।' उनकी बात सुनकर सती अंजनाने कहा—'महाभाग! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये।' वायुदेवताने कहा—'सुमुखि! मैं ही तुम्हारा पुत्र होऊँगा और तुम्हारे नामको विश्वमें विख्यात कर दूँगा।' अंजनाको ऐसा वरदान देकर महाबली वायु वहीं रहने लगे और अंजना देवी भी वह वरदान पाकर अपने पतिके साथ बहुत प्रसन्न हुई।

वेंकटाचल-माहात्म्य (अथवा भूमिवाराहखण्ड) सम्पूर्ण।

$\sim\sim o \sim\sim$

६. वैष्णवखण्ड (पुरुषोत्तमक्षेत्रमाहात्म्य)

३२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


उत्कलखण्ड या पुरुषोत्तमक्षेत्र-माहात्म्य

o

भगवान् विष्णुका ब्रह्माजीको पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जानेका आदेश

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
'भगवान् नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके तत्पश्चात् भगवान्‌की विजय-कथासे परिपूर्ण इतिहास-पुराणादिका कीर्तन करे।'

मुनि बोले— भगवान्! आप सब शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ तथा सब तीर्थोंके महत्त्वको जाननेवाले हैं। भगवान्! पुरुषोत्तमक्षेत्र परम पावन है, जहाँ भगवान् लक्ष्मीपति विष्णु मानवलीलाके अनुसार काष्ठमय विग्रह धारण करके विराजमान हैं, जो दर्शनमात्रसे ही सबको मोक्ष देनेवाले और सब तीर्थोंका फल प्रदान करनेवाले हैं, उनकी महिमाका हमसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

जैमिनिजीने कहा— मुनियो! यह अत्यन्त गूढ़ रहस्य है, सुनो। यद्यपि ये भगवान् जगन्नाथ सर्वत्र व्यापक और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं तथापि यह परम उत्तम पुरुषोत्तमक्षेत्र इन महात्मा जगदीश्वरका साक्षात् स्वरूप है। वहाँ वे स्वयं ही शरीर धारण करके निवास करते हैं। इसीलिये उस क्षेत्रको भगवान्‌ने अपने नामसे प्रसिद्ध किया। वह क्षेत्र दस योजनके विस्तारमें है। उसका प्रादुर्भाव तीर्थराज समुद्रके जलसे हुआ है तथा वह सब ओर बालुकाराशिसे व्याप्त है। उसके मध्यभागमें महान् नीलगिरि उस तीर्थकी शोभा बढ़ाता है। पूर्वकालमें वराहरूपधारी भगवान्‌ने इस पृथ्वीको समुद्रके जलसे निकालकर जब सब ओरसे बराबर करके स्थापित किया और पर्वतोंद्वारा सुस्थिर कर दिया, तब ब्रह्माजीने पहलेकी भाँति समस्त चराचर जगत्की सृष्टि करके तीर्थों, सरिताओं, नदियों और क्षेत्रोंको यथास्थान स्थापित किया। तत्पश्चात् सृष्टिके भारसे पीड़ित होकर वे सोचने लगे। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—इन तीन प्रकारके तापोंसे पीड़ित होनेवाले संसारके जीव इनसे किस प्रकार मुक्त होंगे। इस प्रकार विचार करते हुए ब्रह्माजीके मनमें यह भाव आया कि मैं मुक्तिके एकमात्र कारण परमेश्वर श्रीविष्णुका स्तवन करूँ।

तब ब्रह्माजी बोले— शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले जगदाधार! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि करनेवाला मैं ब्रह्मा आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुआ हूँ। अतः जगन्मय! अपने यथार्थ स्वरूपको आप ही जानते हैं। जिनकी मायासे महत्तत्त्व आदि सम्पूर्ण जगत् रचा गया है और जिनके निःश्वाससे प्रकट हुआ शब्दब्रह्म (वेद) ऋक्, साम और यजु—इन तीन भेदोंमें अभिव्यक्त हुआ है, जिसका सहारा लेकर मैंने सम्पूर्ण भुवनोंकी सृष्टि की है, उन्हीं आप परमात्मासे भिन्न स्थूल-सूक्ष्म, ह्रस्व-दीर्घ आदि कोई भी वस्तु नहीं है। भगवन्! तीनों गुणोंके विभागपूर्वक भिन्न-भिन्न कार्योंके रूपमें आप ही यह चराचर जगत् हैं; ठीक उसी तरह जैसे सुवर्ण ही कंकण, कुण्डल आदिके रूपमें विभासित होता है। प्रभो! आप ही सृष्टिकर्ता और सृज्य पदार्थ हैं तथा आप ही पोषक और पोष्य जगत् हैं। परमेश्वर! आप ही आधार, आधेय और उन दोनोंको धारण करनेवाले हैं। मनुष्य आपकी ही प्रेरणासे कर्म करता है और आप ही द्वारा की हुई व्यवस्थासे वह कर्मानुसार गति प्राप्त करता है। परमेश्वर! आप ही इस जगत्‌की गति, भर्ता और साक्षी हैं। चराचरगुरो! आप अखिल जीवस्वरूप हैं। दयामय जगन्नाथ! मैं सदा आपकी शरणमें हूँ, आप मुझपर प्रसन्न होइये।

ब्रह्मा और यमराजके द्वारा भगवान् विष्णुका स्तवन

३२२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर मेघके समान श्याम, शंख, चक्र आदि चिह्नोंसे उपलक्षित भगवान् विष्णु गरुड़पर आरूढ़ हो वहाँ प्रकट हुए। उनका मुखकमल पूर्णतः प्रकाशमान था। उन्होंने ब्रह्माजीसे कहा— 'ब्रह्मन् ! तुम जिस कार्यके लिये मेरी स्तुति करते हो, वह सम्भव नहीं जान पड़ता। तथापि यदि इसके लिये तुम्हारा उद्योग है, तो जिस क्रमसे यह सिद्ध होता है, वह तुम्हें बतला रहा हूँ। ब्रह्मन् ! मैं तुम हो और तुम मैं हूँ। सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त (विष्णुमय) है। जहाँ तुम्हारी रुचि है, वहाँ मेरी है। अतः तुम्हारी मनोवांछाकी सिद्धिका उपाय बतलाता हूँ— समुद्रके उत्तर तटपर महानदीके दक्षिण भागमें जो प्रदेश है, वह इस भूतलपर सब तीर्थोंका फल देनेवाला है। वहाँ जो उत्तम बुद्धिवाले मनुष्य निवास करते हैं, वे अन्य जन्मोंमें किये हुए पुण्यका फल भोगते हैं। ब्रह्मन् ! समुद्रके किनारे जो नीलपर्वत सुशोभित हो रहा है, वह पग-पगपर अत्यन्त श्रेष्ठ और परम पावन है। वह स्थान इस पृथ्वीपर गुप्त है। वहाँ सब प्रकारके संगोंसे दूर रहनेवाला मैं देह धारण करके निवास करता हूँ और क्षर तथा अक्षर दोनोंसे ऊपर उठकर पुरुषोत्तमस्वरूपमेंविद्यमान हूँ। मेरा वह पुरुषोत्तमक्षेत्र सृष्टि और प्रलयसे आक्रान्त नहीं होता। ब्रह्मन् ! चक्र आदि चिह्नोंसे युक्त मेरा जैसा स्वरूप यहाँ देखते हो, वैसा ही वहाँ जाकर भी देखोगे। नीलाचलके भीतरकी भूमिमें कल्पोंतक रहनेवाले अक्षयवटकी जड़के समीप पश्चिम दिशामें जो रौहिण नामसे विख्यात कुण्ड है, उसके किनारे निवास करते हुए मुझ पुरुषोत्तमको जो चर्म-चक्षुओंसे देखते हैं, वे उसके जलसे क्षीणपाप होकर मेरे सायुज्यको प्राप्त कर लेते हैं। महाभाग ! वहाँ जाओ। उस तीर्थमें मेरा दर्शन करके ध्यान करते समय तुम्हारे समक्ष पुरुषोत्तमक्षेत्रकी श्रेष्ठ महिमा स्वतः प्रकाशमें आ जायगी। वह क्षेत्र श्रुतियों, स्मृतियों, इतिहासों और पुराणोंमें गुप्त है। मेरी मायासे वह किसीको ज्ञात नहीं होता। मेरी ही कृपासे अब वह प्रकाशमें आयेगा और सबको प्रत्यक्ष उपलब्ध होगा। व्रत, तीर्थ, यज्ञ और दानका जो पुण्य बताया गया है, वह सब यहाँ एक दिनके निवाससे ही प्राप्त हो जाता है और एक निःश्वासभर निवास करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है।' ब्राह्मणो ! इस प्रकार ब्रह्माजीको आदेश देकर भगवान् पुरुषोत्तम सबके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये।

$\sim\sim\circ\sim\sim

यमराज तथा मार्कण्डेयजीके द्वारा भगवान्‌की स्तुति और पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा

