संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हुए भी इसके विस्तारमें सहायक हैं। जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज—इन चार प्रकारके प्राणियोंसे भरे हुए जगत्के आप ही आश्रय हैं। आपको नमस्कार है। जिनके चरणोंसे प्रकट हुई गंगा तीनों लोकोंको पवित्र करती है, जिनका नाम ब्रह्महत्या आदि पापोंकी निश्चित शुद्धि करनेवाला है तथा कीर्तन करनेपर सबको कल्याण प्रदान करता है, उन कल्याणस्वरूप आप परमात्माको नमस्कार है। देव! केवल आपके नामकीर्तनसे भी सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। बुद्धिशाली विद्वान् पुरुष कौतूहलपूर्वक आपकी खोज करते हैं। नाथ! आपके चरणकमलोंके जल (चरणोदक)-का आश्रय लेनेपर वह सन्तापको हर लेता है। मैं तीनों तापोंसे पीड़ित हूँ। अपने इन युगल चरणोंमें मेरी भक्ति दृढ़ कर दीजिये। मेरा दूसरा कोई स्वामी नहीं है तथा मेरे माँगने योग्य दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है। जगन्नाथ! मैं आपके चरणोंमें सहस्रों बार प्रणाम करके यह याचना करता हूँ कि जबतक मैं प्राण धारण करूँ तबतक आपके इन युगल चरणकमलोंमें ही मेरी दृढ़ भक्ति बनी रहे। आपके ये चरण ही समस्त पुरुषार्थोंके बीज हैं। इन चरणोंकी भक्ति करके ब्रह्माजीने यह सृष्टि की है, रुद्रदेव सबका संहार करते हैं तथा लक्ष्मीजी सबको ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। दीनोंपर दया करनेवाले प्रभो! मैं अनन्यचित्त होकर आपके उन्हीं चरणोंकी भक्ति माँगता हूँ। अनादि अविद्याके इस दुस्तर एवं सुदृढ़ पंकमें डूबकर मैं कोई आश्रय न मिलनेके कारण नष्ट हो रहा हूँ। जगन्नाथ! इससे मेरा उद्धार करनेके लिये आपकी महामहिमामयी भक्तिके सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं है। आपकी भक्तिको छोड़कर कोई भी साधन प्राणियोंका उद्धार करनेमें समर्थ नहीं है। स्वामिन्! आपके अतिरिक्त दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं है। प्रभो! मुझ शरणागतपर कृपा कीजिये।
इस प्रकार स्तुति करते हुए अम्बरीष भगवान् जगन्नाथके चरण-कमलोंके समीप 'प्रभो! प्रसन्न होइये, प्रसन्न होइये' ऐसा बार-बार कहकर दण्डकी भाँति गिर पड़ा। तदनन्तर पुण्डरीक और अम्बरीषने जब पुनः नेत्र खोले तब चर्मचक्षुसे दिव्य सिंहासनपर विराजमान नीलमेघके समान श्यामसुन्दर भगवान् पुरुषोत्तमको देखा। उनके नेत्र खिले हुए कमलके समान विशाल थे। अधर लाल और नासिका मनोहर थी। उनके कानोंमें दिव्य कुण्डल झिलमिला रहे थे। भगवान्ने अपने चारों हाथोंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण कर रखे थे। वे वनमालासे विभूषित थे। उनका वक्षःस्थल ऊँचा दिखायी देता था। कण्ठमें परम सुन्दर हार शोभा पा रहे थे। मस्तकपर बहुमूल्य मुकुट प्रकाशमान था। वक्षमें श्रीवत्सका चिह्न और कौस्तुभमणि शोभा दे रहे थे। भुजाओंमें उन्होंने दिव्य अंगद (भुजबंद) धारण कर रखे थे। उनकी विशाल भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। वे दीनों और दुखियोंकी रक्षाके लिये सदैव उद्यत प्रतीत होते थे। उनकी कटिमें दिव्य पीताम्बर शोभा पाता था। उसके ऊपर सोनेकी करधनी बँधी हुई थी, जिसकी बिचली गाँठमें मणि पिरोयी गयी थी। भगवान् दिव्य हार और दिव्य चन्दनसे विभूषित थे। वे सुवर्णमय कमलके आसनपर विराजमान थे। उनके सब अंगोंमें अनुपम शोभाका निवास था। वे शरणागतोंका सन्ताप हरनेके लिये महान् सुधासागरके समान प्रतीत होते थे। भलीभाँति खिले हुए कल्पवृक्षके समान वे सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाले थे। उनके दक्षिण भागमें हलमय शस्त्र धारण करनेवाले भगवान् बलभद्र बैठे थे। जिन्होंने अपने महान् बलसे समस्त ब्रह्माण्डका भार धारण किया है, वे बलभद्रजी नागराज शेषके रूपमें शोभा पाते थे। मस्तकपर सात फन उन्हें सुशोभित करते थे। वे कैलाशशिखरके समान ऊँचे और श्वेतवर्ण थे। उनके कानोंमें कुण्डल प्रकाशित हो रहा था।