भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वह प्रदेश दक्षिण समुद्रके तटपर बसा हुआ है। उसमें रहनेवाले पुरुष सदाचारके आदर्श हैं। वहाँके ब्राह्मण उत्तम आचार और स्वाध्यायसे सम्पन्न हो सदा यज्ञकर्ममें संलग्न रहते हैं। सृष्टिके आदिमें यज्ञ और वेदाध्ययनकी प्रवृत्ति वहींसे होती है, अतः वहाँके निवासी ब्राह्मण वेद-शास्त्रोंके प्रवर्तक हैं। उस देशको अठारह विद्याओंकी निधि बताया गया है। वहाँ भगवान् नारायणकी आज्ञासे घर-घरमें लक्ष्मीका वास है। उस देशके निवासी मनुष्य लज्जाशील, विनयी, चिन्ता तथा रोगसे रहित, पिता-माताके सेवक, सत्यवादी तथा विष्णुभक्त होते हैं। वहाँ कोई भी ऐसा पुरुष नहीं होगा, जो विष्णुका भक्त एवं आस्तिक न हो। उस देशके सब लोग परोपकारी होते हैं। लोभी, दुष्ट और शठ मनुष्योंका वहाँ सर्वथा अभाव है। उस प्रदेशके लोग दीर्घजीवी होते हैं। स्त्रियाँ पतिव्रता, सुशीला, धर्मपरायणा, लज्जा और सदाचारसे विभूषित, रूपवती, सब प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत तथा कुल, शील और वयके अनुसार आचार-विचारका पालन करनेवाली होती हैं।

वहाँके क्षत्रिय भी अपने कर्तव्यका पालन करते हैं। वे सब-के-सब प्रजाकी रक्षाके व्रतमें दीक्षित होते हैं। दान देनेमें उदार और सब शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण होते हैं। सदा अधिक दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं। उनकी यज्ञवेदियाँ सदा प्रज्वलित रहती हैं तथा सुवर्णभूषित यूप शोभा पाते रहते हैं। उनके घरपर पधारे हुए अतिथियोंको उनकी कामनासे अधिक वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया जाता है। उत्कलके वैश्य भी कृषि, वाणिज्य और गोरक्षाकी वृत्तिमें स्थित होते हैं। वे अपनी भक्ति और धनसे देवता, गुरु और ब्राह्मणोंको तृप्त करते हैं। वहाँ एकके घरपर पधारे हुए याचकको दूसरेके घरपर जानेकी आवश्यकता नहीं रह जाती। उस देशके शूद्र संगीत, काव्य, कला और शिल्पमें कुशल तथा प्रिय वचन बोलनेवाले होते हैं। धार्मिक एवं स्नान-दानादि कर्मोंमें तत्पर होते हैं। वे अपने मन, वाणी, क्रिया तथा धनके द्वारा द्विजोंकी सेवामें लगे रहते हैं। वहाँ वर्णसंकरजातिके लोग भी अपने-अपने धर्ममें स्थित होते हैं। ऋतुएँ विपरीतभाव नहीं धारण करतीं। मेघ असमयमें वर्षा नहीं करते। खेतीको हानि नहीं पहुँचती। हवाका भी कष्ट नहीं होता तथा प्रजाको भूखकी पीड़ा नहीं सहन करनी पड़ती। अकाल और महामारीका प्रकोप नहीं होता। राज्यका नाश नहीं होता। पृथिवीपर होनेवाली कोई भी वस्तु वहाँ अलभ्य नहीं है। यही वह सब देशोंमें श्रेष्ठ उत्कल है। दक्षिण समुद्रमें मिलनेवाली ऋषिकुल्या नदीतक पहुँचकर स्वर्णरेखा और महानदीके बीचमें जो देश प्रतिष्ठित है, वही उत्कल है। इस पवित्र प्रान्तमें बहुत-से उत्तम क्षेत्र हैं।

सत्ययुगमें इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं। उनका जन्म सूर्यवंशमें हुआ था। वे ब्रह्माजीसे पाँचवीं पीढ़ी नीचे थे। राजा इन्द्रद्युम्न सत्यवादी, सदाचारी, शुद्ध तथा सात्त्विक पुरुषोंमें अग्रगण्य थे। प्रजाको अपनी सन्तान समझकर सदा न्यायपूर्वक उसका पालन करते थे। वे आध्यात्मिक ज्ञानमें कुशल, शूर, समरविजयी, सदा उद्यमशील, ब्राह्मणपूजक तथा पितृभक्त थे। अठारह विद्याओंमें दूसरे बृहस्पतिके समान प्रवीण थे। ऐश्वर्यमें देवराज इन्द्र तथा कोष-संग्रहमें कुबेरकी समानता करते थे। रूपवान्, सौभाग्यशाली, शीलवान्, दानी, भोगी, प्रिय वक्ता, समस्त यज्ञोंका यजन करनेवाले तथा सत्यप्रतिज्ञ भी थे। उनमें भगवान् विष्णुकी भक्ति थी, सत्यभाषणका गुण था। उन्होंने क्रोध और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली थी। वे श्रेष्ठ राजसूय यज्ञ तथा सहस्रों अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान कर चुके थे। संसारबन्धनसे मुक्त होनेकी इच्छा रखकर सदा धर्माचरणमें ही लगे रहते थे। इस प्रकार वे सर्वगुणसम्पन्न राजा इन्द्रद्युम्न समूची पृथिवीका पालन करते हुए मालव देशमें विख्यात