जैमिनिजी कहते हैं—मनुष्य जिनका नाम लेकर सब पापोंसे मुक्त हो जाता है, उन्हींके दर्शन करनेपर क्या मोक्ष दुर्लभ होगा? मनसे भगवान् विष्णुका चिन्तन करते हुए यदि मनुष्य प्राणत्याग करता है, तो वह भी मुक्त हो जाता है। फिर जिसने साक्षात् भगवान्‌का दर्शन कर लिया, वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है तो क्याआश्चर्य है?* पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा अद्भुत है। वह क्षेत्र अज्ञानियोंको भी मुक्ति देनेवाला है। फिर जो सदैव शान्त, वैराग्य और ज्ञानसे संयुक्त हैं, ऐसे मनुष्योंके लिये तो कहना ही क्या है? <br> ऋषियोंने पूछा—मुने! नीलाचलपर भगवान् विष्णुका दर्शन करके ब्रह्माजीने क्या किया?<br> जैमिनिजी बोले—पुरुषोत्तमक्षेत्रका अत्यन्त

* मनसा ध्यायन् विष्णुं त्यजन् प्राणान् विमुच्यते। साक्षात्कृतो भगवतः किं चित्रं मुक्तिमेति यत्॥
\hspace{8cm}(स्क० पु०, वै० उ० २। ९-१०)$

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३२३

अद्भुत माहात्म्य देखकर ब्रह्मा जबतक भगवान् विष्णुका ध्यान करते रहे, तबतक पितरोंके स्वामी यमराज अपने अधिकारके संकुचित होनेसे व्याकुल होकर दीनमुखसे नीलाचलपर्वतपर आये और वहाँ भगवान् लक्ष्मीपतिका दर्शन तथा उन्हें साष्टांग प्रणाम करके अपने अधिकारकी दृढ़ताके लिये भगवान् जगन्नाथकी स्तुति करने लगे।

यमराज बोले— सृष्टि, पालन और संहारके एकमात्र कारण देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। सूतमें मणियोंकी भाँति आपमें यह सब जगत् गुँथा हुआ है। आपने ही इस विश्वको धारण किया है, आपने ही इसकी सृष्टि की है तथा आपहीने इसका पालन-पोषण भी किया है। चन्द्रमा और सूर्य आदिका रूप धारण करके आप सदा समस्त संसारको प्रकाशित करते हैं। आप इस विश्वके स्वामी, जगत्की उत्पत्तिके कारण, संसारके आवासस्थान, जगद्गुरु, लोकसाक्षी तथा आदि-अन्तसे रहित हैं। आपको मैं प्रणाम करता हूँ। प्रभो! आप उत्तम करुणारूपी जलसे भरे हुए समुद्र हैं, आपको नमस्कार है। आपका वैभव पर, अपर एवं परात्परसे भी अतीत है। आप ही इस विश्वके उत्पादक हैं। संसारके सन्तापरूपी हिमको सुखा डालनेवाले सूर्य! आपको नमस्कार है। दीनबन्धो! आपको नमस्कार है। आपने अपनी मायासे समस्त वैभवोंकी रचना की है, तीनों गुण आपकी रज्जु (रस्सी) हैं, आपको मेरा नमस्कार है। कमल-केसरकी भाँति निर्मल पीत वस्त्र धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। आपके कटाक्षपातमात्रसे ही संसारकी सृष्टि, पालन और संहार होते हैं तथा यह ऊँच-नीच जगत् बार-बार जन्म लेता है। नीलाचलकी गुफामें निवास करनेवाले आप कृपानिधान प्रभुको मैं प्रणाम करता हूँ। आप शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले तथा सबको शुभ प्रदान करनेवाले हैं। शरणागत प्राणियोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले मुरारिको मैं नमस्कार करता हूँ। आपका मनोहर एवं विशाल वक्ष श्रीवत्सचिह्न तथा कौस्तुभमणिसे उद्भासित है,आपको नमस्कार है। आपके युगल चरणारविन्दोंका आश्रय लेनेसे ऐश्वर्यभागिनी लक्ष्मीकी सब लोग शरण लेते हैं और वे सबको पृथक्-पृथक् ऐश्वर्य देनेमें समर्थ होती हैं। वे लक्ष्मी आपकी परा और अपरा प्रकृति हैं। वे समस्त शुभ लक्षणोंसे लक्षित होती हैं तथा आप लक्ष्मीपतिके वक्षःस्थलपर नित्य निवास करती हैं। भगवन्! आपकी प्रिया उन लक्ष्मीको मैं प्रणाम करता हूँ।

उस समय धर्मराजके इस प्रकार स्तुति करनेपर परम सन्तोषको प्राप्त हुए भगवान् लक्ष्मीपतिने अपने वामपार्श्वमें बैठी हुई लक्ष्मीजीकी ओर कटाक्षपूर्वक देखकर उनसे कुछ कहनेके लिये संकेत किया। उनकी प्रेरणा पाकर संसारदुःखका विनाश करनेवाली लक्ष्मीने सब लोगोंके कल्याणके लिये यमराजसे कहा—'सूर्यनन्दन! तुम जिस उद्देश्यसे यहाँ हम दोनोंकी स्तुति करते हो, उसकी सिद्धि इस क्षेत्रमें तो दुर्लभ है; क्योंकि हमारे लिये इस पुरुषोत्तमक्षेत्रका त्याग करना असम्भव है। इस क्षेत्रमें कभी कर्मोंके फल नहीं प्राप्त होते। यहाँ बसनेवाले मनुष्यों और पशु-पक्षियोंके पाप भी जलकर भस्म हो जाते हैं। इस क्षेत्रमें नीलेन्द्रमणिके समान मनोहर श्यामविग्रहधारी साक्षात् भगवान् नारायणका दर्शन करके मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। अतः इसको छोड़कर अन्यत्र कर्मभूमिमें ही तुम्हारा अधिकार है। जो तुम्हारे भी प्रपितामह हैं, वे ब्रह्माजी इस क्षेत्रका माहात्म्य जानकर भगवान् गदाधरकी स्तुति करते हैं। इसलिये जो प्राणी यहाँ निवास करते हैं, वे तुम्हारे वशमें जानेयोग्य नहीं हैं। वैवस्वत! यहाँ जीवन्मुक्त एवं मुमुक्षुपुरुष निवास करते हैं।'

लक्ष्मीजीके इस प्रकार समझानेपर लज्जासे विनीत हो यमराजने कहा—सुरेश्वरि! आपने जो

३२४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

यह कहा है कि यह क्षेत्र भगवान् विष्णुके सान्निध्यसे मोक्ष देनेवाला है, सो ठीक है। ईश्वरकी इच्छा निरंकुश (प्रतिबन्धरहित) होती है। जो विष्णु अन्यत्र किसीको बन्धन देते हैं, वही यहाँ मोक्ष प्रदान करते हैं। मातः! मेरे तथा स्वर्ग-नरकके भी वे ही स्रष्टा हैं। अतः यदि उनकी इच्छासे यहाँ मरे हुए लोगोंको मोक्ष प्राप्त होता है, तो इस क्षेत्रका प्रमाण और यहाँ निवास करनेका फल आदि सब बातें मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये।

लक्ष्मीदेवीने कहा—रविनन्दन! जब समस्त चराचर जगत् नष्ट होकर प्रलयकालके समुद्रमें डूब चुका था, उस समय सात कल्पोंतक जीवित रहनेवाले मार्कण्डेय मुनि कहीं भी ठहरनेके लिये स्थान न पाकर बहुत चिन्तित हुए। उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिलती थी। जलके समुद्रमें इधर-उधर बहते हुए वे पुरुषोत्तमक्षेत्रमें आये। यहाँ उन्होंने अक्षयवटको देखा और एक बालकका वचन अपने कानोंसे सुना—'मार्कण्डेय! शोक न करो, मेरे पास आकर अपने अनुपम दुःखको छोड़ दो।' यह विचित्र वचन, जिसके सुनायी देनकी कोई आशा नहीं थी, सुनकर मार्कण्डेय मुनिको बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे—'इस महाभयानक एकार्णवके जलमें यह क्षेत्र नौकाकी भाँति दिखायी देता है और इसमें यह महान् बरगदका वृक्ष खम्भके समान खड़ा है। इस प्रलयकालीन एकार्णवमें जब समस्त स्थावर-जंगमका नाश हो गया है, तब भूतलका यह प्रदेश बहुत सुस्थिर कैसे प्रतीत होता है तथा 'मार्कण्डेय! आओ' यह स्नेह एवं आग्रहयुक्त वचन कहाँसे सुन पड़ता है।'

