संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 362, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३३३ ---|---
और समस्त रत्नोंसे सम्पन्न द्वितीय अमरावतीके समान सुशोभित अवन्ती नामवाली नगरीमें निवास करते थे। वहाँ रहते हुए राजाने भगवान् विष्णुमें मन, वाणी और क्रियाद्वारा परम अद्भुत एवं उत्तम भक्ति बढ़ायी।
एक दिन भगवान् लक्ष्मीपतिकी पूजाके समय देवपूजागृहमें बैठे हुए राजाने अपने पुरोहितसे आदरपूर्वक कहा—'आप उस उत्तम क्षेत्रका पता लगाइये जहाँ हम इसी नेत्रसे साक्षात् भगवान् जगन्नाथका दर्शन करें।' वैष्णव राजाके ऐसा कहनेपर पुरोहितजीने तीर्थयात्रियोंके एक झुंडको देखकर उनसे प्रेमपूर्वक कहा—'तीर्थोंमें विचरनेवाले तथा तीर्थोंका ज्ञान रखनेवाले धर्मात्मा पुरुषो ! हमारे महाराज जो आज्ञा देते हैं उसे तुमलोगोंने सुना है क्या ? तुममेंसे किसीको उत्तम तीर्थका पता है क्या ?' उनका अभिप्राय समझकर उन यात्रियोंमेंसे एक व्यक्ति, जो बहुत तीर्थोंमें घूम चुका था और अच्छा वक्ता था, राजाके पास आ हाथ जोड़कर बोला—'राजन् ! मैंने बचपनसे ही अनेक तीर्थोंमें भ्रमण किया है। भारतवर्षमें ओड्र नामसे प्रसिद्ध एक देश है। उस देशमें दक्षिण समुद्रके तटपर श्रीपुरुषोत्तमक्षेत्र है, जहाँ नीलाचल नामक एक पर्वत है। वह सब ओरसे वनोंद्वारा घिरा हुआ है। उसके बीचमें कल्पवृक्ष है, जिसके पश्चिम भागमें रौहिण कुण्ड है। वह भगवान्की करुणारूप जलसे भरा हुआ है, जो स्पर्श करनेमात्रसे ही मोक्ष देनेवाला है। उसके पूर्वीय तटपर इन्द्रनीलमणिकी बनी हुई भगवान् वासुदेवकी प्रतिमा है, जो साक्षात् मोक्ष प्रदान करनेवाली है। उस कुण्डमें स्नान करके जो भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करता है, वह मुक्त हो जाता है। वहाँ शबरदीपक नामक एक श्रेष्ठ आश्रम है, जो भगवद्विग्रहसे पश्चिम दिशामें स्थित है। उस आश्रमसे एक पगडंडीका रास्ता है, जिससे भगवान् विष्णुके स्थानतक जा सकते हैं। वहाँ शंख-चक्र-गदाधारी साक्षात् भगवान् जगन्नाथ विराजमान हैं। वे करुणाके समुद्र हैं, दर्शनमात्रसे ही सब जीवोंको मुक्ति प्रदान करते हैं। राजन् ! देवाधिदेव जगन्नाथजीकी प्रसन्नताके लिये मैंने एक वर्षतक पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास किया। मैं महामूर्ख था परंतु उनकी कृपासे इस समय अठारहों विद्याओंमें प्रवीण हो गया हूँ। मेरी बुद्धि भी निर्मल हो गयी है, जिससे भगवान् विष्णुके सिवा और कुछ मैं नहीं देखता। तुम सदैव दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले विष्णुभक्त हो, इसलिये तुम्हारे पास आया हूँ। मैं तुमसे इस समय धन अथवा भूमि नहीं माँगता। केवल इतना ही कहता हूँ कि मेरी इस बातको झूठ न मानकर वहाँ पुरुषोत्तमक्षेत्रमें निवास करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिका भजन करो।'
यों कहकर वह जटाधारी यात्री सबके देखते-देखते शीघ्र अन्तर्धान हो गया। इससे राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे व्याकुल होकर पुरोहितसे बोले—'यह अलौकिक वृत्तान्त अलौकिक पुरुषसे ही सुना गया है। अब मेरी बुद्धि जहाँ भगवान् गदाधर विराजमान हैं, वहाँ जानेके लिये उतावली हो रही है। द्विजश्रेष्ठ ! मेरे धर्म, अर्थ और काम एक-दूसरेके अनुकूल रहकर सदा आपके अधीन रहे हैं। आपके प्रसादसे मैंने त्रिवर्गका साधन तो कर लिया। यदि आप इस भगवद्दर्शनके कार्यमें भी मेरे साथ चलेंगे तो मैं आपके सहयोगसे चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त कर लूँगा।'
पुरोहित बोले—राजन् ! मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि हमलोग सहायकोंसहित पुरुषोत्तमक्षेत्रमें चलकर बस जायँ। जन्मकी सफलता इससे बढ़कर और क्या हो सकती है कि साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिका दर्शन किया जाय। इस समय मेरा छोटा भाई विद्यापति सब देशोंमें घूमनेवाले दूतोंके साथ वहाँ जायगा और जगन्नाथजीका दर्शन करके उस पर्वतपर सैनिकोंके ठहरनेयोग्य स्थानका पता