भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 360
  • वैष्णवखण्ड-उत्कलखण्ड * | ३३१ ---|---

गलेमें विचित्र वनमाला थी। उन्होंने दिव्य नीलवस्त्र पहन रखा था। उनकी पीठ नीची और छाती ऊँची थी। वे सम्पूर्ण शरीरको कुण्डलित करके बैठे थे। उनके चारों हाथोंमें भी शंख, चक्र, गदा और पद्म शोभायमान थे। अनेक प्रकारके अलंकार धारण करनेसे वे और भी सुन्दर प्रतीत होते थे। भगवान् बलभद्र प्रणाम करनेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाले हैं। इन दोनोंके मध्यभागमें कुंकुमके समान लाल वर्णवाली कल्याणमयी सुभद्रादेवी विराजमान थीं, जो सम्पूर्ण लावण्यका निवासस्थान जान पड़ती थीं। समस्त देवता उनके चरणोंमें मस्तक झुकाते थे। उन्होंने अपने हाथोंमें कमल धारण कर रखा था। वे दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थीं। सुभद्रा भी शरणागतोंके लिये कल्पवृक्ष हैं। समस्त पापोंका नाश करनेवाली हैं तथा संसार-समुद्रमें डुबे हुए मनुष्योंको पार उतारनेवाली और देवताओंको भी तारनेवाली हैं। भगवान् पुरुषोत्तमके वामभागमें उत्तम चक्र प्रकाशित होता था। श्रेष्ठ काष्ठसे निर्मित तथा स्वर्णके संयोगसे परम उज्ज्वल चार स्वरूपोंमें स्थित भगवान् पुरुषोत्तमका प्रातःकालका दर्शन करके उन ब्राह्मण और क्षत्रियकुमारोंने अपने परिश्रमको सार्थक माना और पूर्वोक्त स्वप्नलीलाका स्मरण करके वे बड़े विस्मयको प्राप्त हुए और सोचने लगे 'यह काष्ठकी प्रतिमा नहीं, यहाँ तो साक्षात् ब्रह्म प्रकाशमान | हैं।' उस समय उन्होंने यज्ञसभामें आये हुए ब्राह्मणोंकी बातपर पूर्ण विश्वास किया और आपसमें कहा— 'कहाँ हम दोनों महापातकी क्रमशः यमयातना भोगनेके अधिकारी और कहाँ देवताओंसे सेवित भगवान् विष्णुका दर्शन! हम तो निरे मूर्ख थे। इस समय अठारह विद्याओंमें प्रवीण हो गये हैं। इसलिये यह भ्रम नहीं, वास्तविक ज्ञान है। यथार्थवादी ब्राह्मणोंने जो कहा था कि तीर्थराज समुद्रके तटपर साक्षात् ब्रह्म विराजमान हैं और वटवृक्षकी जड़में ये सदा प्रकाशमान होते हैं। उनके दर्शनसे सब प्राणी मुक्त हो जाते हैं, उन सब बातोंका आज प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। ये वही भगवान् जगन्नाथ हैं, जो चार स्वरूपोंमें स्थित हुए हैं। पृथ्वीपर जब ये अवतार लेते हैं, तब चार रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। अब हम दोनों जबतक प्राण धारण करेंगे, इन्हींके समीप रहेंगे। क्षुद्र कामनाओंसे मुँह मोड़कर अन्यत्र जानेका नाम भी न लेंगे।'<br><br>ऐसा निश्चय करके वे दोनों भगवान् विष्णुके भजनमें तत्पर हो गये। सदा नारायणका नाम जपते हुए उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। यह पापनाशक चरित्र अत्यन्त गोपनीय है। इस तीर्थके प्रसंगसे मैंने इसका वर्णन किया है। जो मनुष्य पुण्डरीक और अम्बरीषके इस चरित्रको सुनते और कहते हैं, वे परम आनन्दके साथ भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होते हैं।


## उत्कल देशके भव्य रूपका परिचय, राजा इन्द्रद्युम्नका एक तीर्थयात्रीसे पुरुषोत्तमक्षेत्रकी महिमा सुनकर पुरोहितके भाईको वहाँ भेजना और उनका नीलाचलके समीप शबरसे वार्तालाप

**मुनियोंने पूछा—** द्विजश्रेष्ठ! जहाँ काष्ठप्रतिमाके रूपमें साक्षात् भगवान् नारायण विराजमान हैं, वह पुरुषोत्तमक्षेत्र किस देशमें है? | **जैमिनिजीने उत्तर दिया—** उत्कल (उड़ीसा) नामसे प्रसिद्ध एक परम पावन देश है, जहाँ अनेक तीर्थ और बहुत-से पवित्र देवमन्दिर हैं।
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