यही सब सोचते और जलमें तैरते हुए मार्कण्डेयजीने शंख, चक्र, गदा हाथमें लिये भगवान् विष्णुको तथा उनके हृदय-कमलके आसनपर बैठी हुई मुझ लक्ष्मीको भी देखा। तब उनका चित्त प्रसन्न हो गया और उन्होंने हम दोनोंको साष्टांग प्रणाम किया। तदनन्तर भगवान् विष्णुको प्रसन्न करनेके लिये वे इस प्रकार स्तुति करने लगे—'दयासागर! आज आपके चरणारविन्दोंकी सेवाका प्रसंग पाकर मैं रुद्र, इन्द्र और ब्रह्माजीके समान वैभवसम्पन्न हो गया हूँ। आजतक सब ओर सन्ताप उठाता रहा। प्रभो! अब अपनी शरणमें आये हुए मुझ दीनकी रक्षा कीजिये। आपके युगल चरणारविन्द अचिन्त्य शक्तिसे सम्पन्न और कल्याणकी प्राप्तिके प्रधान कारण हैं। इसीलिये ब्रह्मा आदि देवता सदा उनकी परिचर्यामें लगे रहते हैं। मैं तो भक्तिभावसे हीन और दीन हूँ। दयासिन्धो! मेरी रक्षा कीजिये। यह समस्त ब्रह्माण्ड जिनके अंगसे उत्पन्न हुआ है और ऐसे कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड जिनमें स्थित प्रतीत होते हैं तथा जिनके लीला-विलाससे ही सबकी सृष्टि, पालन और संहार-कार्य होते हैं; वे ही आप विष्णु हैं। भगवन्! मुझ अत्यन्त दीनकी रक्षा कीजिये। जैसे एक ही सुवर्ण कड़े और कुण्डल आदिके भेदसे अनेक-सा प्रतीत होता है, अथवा जिस प्रकार आकाशमें उदित एक ही सूर्य आधारकी विषमतासे विषम प्रतीत होनेवाली अनेक जलराशियोंमें प्रतिबिम्बित होकर अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है, उसी प्रकार आप एकमात्र निर्गुण परमात्मा ही भिन्न-भिन्न शरीरोंमें प्रवेश करके अनेकवत् प्रतीत होते हैं। हे अपार शक्तिशाली परमेश्वर! आप सब प्रकारकी समस्त इच्छाओंसे रहित तथा ग्रहण और संकल्पसे शून्य हैं तथापि प्रत्येक युगमें दीनोंके ऊपर दया करनेके योग्य शरीर धारण करते रहते हैं। जगदीश्वर! पूर्वकालमें अनात्म पदार्थोंमें चित्त आसक्त होनेके कारण जो मैंने आपके चरणारविन्दोंका सेवन नहीं किया, इसीलिये भगवद्विमुख कर्मसे मुझे भयंकर परिणाम भोगना पड़ा है। दयासागर! मुझ दीनकी रक्षा

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३२५

कीजिये। महात्मन्! सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि, पालन और संहारकी लीलासे सुशोभित होनेवाला जो आपका त्रिगुणमय (ब्रह्मविष्णु-शिवात्मक) स्वरूप है, वही महत्तत्त्व आदिका भी कारण है। आप प्रकृतिसे परे तथा सबके आदिकारण हैं, आपको नमस्कार है। सर्वव्यापी जगन्नाथ! मेरी रक्षा कीजिये। मैं संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ। गोविन्द! अपनी कृपाकटाक्षपूर्ण दृष्टिसे मेरी ओर देखकर इस भवसागरसे मेरा उद्धार कीजिये।'

इस प्रकार स्तुति करते हुए ब्रह्मर्षि मार्कण्डेयको कृपादृष्टिसे देखकर भगवान् नारायण इस प्रकार बोले—'विप्रवर! मेरे तत्त्वको न जाननेके कारण ही तुम अत्यन्त दीन हो रहे हो। तुमने अत्यन्त दुष्कर तपका अनुष्ठान किया है, किंतु उससे केवल दीर्घजीवी हुए हो। महामुने! इस कल्पवटके ऊपर पत्तेके दोनेमें सोये हुए उस बालस्वरूपको देखो। वह सबका कालरूप है। उसके फैले हुए मुखमें प्रवेश करके वहाँ सुखपूर्वक रह सकते हो।' भगवान्के ऐसा कहनेपर मार्कण्डेयजीका मुख आश्चर्यसे चकित हो गया। उन्होंने वृक्षपर चढ़कर भगवान्के बालरूपको देखा और उसमें प्रवेश किया। भीतर जानेपर उन्होंने चौदह भुवन देखे। ब्रह्मा आदि देवता, दिक्पाल, सिद्ध, गन्धर्व, राक्षस, ऋषि, मुनि, देवर्षि, समुद्रोंसे चिह्नित भूतल, अनेक तीर्थ, नदी, पर्वत तथा वनोंसे उपलक्षित श्रेष्ठ नगर देखा। सातों पाताल और सहस्रों नागकन्याएँ देखीं। हजारों फणोंसे सुशोभित सम्पूर्ण जगत्का भार धारण करनेवाले शेषनागका दर्शन किया तथा ब्रह्माण्डके मध्यमें ब्रह्माजीने जो कुछ भी सृष्टि की है, वह सब अवलोकन किया। इधर-उधर घूमनेपर भी कहीं उस बालकके उदरका अन्त नहीं मिला, तब पुनः कण्ठमार्गसे बाहर निकलकर उन्होंने मेरे साथ पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुका दर्शन किया।

श्रीभगवान् बोले—मुने! यह विचित्र क्षेत्र मेरा सनातन धाम है, ऐसा समझो। यहाँ न सृष्टि है, न प्रलय है और न संसारका बन्धन ही है। सदा एक रूपसे रहनेवाले मुझ मोक्षदायक पुरुषोत्तमको यहाँ विद्यमान जानकर इस क्षेत्रमें प्रवेश करनेवाला पुरुष घनानन्दस्वरूप हो पुनः गर्भमें नहीं आता।

महामुनि मार्कण्डेयने कहा—प्रभो! मैं यहाँ निवास करूँगा। पुरुषोत्तम! मुझपर कृपा कीजिये।

श्रीभगवान्ने कहा—ब्रह्मर्षे! इस मोक्षसाधक क्षेत्रमें मैं प्रलयकी समाप्तिपर्यन्त रहूँगा। प्रलयके अन्तमें तुम्हारे लिये यहाँ सनातन तीर्थका निर्माण करूँगा, जिसके तटपर तपस्या करके मेरे द्वितीय शरीर शिवकी आराधना करते हुए तुम मेरी कृपासे मृत्युको निश्चितरूपसे जीत लोगे।

इस प्रकार पहलेसे वरदान पाये हुए मार्कण्डेय महामुनिने वटके वायव्य कोणमें भगवान्के चक्रसे एक कुण्ड खोदा। उस पवित्र कुण्डमें रहकर भारी तपस्यासे भगवान् महेश्वरकी आराधना करके उन्होंने मृत्युको अनायास ही जीत लिया। उन्हीं मार्कण्डेयजीके नामसे यह कुण्ड प्रसिद्ध है, जिसमें स्नान करके मार्कण्डेश्वर शिवका दर्शन करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है। यह पुरुषोत्तमक्षेत्र पाँच कोसतक तो समुद्रके भीतर स्थित है और दो कोसतक उसके तटकी भूमिपर विद्यमान है। यह अत्यन्त निर्मल, सुनहरी बालुकाओंसे व्याप्त तथा नीलगिरिसे सुशोभित है। वे जो विश्वनाथ भगवान् शिव हैं, साक्षात् नारायणस्वरूप ही हैं। वे भगवान् जगन्नाथकी उपासना करनेके लिये समुद्रके तटपर निवास करते हैं। यमराजके दण्डका भय नष्ट करनेके कारण उनका नाम यमेश्वर है। उनका दर्शन और पूजन करनेसे कोटि शिवलिंगोंके दर्शन और पूजनका फल प्राप्त होता है।

o

३२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पुरुषोत्तमक्षेत्रके विभिन्न तीर्थों और देवताओंका परिचय, तीर्थ और भगवान्‌की महिमा तथा पापपरायण पुण्डरीक और अम्बरीषका उस क्षेत्रमें आना

श्रीलक्ष्मीजी कहती हैं—इस क्षेत्रका आकार शंखके समान है। उसके मस्तकपर पश्चिमकी सीमामें सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाले भगवान् शंकर विराजते हैं। शंखके आगे अर्थात् पूर्व सीमापर भगवान् नीलकण्ठ हैं। इन दोनोंके मध्यका प्रदेश एक कोसका है। भगवान् नारायणका यह परम पावन क्षेत्र अत्यन्त दुर्लभ है। यहाँ मृत्यु होनेसे प्राणियोंकी मुक्ति हो जाती है तथा यहाँका समुद्र स्नानमात्रसे मोक्ष प्रदान करनेवाला है। शंखाकार तीर्थके दूसरे आवर्तमें कपालमोचन नामक लिंग स्थित है। जो मनुष्य कपालमोचनका दर्शन, पूजन और उन्हें प्रणाम करता है, वह ब्रह्महत्या आदि पापोंको त्याग देता है। धर्मराज ! शंखके तृतीय आवर्तके स्थानमें मेरी आद्याशक्ति विमला देवीको स्थित जानो। वे भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। जो भक्तिपूर्वक इनका दर्शन, पूजन और इन्हें प्रणाम करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें मोक्षको भी पाता है। शंखके नाभिस्थानमें कुण्ड, वट और भगवान् पुरुषोत्तम—इन तीनोंकी स्थिति है। कपालमोचनसे लेकर अर्द्धांगिनीतक शंखका मध्य भाग जानना चाहिये। जो अर्द्धांगिनीका दर्शन करके उन्हें प्रणाम करता है, वह अक्षय भोगोंका उपभोग करता है। तीनों लोकोंमें जो स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाले तीर्थ हैं, उन सबमें यह पुरुषोत्तमक्षेत्र तीर्थराज कहा गया है। मुक्तिदायक जितने क्षेत्र हैं, उन सबमें यह सायुज्य प्रदान करनेवाला माना गया है। यहाँ निवास करनेवाले प्राणी जन्म, मृत्यु और जराका शोक नहीं करते। रौहिण नामक कुण्ड भगवान्‌के करुणारूप जलसे भरा हुआ है। वह स्पर्श करनेमात्रसे भवबन्धनसे मुक्ति देता है। प्रलयकालमें जो जल बढ़ता है, वह पीछे इसी कुण्डमें विलीन हो जाता है। धर्मराज ! यहाँके निवासी मोक्षके अधिकारी हैं। उनपर तुम्हारा शासन नहीं चल सकता। यह क्षेत्र पृथ्वीपर रहनेवाले सब प्राणियोंको मोक्ष प्रदान करता है। कामाख्य और क्षेत्रपालके मध्यमें विमलाकी स्थिति है। भगवान् पुरुषोत्तमके दक्षिण भागमें साक्षात् ब्रह्मस्वरूप नृसिंहजी विराजमान हैं। ये प्रभासे उज्ज्वल हैं और हिरण्यकशिपुका वक्षःस्थल विदीर्ण करके यहाँ स्थित हुए हैं। इनके दर्शनसे सब पापोंका नाश हो जाता है। इनके आगे प्राणोंका त्याग करनेवाला मनुष्य ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है। अविमुक्तक्षेत्र (काशी) में मरनेवाले प्राणीके कानोंमें भगवान् महेश्वर बोधके उपायभूत ब्रह्मज्ञानका उपदेश करते हैं। बुद्धिसे उसका अभ्यास करके जीव क्रमशः मोक्षको प्राप्त होता है। उपदेशक भगवान् शिवकी महिमासे वह ज्ञान विस्मृत नहीं होता, क्रमशः अभ्यासमें आकर मोक्षकी प्राप्ति करा देता है। परंतु जो लोग इस पुरुषोत्तमक्षेत्रमें प्राणत्याग करते हैं, उनकी तत्काल मुक्ति हो जाती है। यहाँ समुद्र स्नान करनेसे, भगवान् पुरुषोत्तम अपने दर्शनसे, कल्पवृक्ष अपनी छायामें जानेसे तथा यह सम्पूर्ण क्षेत्र अपने भीतर कहीं भी मृत्यु होनेसे मोक्ष प्रदान करता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक जिसमें विश्वास करता है, वह उसीसे यहाँ मुक्त हो जाता है। ऐसा तीर्थ दूसरा नहीं है। इस क्षेत्रमें अन्तर्वेदीकी रक्षाके लिये आठ शक्तियाँ बतायी गयी हैं—वटवृक्षकी जड़में मंगला, पश्चिममें विमला, शंखके पृष्ठभागमें सर्वमंगला, उत्तर दिशामें

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३२७

अर्द्धाशिनी तथा लम्बा, दक्षिणमें कालरात्रि, पूर्वमें मरीचिका तथा कालरात्रिके पीछे चण्डरूपा शक्ति स्थित है। इस प्रकार इन उग्र रूपवाली आठ शक्तियोंसे यह क्षेत्र सब ओरसे सुरक्षित है। इन आठों शक्तियोंके दर्शन तथा कीर्तनसे सब पापोंका नाश होता है। रुद्राणीके आठ भेद देखकर भगवान् शंकर भी अपनेको आठ स्वरूपोंमें व्यक्त करके परमेश्वर श्रीहरिकी उपासना करते हैं। कपालमोचन, क्षेत्रपाल, यमेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, ईशान, बिल्वेश्वर, नीलकण्ठ और वटवृक्षकी जड़में वटेश्वर—ये आठ भगवान् शिवके लिंग हैं, जिनका दर्शन, स्पर्श और पूजन करके मनुष्य मुक्त हो जाता है। इस क्षेत्रमें जिनकी मृत्यु होती है, उनके स्वामी यमराज नहीं हैं। तथापि भक्तको आत्मसमर्पण करनेवाले शरणागत-दुःखभंजन भगवान् जगन्नाथको यमराजने अपनी भक्तिसे सन्तुष्ट कर लिया है। इसलिये मेरे और सुदर्शनचक्रके साथ भगवान् विष्णु स्वर्णबालुकासे आवृत होकर न त्यागने योग्य इस उत्तम तीर्थमें अदृश्य भावसे रहेंगे।

यमराजसे ऐसा कहकर लक्ष्मीजीने आगे खड़े हुए ब्रह्माजीसे कहा—सत्ययुगमें राजा इन्द्रद्युम्न होनेवाले हैं, जो भगवान् विष्णुके परम भक्त तथा शास्त्रोंके विद्वान् होंगे। प्रजानाथ! उस राजापर अनुग्रह करनेके लिये भगवान् एक काष्ठसे उत्पन्न चार प्रतिमाओंके रूपमें अभिव्यक्त होंगे। काष्ठकी उन प्रतिमाओंका निर्माण स्वयं विश्वकर्मा करेंगे और तुम इन्द्रद्युम्नपर प्रसन्न होकर उन प्रतिमाओंकी स्थापना कराओगे। लक्ष्मीजीकी यह बात सुनकर ब्रह्मा और यमराज दोनों परम प्रसन्न होकर अपने-अपने स्थानको चले गये। पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी महिमाका बार-बार स्मरण करके विस्मय और हर्षसे उनके शरीरमें रोमांच हो आता था।

मुनियो! इस समय उस क्षेत्रमें इन्द्रद्युम्नकी भक्तिसे सन्तुष्ट हो नीलमेघके समान श्यामसुन्दर शंखचक्रधारी भगवान् काष्ठमय शरीर धारण करके सम्पूर्ण लोकोंका उपकार करनेके लिये नीलाचलकी गुफामें विराजमान हैं। करुणासागर भगवान् काष्ठनिर्मित बलभद्र, सुभद्रा तथा सुदर्शनचक्रकी प्रतिमाओंके साथ स्वयं भी दारुमय विग्रह धारण करके शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करते हैं। उनका दर्शन करके मनुष्य पापोंके सुदृढ़ बन्धनसे भी मुक्त हो जाता है। भगवान् विष्णुका यह परम उत्तम स्थान अत्यन्त गुप्त है तथा वह अलौकिक प्रतिमा लौकिक रूपसे प्रकाशित है। राजा इन्द्रद्युम्नको दारुमय शरीर धारण करनेवाले भगवान्ने वर दिया है। भगवान् दीनों और अनाथोंके एकमात्र शरण हैं। भवसागरसे पार उतारनेके लिये नौका हैं। उनके चरण समस्त चराचर जगत्के लिये वन्दनीय हैं। वे ही सबके परम आश्रय हैं। भगवान् नारायण सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्तिके स्थान तथा सृष्टि और संहारके कारण हैं। वे समस्त पापोंको छुड़ानेवाले तथा सब आपत्तियोंका नाश करनेवाले हैं। विभूतियोंका प्रसार करनेवाले तथा सब योगियोंको वरण करनेवाले हैं। सम्पूर्ण जीवोंका भरण तथा अखिल विश्वको धारण करनेवाले भी वे ही हैं। वे सब भाषाओंको बोलते और समस्त दुष्कर्मोंका विनाश करते हैं। मुनीश्वरो! तुम अनन्यभावसे उन्हीं भगवान् श्रीहरिकी शरण लो। वे चेष्टारहित काष्ठशरीर धारण करके भी दिव्य लीलाविलास करनेवाले हैं। थोड़ी-सी भक्ति करनेपर भी मनुष्योंके सौ-सौ अपराध क्षमा करते हैं।

कुरुक्षेत्रमें उत्पन्न हुए एक ब्राह्मण और एक क्षत्रिय दोनों मित्र थे। दोनोंने प्रेमपूर्वक परदेशकी यात्रा की। उनका आहार-विहार एक ही था। दोनों सदाचारके मार्गसे भ्रष्ट हो चुके थे और मोहवश शास्त्रनिषिद्ध आचरण करते थे। स्वाध्याय, वषट्कार, स्वधा (श्राद्ध-तर्पण) और स्वाहा (यज्ञ) इनसे वे कोसों दूर थे। महापातकोंसे कलंकित

३२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


होकर वे मदिरा पीते और वेश्याके सहवासमें रहकर आनन्दका अनुभव करते थे। परलोककी चिन्ता तो उन्हें कभी स्वप्नमें भी नहीं होती थी। इसी प्रकार मनमाना बर्ताव करते हुए उनकी आधी आयु बीत गयी। एक दिन घूमते हुए वे दोनों यज्ञशालामें जा पहुँचे और दूरसे ही स्तोत्र तथा शास्त्रचर्चा सुनने लगे। वहाँ होनेवाली वैदिक क्रियाओंको देखकर उस समय उन अधार्मिकोंके मनमें भी धर्मके प्रति श्रद्धा हो गयी। उनका नाम पुण्डरीक और अम्बरीष था। वे अपनी उच्च जातिका स्मरण करके अपने दुराचारोंकी निन्दा करते हुए एक-दूसरेसे कहने लगे—'हम दोनों पापके भयंकर समुद्रको कैसे पार करेंगे?' हमने जो-जो पाप संचित किये हैं, उनको शास्त्र भी नहीं जानता। उन घोर पापोंका प्रायश्चित्त अत्यन्त दुर्लभ है तथापि इस यज्ञसभामें जो ये ब्रह्मनिष्ठ पधारे हुए हैं, उन्हें प्रणामसे प्रसन्न करके हम अपने उद्धारका उपाय पूछें।'

ऐसा निश्चय करके उन दोनोंने ब्राह्मणोंको प्रणाम किया और अपने-अपने पापोंको ठीक-ठीक बताकर उनसे प्रायश्चित्त पूछा। उन दोनोंकी बातें सुनकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने आँखें बंद कर लीं। किसीने कुछ भी नहीं कहा। उनके बीच एक श्रेष्ठ वैष्णव थे, जो उस यज्ञसभामें प्रधान थे। भगवान्‌की भक्तिके माहात्म्यसे उन्होंने समस्त पापोंका नाश कर दिया था। वक्ताओंमें श्रेष्ठ उन वैष्णव ब्राह्मणने हँसकर वहाँ बैठे हुए उन दोनोंसे कहा—'हे ब्राह्मण! और हे क्षत्रियकुमार! यदि तुम दोनों अत्यन्त भयंकर पापराशिसे छुटकारा पाना चाहते हो तो शीघ्र पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चले जाओ। वह सब क्षेत्रोंसे उत्तम है, जहाँ राजर्षि इन्द्रद्युम्नकी भक्तिसे उनपर अनुग्रह करनेवाले भगवान् पुरुषोत्तम काष्ठमय शरीर धारण करके रहते हैं। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले उन भगवान् जगन्नाथकी आराधना करके तुम इच्छानुसार पापक्षय और मोक्ष भी पा सकोगे, यह ध्रुव सत्य है। उनका दर्शन करनेसे सब पाप एक साथ ही नष्ट हो जाते हैं। इसलिये परम पवित्र उत्कलदेशमें दक्षिण समुद्रके तटपर नीलाचलके शिखरपर निवास करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् जगदीशकी शरणमें जाओ। वे करुणानिधान भगवान् तुम दोनोंका मनोरथ अवश्य सिद्ध करेंगे।'

वैष्णव महात्माके इस प्रकार आदेश देनेपर वे ब्राह्मण और क्षत्रिय अत्यन्त हर्षयुक्त हो उसी मार्गसे पुरुषोत्तमक्षेत्रको चल दिये।


~~ ० ~~

पुण्डरीक और अम्बरीषद्वारा भगवान्‌की स्तुति तथा पुरुषोत्तमक्षेत्रमें रहकर भजन करनेसे उनकी मुक्तिका वर्णन

जैमिनीजी कहते हैं—उन दोनोंके मनमें निर्वेद (खेद एवं वैराग्य)-का उदय हुआ था। वे कुसंग छोड़कर मन-ही-मन भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए तथा शुद्ध आहार और व्रतका पालन करते हुए कुछ समयमें भगवान् पुरुषोत्तमके नीलाचल-निवासपर पहुँचे। वहाँ तीर्थराजके जलमें विधिपूर्वक स्नान करके वे मन्दिरके दरवाजेपर खड़े हो गये और साष्टांग प्रणाम करके भगवान्‌का निरीक्षण करने लगे। परंतु उस समय उन्हें भगवद्विग्रहका दर्शन नहीं हुआ। तब चिन्तासे व्याकुल होकर उन्होंने भगवान्‌का दर्शन जबतक न हो जाय तबतकके लिये अनशन आरम्भ किया और भगवान्‌के पापनाशक नामोंका कीर्तन करने लगे। तीसरी रात्रिमें उन्हें एक ज्योतिका दर्शन हुआ। तत्पश्चात् वे पुनः तीन दिनोंतक धैर्यपूर्वक उपवास करते रहे। इस प्रकार

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३२९

जब सातवीं रात्रि आयी, तब उन्हें भगवत्स्वरूपका दर्शन हुआ। उनके भीतर दिव्य ज्ञान प्रकट हुआ और वे पापसे छूटकर साक्षात् भगवान् जगन्नाथका दर्शन करने लगे। भगवान्‌के हाथोंमें शंख, चक्र और गदा विराजमान थे। वे दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित थे। उन्होंने अपने चरणकमलोंको रत्नमयी पादुकाके ऊपर रखा था। खिले हुए कमलके समान विशाल नेत्र शोभा पा रहे थे। मुखपर प्रसन्नता छायी हुई थी। बायीं ओर श्रीलक्ष्मीजी विराजमान थीं। आगे खड़े होकर भगवत्स्वरूपका ध्यान करनेवाले प्रह्लाद आदि वैष्णवोंको, जो कि भगवान्‌का चित्त अपनी ओर आकृष्ट कर रहे थे, भगवान् श्रीहरि मानो अपने श्रीविग्रहमें धारण कर रहे थे। वक्षःस्थलपर शोभा पानेवाली कौस्तुभमणिमें प्रतिबिम्बित हुए देवता आदिके द्वारा मानो भगवान् अपनी विश्वमय मूर्तिका प्रकाश कर रहे थे। इस प्रकार भगवान्‌की झाँकी करके वे ब्राह्मण और क्षत्रिय क्षणभरमें सब विद्याओंके पारंगत विद्वान् हो गये। उन्होंने तीन बार देवेश्वर विष्णुकी परिक्रमा करके दोनों हाथ जोड़कर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और अत्यन्त प्रसन्न होकर स्तुति प्रारम्भ की।

पुण्डरीक बोले—जगदाधार ! आपको नमस्कार है। आप सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। परमात्मन् ! नारायण ! आप सबको शरण देनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। एकमात्र आप ही परमार्थ हैं। उत्पत्ति और नाश आदि विकार आपसे सर्वथा दूर हैं। ध्यानरूपी नेत्रोंसे देखनेवाले महात्मा आपको नित्यानन्दस्वरूप मानते हैं। आप चैतन्यमात्र सम्पूर्ण जगत्‌के स्वामी, सबके अधिष्ठान तथा परसे भी परे हैं। आपका स्वरूप अत्यन्त निर्मल है। मूढ़ हृदयवाले मनुष्य आपको कैसे जान सकते हैं? नाथ! मैं अत्यन्त दीन होकर आपकी शरणमें आया हूँ, मुझपर दया कीजिये। मैं अज्ञानी, पापाचारी तथा संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ, मेरा उद्धार कीजिये। ब्रह्माण्डमें आपके समान दूसरा कौन बन्धु है, जो अपने स्वार्थकी अपेक्षा न रखकर दीनों और अनाथोंपर दया करता हो? जो मूढ़ योग और क्षेमकी इच्छा रखकर अनायास ही मोक्ष प्रदान करनेवाले आपकी उपासना करते हैं, वे आपकी मायासे मोहित हैं। जगन्नाथ ! अकस्मात् लिया हुआ आपका 'नारायण' नाम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि अकेले ही कर देता है। नाथ ! संसार-सागरमें डूबे हुए लोगोंके लिये एकमात्र आप ही शरण हैं। आप अनन्य भक्तिसे चिन्तन करनेपर ज्ञानरूपी नौकापर आरूढ़ हो करुणाकी पतवार हाथमें लेकर अचेतन प्राणीको संसार-समुद्रके दूसरे पार पहुँचानेमें अकेले ही समर्थ हैं। भगवन् ! मुझे अपने चरणकमलोंके प्रति दृढ़ भक्ति प्रदान कीजिये, जिससे मैं इस अत्यन्त दुस्तर भयंकर संसार-समुद्रके पार हो जाऊँ। धर्म, अर्थ और काम इस त्रिवर्गका सेवन केवल मन्दबुद्धि पुरुष ही करते हैं। ये तीनों बहुत क्षुद्र हैं और अहितकर एवं अल्प सुख प्रदान करनेवाले हैं। अतः इनसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मुझे तो आप अब अपने युगल चरणारविन्दोंके चिन्तनसे बढ़े हुए घनीभूत आनन्दके समुद्रमें अवगाहन करनेकी आज्ञा दीजिये।

इस प्रकार स्तुति करके ब्राह्मण पुण्डरीक अश्रुगद्गद वाणीसे 'त्राहि कृष्ण' की पुकार लगाते हुए भगवान् जगन्नाथके चरणकमलोंमें गिर पड़े। तत्पश्चात् क्षत्रियकुमार अम्बरीषने उठकर हाथ जोड़े हुए इस प्रकार स्तवन किया।

अम्बरीष बोला—देव ! सर्वात्मन् ! मुझपर प्रसन्न होइये। आपके मस्तक और भुजाएँ असंख्य हैं। नासिका, नेत्र और हाथ-पैरोंकी भी कोई संख्या नहीं है। आपको नमस्कार है। विश्वमूर्ते ! आप छत्तीस तत्त्वोंसे परे हैं। प्रपंचसे रहित होते

३३०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

हुए भी इसके विस्तारमें सहायक हैं। जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चार प्रकारके प्राणियोंसे भरे हुए जगत्के आप ही आश्रय हैं। आपको नमस्कार है। जिनके चरणोंसे प्रकट हुई गंगा तीनों लोकोंको पवित्र करती है, जिनका नाम ब्रह्महत्या आदि पापोंकी निश्चित शुद्धि करनेवाला है तथा कीर्तन करनेपर सबको कल्याण प्रदान करता है, उन कल्याणस्वरूप आप परमात्माको नमस्कार है। देव! केवल आपके नामकीर्तनसे भी सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। बुद्धिशाली विद्वान् पुरुष कौतूहलपूर्वक आपकी खोज करते हैं। नाथ! आपके चरणकमलोंके जल (चरणोदक)-का आश्रय लेनेपर वह सन्तापको हर लेता है। मैं तीनों तापोंसे पीड़ित हूँ। अपने इन युगल चरणोंमें मेरी भक्ति दृढ़ कर दीजिये। मेरा दूसरा कोई स्वामी नहीं है तथा मेरे माँगने योग्य दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है। जगन्नाथ! मैं आपके चरणोंमें सहस्रों बार प्रणाम करके यह याचना करता हूँ कि जबतक मैं प्राण धारण करूँ तबतक आपके इन युगल चरणकमलोंमें ही मेरी दृढ़ भक्ति बनी रहे। आपके ये चरण ही समस्त पुरुषार्थोंके बीज हैं। इन चरणोंकी भक्ति करके ब्रह्माजीने यह सृष्टि की है, रुद्रदेव सबका संहार करते हैं तथा लक्ष्मीजी सबको ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। दीनोंपर दया करनेवाले प्रभो! मैं अनन्यचित्त होकर आपके उन्हीं चरणोंकी भक्ति माँगता हूँ। अनादि अविद्याके इस दुस्तर एवं सुदृढ़ पंकमें डूबकर मैं कोई आश्रय न मिलनेके कारण नष्ट हो रहा हूँ। जगन्नाथ! इससे मेरा उद्धार करनेके लिये आपकी महामहिमामयी भक्तिके सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं है। आपकी भक्तिको छोड़कर कोई भी साधन प्राणियोंका उद्धार करनेमें समर्थ नहीं है। स्वामिन्! आपके अतिरिक्त दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं है। प्रभो! मुझ शरणागतपर कृपा कीजिये।

इस प्रकार स्तुति करते हुए अम्बरीष भगवान् जगन्नाथके चरण-कमलोंके समीप 'प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये' ऐसा बार-बार कहकर दण्डकी भाँति गिर पड़ा। तदनन्तर पुण्डरीक और अम्बरीषने जब पुनः नेत्र खोले तब चर्मचक्षुसे दिव्य सिंहासनपर विराजमान नीलमेघके समान श्यामसुन्दर भगवान् पुरुषोत्तमको देखा। उनके नेत्र खिले हुए कमलके समान विशाल थे। अधर लाल और नासिका मनोहर थी। उनके कानोंमें दिव्य कुण्डल झिलमिला रहे थे। भगवान्ने अपने चारों हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। वे वनमालासे विभूषित थे। उनका वक्षःस्थल ऊँचा दिखायी देता था। कण्ठमें परम सुन्दर हार शोभा पा रहे थे। मस्तकपर बहुमूल्य मुकुट प्रकाशमान था। वक्षमें श्रीवत्सका चिह्न और कौस्तुभमणि शोभा दे रहे थे। भुजाओंमें उन्होंने दिव्य अंगद (भुजबंद) धारण कर रखे थे। उनकी विशाल भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। वे दीनों और दुखियोंकी रक्षाके लिये सदैव उद्यत प्रतीत होते थे। उनकी कटिमें दिव्य पीताम्बर शोभा पाता था। उसके ऊपर सोनेकी करधनी बँधी हुई थी, जिसकी बिचली गाँठमें मणि पिरोयी गयी थी। भगवान् दिव्य हार और दिव्य चन्दनसे विभूषित थे। वे सुवर्णमय कमलके आसनपर विराजमान थे। उनके सब अंगोंमें अनुपम शोभाका निवास था। वे शरणागतोंका सन्ताप हरनेके लिये महान् सुधासागरके समान प्रतीत होते थे। भलीभाँति खिले हुए कल्पवृक्षके समान वे सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाले थे। उनके दक्षिण भागमें हलमय शस्त्र धारण करनेवाले भगवान् बलभद्र बैठे थे। जिन्होंने अपने महान् बलसे समस्त ब्रह्माण्डका भार धारण किया है, वे बलभद्रजी नागराज शेषके रूपमें शोभा पाते थे। मस्तकपर सात फन उन्हें सुशोभित करते थे। वे कैलाशशिखरके समान ऊँचे और श्वेतवर्ण थे। उनके कानोंमें कुण्डल प्रकाशित हो रहा था।

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३३१ ---|---

गलेमें विचित्र वनमाला थी। उन्होंने दिव्य नीलवस्त्र पहन रखा था। उनकी पीठ नीची और छाती ऊँची थी। वे सम्पूर्ण शरीरको कुण्डलित करके बैठे थे। उनके चारों हाथोंमें भी शंख, चक्र, गदा और पद्म शोभायमान थे। अनेक प्रकारके अलंकार धारण करनेसे वे और भी सुन्दर प्रतीत होते थे। भगवान् बलभद्र प्रणाम करनेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। इन दोनोंके मध्यभागमें कुंकुमके समान लाल वर्णवाली कल्याणमयी सुभद्रादेवी विराजमान थीं, जो सम्पूर्ण लावण्यका निवासस्थान जान पड़ती थीं। समस्त देवता उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उन्होंने अपने हाथोंमें कमल धारण कर रखा था। वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थीं। सुभद्रा भी शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। समस्त पापोंका नाश करनेवाली हैं तथा संसार-समुद्रमें डुबे हुए मनुष्योंको पार उतारनेवाली और देवताओंको भी तारनेवाली हैं। भगवान् पुरुषोत्तमके वामभागमें उत्तम चक्र प्रकाशित होता था। श्रेष्ठ काष्ठसे निर्मित तथा स्वर्णके संयोगसे परम उज्ज्वल चार स्वरूपोंमें स्थित भगवान् पुरुषोत्तमका प्रातःकालका दर्शन करके उन ब्राह्मण और क्षत्रियकुमारोंने अपने परिश्रमको सार्थक माना और पूर्वोक्त स्वप्नलीलाका स्मरण करके वे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए और सोचने लगे 'यह काष्ठकी प्रतिमा नहीं, यहाँ तो साक्षात् ब्रह्म प्रकाशमान | हैं।' उस समय उन्होंने यज्ञसभामें आये हुए ब्राह्मणोंकी बातपर पूर्ण विश्वास किया और आपसमें कहा— 'कहाँ हम दोनों महापातकी क्रमशः यमयातना भोगनेके अधिकारी और कहाँ देवताओंसे सेवित भगवान् विष्णुका दर्शन! हम तो निरे मूर्ख थे। इस समय अठारह विद्याओंमें प्रवीण हो गये हैं। इसलिये यह भ्रम नहीं, वास्तविक ज्ञान है। यथार्थवादी ब्राह्मणोंने जो कहा था कि तीर्थराज समुद्रके तटपर साक्षात् ब्रह्म विराजमान हैं और वटवृक्षकी जड़में ये सदा प्रकाशमान होते हैं। उनके दर्शनसे सब प्राणी मुक्त हो जाते हैं, उन सब बातोंका आज प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। ये वही भगवान् जगन्नाथ हैं, जो चार स्वरूपोंमें स्थित हुए हैं। पृथ्वीपर जब ये अवतार लेते हैं, तब चार रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। अब हम दोनों जबतक प्राण धारण करेंगे, इन्हींके समीप रहेंगे। क्षुद्र कामनाओंसे मुँह मोड़कर अन्यत्र जानेका नाम भी न लेंगे।'<br><br>ऐसा निश्चय करके वे दोनों भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर हो गये। सदा नारायणका नाम जपते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। यह पापनाशक चरित्र अत्यन्त गोपनीय है। इस तीर्थके प्रसंगसे मैंने इसका वर्णन किया है। जो मनुष्य पुण्डरीक और अम्बरीषके इस चरित्रको सुनते और कहते हैं, वे परम आनन्दके साथ भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होते हैं।


## उत्कल देशके भव्य रूपका परिचय, राजा इन्द्रद्युम्नका एक तीर्थयात्रीसे पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा सुनकर पुरोहितके भाईको वहाँ भेजना और उनका नीलाचलके समीप शबरसे वार्तालाप

**मुनियोंने पूछा—** द्विजश्रेष्ठ! जहाँ काष्ठप्रतिमाके रूपमें साक्षात् भगवान् नारायण विराजमान हैं, वह पुरुषोत्तमक्षेत्र किस देशमें है? | **जैमिनिजीने उत्तर दिया—** उत्कल (उड़ीसा) नामसे प्रसिद्ध एक परम पावन देश है, जहाँ अनेक तीर्थ और बहुत-से पवित्र देवमन्दिर हैं।
---|---
३३२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वह प्रदेश दक्षिण समुद्रके तटपर बसा हुआ है। उसमें रहनेवाले पुरुष सदाचारके आदर्श हैं। वहाँके ब्राह्मण उत्तम आचार और स्वाध्यायसे सम्पन्न हो सदा यज्ञकर्ममें संलग्न रहते हैं। सृष्टिके आदिमें यज्ञ और वेदाध्ययनकी प्रवृत्ति वहींसे होती है, अतः वहाँके निवासी ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंके प्रवर्तक हैं। उस देशको अठारह विद्याओंकी निधि बताया गया है। वहाँ भगवान् नारायणकी आज्ञासे घर-घरमें लक्ष्मीका वास है। उस देशके निवासी मनुष्य लज्जाशील, विनयी, चिन्ता तथा रोगसे रहित, पिता-माताके सेवक, सत्यवादी तथा विष्णुभक्त होते हैं। वहाँ कोई भी ऐसा पुरुष नहीं होगा, जो विष्णुका भक्त एवं आस्तिक न हो। उस देशके सब लोग परोपकारी होते हैं। लोभी, दुष्ट और शठ मनुष्योंका वहाँ सर्वथा अभाव है। उस प्रदेशके लोग दीर्घजीवी होते हैं। स्त्रियाँ पतिव्रता, सुशीला, धर्मपरायणा, लज्जा और सदाचारसे विभूषित, रूपवती, सब प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत तथा कुल, शील और वयके अनुसार आचार-विचारका पालन करनेवाली होती हैं।

वहाँके क्षत्रिय भी अपने कर्तव्यका पालन करते हैं। वे सब-के-सब प्रजाकी रक्षाके व्रतमें दीक्षित होते हैं। दान देनेमें उदार और सब शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण होते हैं। सदा अधिक दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। उनकी यज्ञवेदियाँ सदा प्रज्वलित रहती हैं तथा सुवर्णभूषित यूप शोभा पाते रहते हैं। उनके घरपर पधारे हुए अतिथियोंको उनकी कामनासे अधिक वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया जाता है। उत्कलके वैश्य भी कृषि, वाणिज्य और गोरक्षाकी वृत्तिमें स्थित होते हैं। वे अपनी भक्ति और धनसे देवता, गुरु और ब्राह्मणोंको तृप्त करते हैं। वहाँ एकके घरपर पधारे हुए याचकको दूसरेके घरपर जानेकी आवश्यकता नहीं रह जाती। उस देशके शूद्र संगीत, काव्य, कला और शिल्पमें कुशल तथा प्रिय वचन बोलनेवाले होते हैं। धार्मिक एवं स्नान-दानादि कर्मोंमें तत्पर होते हैं। वे अपने मन, वाणी, क्रिया तथा धनके द्वारा द्विजोंकी सेवामें लगे रहते हैं। वहाँ वर्णसंकरजातिके लोग भी अपने-अपने धर्ममें स्थित होते हैं। ऋतुएँ विपरीतभाव नहीं धारण करतीं। मेघ असमयमें वर्षा नहीं करते। खेतीको हानि नहीं पहुँचती। हवाका भी कष्ट नहीं होता तथा प्रजाको भूखकी पीड़ा नहीं सहन करनी पड़ती। अकाल और महामारीका प्रकोप नहीं होता। राज्यका नाश नहीं होता। पृथिवीपर होनेवाली कोई भी वस्तु वहाँ अलभ्य नहीं है। यही वह सब देशोंमें श्रेष्ठ उत्कल है। दक्षिण समुद्रमें मिलनेवाली ऋषिकुल्या नदीतक पहुँचकर स्वर्णरेखा और महानदीके बीचमें जो देश प्रतिष्ठित है, वही उत्कल है। इस पवित्र प्रान्तमें बहुत-से उत्तम क्षेत्र हैं।

सत्ययुगमें इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं। उनका जन्म सूर्यवंशमें हुआ था। वे ब्रह्माजीसे पाँचवीं पीढ़ी नीचे थे। राजा इन्द्रद्युम्न सत्यवादी, सदाचारी, शुद्ध तथा सात्त्विक पुरुषोंमें अग्रगण्य थे। प्रजाको अपनी सन्तान समझकर सदा न्यायपूर्वक उसका पालन करते थे। वे आध्यात्मिक ज्ञानमें कुशल, शूर, समरविजयी, सदा उद्यमशील, ब्राह्मणपूजक तथा पितृभक्त थे। अठारह विद्याओंमें दूसरे बृहस्पतिके समान प्रवीण थे। ऐश्वर्यमें देवराज इन्द्र तथा कोष-संग्रहमें कुबेरकी समानता करते थे। रूपवान्, सौभाग्यशाली, शीलवान्, दानी, भोगी, प्रिय वक्ता, समस्त यज्ञोंका यजन करनेवाले तथा सत्यप्रतिज्ञ भी थे। उनमें भगवान् विष्णुकी भक्ति थी, सत्यभाषणका गुण था। उन्होंने क्रोध और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली थी। वे श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ तथा सहस्रों अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान कर चुके थे। संसारबन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छा रखकर सदा धर्माचरणमें ही लगे रहते थे। इस प्रकार वे सर्वगुणसम्पन्न राजा इन्द्रद्युम्न समूची पृथिवीका पालन करते हुए मालव देशमें विख्यात

  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३३३ ---|---

और समस्त रत्नोंसे सम्पन्न द्वितीय अमरावतीके समान सुशोभित अवन्ती नामवाली नगरीमें निवास करते थे। वहाँ रहते हुए राजाने भगवान् विष्णुमें मन, वाणी और क्रियाद्वारा परम अद्भुत एवं उत्तम भक्ति बढ़ायी।

एक दिन भगवान् लक्ष्मीपतिकी पूजाके समय देवपूजागृहमें बैठे हुए राजाने अपने पुरोहितसे आदरपूर्वक कहा—'आप उस उत्तम क्षेत्रका पता लगाइये जहाँ हम इसी नेत्रसे साक्षात् भगवान् जगन्नाथका दर्शन करें।' वैष्णव राजाके ऐसा कहनेपर पुरोहितजीने तीर्थयात्रियोंके एक झुंडको देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहा—'तीर्थोंमें विचरनेवाले तथा तीर्थोंका ज्ञान रखनेवाले धर्मात्मा पुरुषो ! हमारे महाराज जो आज्ञा देते हैं उसे तुमलोगोंने सुना है क्या ? तुममेंसे किसीको उत्तम तीर्थका पता है क्या ?' उनका अभिप्राय समझकर उन यात्रियोंमेंसे एक व्यक्ति, जो बहुत तीर्थोंमें घूम चुका था और अच्छा वक्ता था, राजाके पास आ हाथ जोड़कर बोला—'राजन् ! मैंने बचपनसे ही अनेक तीर्थोंमें भ्रमण किया है। भारतवर्षमें ओड्र नामसे प्रसिद्ध एक देश है। उस देशमें दक्षिण समुद्रके तटपर श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र है, जहाँ नीलाचल नामक एक पर्वत है। वह सब ओरसे वनोंद्वारा घिरा हुआ है। उसके बीचमें कल्पवृक्ष है, जिसके पश्चिम भागमें रौहिण कुण्ड है। वह भगवान्‌की करुणारूप जलसे भरा हुआ है, जो स्पर्श करनेमात्रसे ही मोक्ष देनेवाला है। उसके पूर्वीय तटपर इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई भगवान् वासुदेवकी प्रतिमा है, जो साक्षात् मोक्ष प्रदान करनेवाली है। उस कुण्डमें स्नान करके जो भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है, वह मुक्त हो जाता है। वहाँ शबरदीपक नामक एक श्रेष्ठ आश्रम है, जो भगवद्विग्रहसे पश्चिम दिशामें स्थित है। उस आश्रमसे एक पगडंडीका रास्ता है, जिससे भगवान् विष्णुके स्थानतक जा सकते हैं। वहाँ शंख-चक्र-गदाधारी साक्षात् भगवान् जगन्नाथ विराजमान हैं। वे करुणाके समुद्र हैं, दर्शनमात्रसे ही सब जीवोंको मुक्ति प्रदान करते हैं। राजन् ! देवाधिदेव जगन्नाथजीकी प्रसन्नताके लिये मैंने एक वर्षतक पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास किया। मैं महामूर्ख था परंतु उनकी कृपासे इस समय अठारहों विद्याओंमें प्रवीण हो गया हूँ। मेरी बुद्धि भी निर्मल हो गयी है, जिससे भगवान् विष्णुके सिवा और कुछ मैं नहीं देखता। तुम सदैव दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विष्णुभक्त हो, इसलिये तुम्हारे पास आया हूँ। मैं तुमसे इस समय धन अथवा भूमि नहीं माँगता। केवल इतना ही कहता हूँ कि मेरी इस बातको झूठ न मानकर वहाँ पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिका भजन करो।'

यों कहकर वह जटाधारी यात्री सबके देखते-देखते शीघ्र अन्तर्धान हो गया। इससे राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे व्याकुल होकर पुरोहितसे बोले—'यह अलौकिक वृत्तान्त अलौकिक पुरुषसे ही सुना गया है। अब मेरी बुद्धि जहाँ भगवान् गदाधर विराजमान हैं, वहाँ जानेके लिये उतावली हो रही है। द्विजश्रेष्ठ ! मेरे धर्म, अर्थ और काम एक-दूसरेके अनुकूल रहकर सदा आपके अधीन रहे हैं। आपके प्रसादसे मैंने त्रिवर्गका साधन तो कर लिया। यदि आप इस भगवद्दर्शनके कार्यमें भी मेरे साथ चलेंगे तो मैं आपके सहयोगसे चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लूँगा।'

पुरोहित बोले—राजन् ! मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि हमलोग सहायकोंसहित पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चलकर बस जायँ। जन्मकी सफलता इससे बढ़कर और क्या हो सकती है कि साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिका दर्शन किया जाय। इस समय मेरा छोटा भाई विद्यापति सब देशोंमें घूमनेवाले दूतोंके साथ वहाँ जायगा और जगन्नाथजीका दर्शन करके उस पर्वतपर सैनिकोंके ठहरनेयोग्य स्थानका पता

३३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

लगाकर शीघ्र सब समाचार ले आयेगा। इससे हमलोगोंका कल्याण होगा।

पुरोहितकी यह बात सुनकर राजा इन्द्रद्युम्नने कहा—ब्रह्मन्! बहुत अच्छा। अब मैं भगवान् विष्णुके समीप उसी क्षेत्रमें चलकर बसूँगा।

ऐसा कहकर राजाने प्रसन्नतापूर्वक अन्तःपुरमें प्रवेश किया और पुरोहितने उन सब यात्रियोंको यथायोग्य सम्मान देकर अपने-अपने आश्रमको भेजा। फिर अपने भाईको ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर शुभ मुहूर्तमें भेजा। विद्यापति समस्त विश्वसनीय पुरुषोंके साथ पुष्पशोभित रथपर आरूढ़ हो वहाँसे प्रस्थित हुआ। उसने रथमें बैठे-बैठे यह विचार किया कि 'अहो! मेरा जन्म सफल हो गया। मेरी रात्रि मंगलमय प्रभातका दर्शन करानेवाली होगी; क्योंकि मैं भगवान्‌के उस मुखारविन्दका दर्शन करूँगा, जो समस्त पापोंको दूर करनेवाला है। श्रवण, मनन आदि साधनोंसे निरन्तर प्रयत्न करनेवाले साधक जिन्हें अपने हृदय-कमलके मध्य विराजमान देखते हैं, उन्हीं भगवान् चक्रपाणिको आज मैं नीलाचलके शिखरपर साक्षात् शरीर धारण किये देखूँगा, जो शरीरबन्धनका नाश करनेवाले हैं। श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणके वचनोंद्वारा जिनके स्वरूपका भलीभाँति निरूपण करना असम्भव है, उन्हीं भगवान् लक्ष्मीनधिके अदृष्टपूर्व स्वरूपका दर्शन करके आज मैं भवसागरसे पार हो जाऊँगा। जिनके नामसंकीर्तनमात्रसे उनका स्मरण करनेवाले मनुष्योंके विविध पापोंका संहार हो जाता है, उन्हीं अप्रमेय भगवान् जगन्नाथके नीलगिरिनिवासी स्वरूपका आज मैं प्रत्यक्ष दर्शन करूँगा जिनके रोम-रोममें असंख्य ब्रह्माण्डोंकी मालाएँ हैं, जिनके सहस्रों मस्तक, चरण और नेत्र हैं, जिनकी निःश्वास-वायुसे सम्पूर्ण वेदोंकी राशि प्रकट हुई है तथा जो सब प्रपंचोंके स्वामी हैं, उन पुराणपुरुष भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। अहा! मेरा कैसा भाग्य है कि इन्हीं चर्मचक्षुओंसे मैं जगत्‌के आदिकारण भगवान् नारायणका दर्शन करूँगा।'

इसी विचारमें पड़े हुए प्रसन्नचित्त ब्राह्मणको रथके वेगसे लाँघे हुए विशाल मार्गका कुछ भी पता न चला। मार्गमें मिले हुए अनेकों वन, पर्वत तथा दुर्गम स्थानोंको देखते हुए वे सूर्यास्तके समय महानदीके तटपर जा पहुँचे। उन्होंने रथसे उतरकर विधिपूर्वक नित्यकर्म किया और सायंसन्ध्या करके भगवान् मधुसूदनका ध्यान किया। तत्पश्चात् रथपर ही बैठे-बैठे रात बितायी। सबेरा होनेपर शीघ्र ही महानदीको पार किया। फिर प्रातःकालिक कृत्य समाप्त करके रथपर आरूढ़ हो गोविन्दका चिन्तन करते हुए ही आगेको प्रस्थान किया। भगवान्‌के निकट जानेवाले मार्गको देखते हुए वे एकाम्रवनमें पहुँचे। उसके बाद कल्पवटसे विभूषित गगनचुम्बी नीलाचलका शिखर देखा, जो दर्शकोंके पापोंका नाश करनेवाला है। साक्षात् शरीरधारी भगवान् विष्णुके उस अद्भुत निवासस्थानको खोजते हुए विद्यापति नीलाचलकी उपत्यका (तराई)-में जा पहुँचे। अब वे भगवान्‌के दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये; किंतु आगे बढ़नेका मार्ग नहीं मिला। तब भूमिपर कुशा बिछाकर मौनभावसे लेट गये और भगवद्दर्शनकी सिद्धिके लिये भगवान्‌के ही शरणागत हो गये। तब पर्वतसे पश्चिम भगवद्भक्तके विषयमें बातचीत करनेवाले लोगोंकी अलौकिक वाणी सुनायी देने लगी। तब वे प्रसन्न होकर उसी शब्दका अनुसरण करते हुए आगे बढ़े। कुछ ही दूरपर विख्यात शबरदीपक नामक आश्रम मिला। वहाँ उन्होंने वैष्णव भक्तोंका दर्शन किया और उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब विश्वावसु नामक शबर भगवान् विष्णुका पूजन समाप्त करके पूजाके प्रसादसे सुशोभित हो पर्वतके बीचसे वहाँ आया। उसे देखकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ और वे सोचने लगे—ये श्रेष्ठ वैष्णव हैं, इनसे मुझे भगवान् विष्णुके सम्बन्धमें

* वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * ३३५


दुर्लभ समाचार प्राप्त होगा। इसी विचारमें पड़े हुए ब्राह्मणसे शबरने कहा—'ब्रह्मन्! आप कहाँसे इस वनमें पधारे हैं? यह वनका मार्ग तो बड़ा दुस्तर है, आप भूख-प्याससे बहुत थक गये होंगे। यहाँ सुखपूर्वक बैठिये और दीर्घकालतक विश्राम कीजिये।' ऐसा कहते हुए विश्वावसुने ब्राह्मणके लिये पाद्य, आसन और अर्घ्य प्रदान किया तथा विनययुक्त वाणीमें पूछा—'विप्रवर! आप फलाहार करेंगे या तैयार की हुई रसोई? जैसी आपकी रुचि हो, वैसा ही भोजन मैं प्रस्तुत करूँगा। भगवन्! आज मेरा अहोभाग्य है, यह जीवन सफल हो गया; क्योंकि आप साक्षात् दूसरे विष्णुकी भाँति मेरे घरपर पधारे हैं।'

इस प्रकार पूछनेपर श्रेष्ठ ब्राह्मण विद्यापतिने कहा—वैष्णवश्रेष्ठ! फल अथवा तैयार की हुई रसोईसे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। मैं बहुत दूरसे जिस उद्देश्यको लेकर यहाँ आया हूँ, उसे सफल करें। मैं अवन्तीपुरीके निवासी महाराज इन्द्रद्युम्नका पुरोहित हूँ और भगवान् विष्णुके दर्शनकी इच्छासे यहाँ आया हूँ। राजाने मुझे यहाँ निवास करनेवाले नीलमाधव श्रीहरिका दर्शन करनेके लिये भेजा है। दर्शन करके मैं जबतक राजाके पास इसका समाचार न पहुँचा दूँगा, तबतक राजा निराहार रहेंगे। इसलिये आप मुझे भगवान् विष्णुका दर्शन कराइये।


विद्यापतिका शबरके साथ नीलमाधवका दर्शन करके तीर्थकी परिक्रमा करना और अवन्तीमें जाकर राजा इन्द्रद्युम्नको सब समाचार सुनाना

जैमिनिजी कहते हैं—ब्राह्मणकी बात सुनकर शबरने अविनाशी भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए कहा—'विप्रवर! हमने पहलेसे भी यह समाचार सुन रखा है कि इस तीर्थमें राजा इन्द्रद्युम्न निवास करेंगे। चलिये, पर्वतके ऊपरकी भूमिपर चलें।' ऐसा कहकर शबर ब्राह्मणको उसी मार्गसे गहन वनमें ले गया। ऊपर-ऊपर चढ़कर शिलाखण्डोंके कारण ऊँची-नीची भूमिपर एक-एक मनुष्यके चलनेयोग्य रास्ता था, वह भी काँटोंसे भरा होनेके कारण अति दुर्गम हो रहा था और वहाँ प्रायः अन्धकार छाया रहता था। शबर वाणीद्वारा बोल-बोलकर ब्राह्मणको रास्तेका परिचय कराता चलता था। इस प्रकार चार घड़ीतक चलकर वे दोनों रौहिण कुण्डके तटपर पहुँचे। उसे देखकर शबरने कहा—'द्विजश्रेष्ठ! यह रौहिण नामक कुण्ड है, जो समस्त जलोंकी उत्पत्तिका कारणभूत महातीर्थ है। यहाँ स्नान करके मनुष्य वैकुण्ठ धाममें जाता है। इसके पूर्वभागमें यह महान् कल्पवट है, जिसकी छायामें जाकर मनुष्य ब्रह्महत्याका भी नाश कर देता है। इन दोनोंके मध्यभागमें जो