संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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लगाकर शीघ्र सब समाचार ले आयेगा। इससे हमलोगोंका कल्याण होगा।
पुरोहितकी यह बात सुनकर राजा इन्द्रद्युम्नने कहा—ब्रह्मन्! बहुत अच्छा। अब मैं भगवान् विष्णुके समीप उसी क्षेत्रमें चलकर बसूँगा।
ऐसा कहकर राजाने प्रसन्नतापूर्वक अन्तःपुरमें प्रवेश किया और पुरोहितने उन सब यात्रियोंको यथायोग्य सम्मान देकर अपने-अपने आश्रमको भेजा। फिर अपने भाईको ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर शुभ मुहूर्तमें भेजा। विद्यापति समस्त विश्वसनीय पुरुषोंके साथ पुष्पशोभित रथपर आरूढ़ हो वहाँसे प्रस्थित हुआ। उसने रथमें बैठे-बैठे यह विचार किया कि 'अहो! मेरा जन्म सफल हो गया। मेरी रात्रि मंगलमय प्रभातका दर्शन करानेवाली होगी; क्योंकि मैं भगवान्के उस मुखारविन्दका दर्शन करूँगा, जो समस्त पापोंको दूर करनेवाला है। श्रवण, मनन आदि साधनोंसे निरन्तर प्रयत्न करनेवाले साधक जिन्हें अपने हृदय-कमलके मध्य विराजमान देखते हैं, उन्हीं भगवान् चक्रपाणिको आज मैं नीलाचलके शिखरपर साक्षात् शरीर धारण किये देखूँगा, जो शरीरबन्धनका नाश करनेवाले हैं। श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणके वचनोंद्वारा जिनके स्वरूपका भलीभाँति निरूपण करना असम्भव है, उन्हीं भगवान् लक्ष्मीनधिके अदृष्टपूर्व स्वरूपका दर्शन करके आज मैं भवसागरसे पार हो जाऊँगा। जिनके नामसंकीर्तनमात्रसे उनका स्मरण करनेवाले मनुष्योंके विविध पापोंका संहार हो जाता है, उन्हीं अप्रमेय भगवान् जगन्नाथके नीलगिरिनिवासी स्वरूपका आज मैं प्रत्यक्ष दर्शन करूँगा जिनके रोम-रोममें असंख्य ब्रह्माण्डोंकी मालाएँ हैं, जिनके सहस्रों मस्तक, चरण और नेत्र हैं, जिनकी निःश्वास-वायुसे सम्पूर्ण वेदोंकी राशि प्रकट हुई है तथा जो सब प्रपंचोंके स्वामी हैं, उन पुराणपुरुष भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। अहा! मेरा कैसा भाग्य है कि इन्हीं चर्मचक्षुओंसे मैं जगत्के आदिकारण भगवान् नारायणका दर्शन करूँगा।'
इसी विचारमें पड़े हुए प्रसन्नचित्त ब्राह्मणको रथके वेगसे लाँघे हुए विशाल मार्गका कुछ भी पता न चला। मार्गमें मिले हुए अनेकों वन, पर्वत तथा दुर्गम स्थानोंको देखते हुए वे सूर्यास्तके समय महानदीके तटपर जा पहुँचे। उन्होंने रथसे उतरकर विधिपूर्वक नित्यकर्म किया और सायंसन्ध्या करके भगवान् मधुसूदनका ध्यान किया। तत्पश्चात् रथपर ही बैठे-बैठे रात बितायी। सबेरा होनेपर शीघ्र ही महानदीको पार किया। फिर प्रातःकालिक कृत्य समाप्त करके रथपर आरूढ़ हो गोविन्दका चिन्तन करते हुए ही आगेको प्रस्थान किया। भगवान्के निकट जानेवाले मार्गको देखते हुए वे एकाम्रवनमें पहुँचे। उसके बाद कल्पवटसे विभूषित गगनचुम्बी नीलाचलका शिखर देखा, जो दर्शकोंके पापोंका नाश करनेवाला है। साक्षात् शरीरधारी भगवान् विष्णुके उस अद्भुत निवासस्थानको खोजते हुए विद्यापति नीलाचलकी उपत्यका (तराई)-में जा पहुँचे। अब वे भगवान्के दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये; किंतु आगे बढ़नेका मार्ग नहीं मिला। तब भूमिपर कुशा बिछाकर मौनभावसे लेट गये और भगवद्दर्शनकी सिद्धिके लिये भगवान्के ही शरणागत हो गये। तब पर्वतसे पश्चिम भगवद्भक्तके विषयमें बातचीत करनेवाले लोगोंकी अलौकिक वाणी सुनायी देने लगी। तब वे प्रसन्न होकर उसी शब्दका अनुसरण करते हुए आगे बढ़े। कुछ ही दूरपर विख्यात शबरदीपक नामक आश्रम मिला। वहाँ उन्होंने वैष्णव भक्तोंका दर्शन किया और उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब विश्वावसु नामक शबर भगवान् विष्णुका पूजन समाप्त करके पूजाके प्रसादसे सुशोभित हो पर्वतके बीचसे वहाँ आया। उसे देखकर ब्राह्मणको बड़ा हर्ष हुआ और वे सोचने लगे—ये श्रेष्ठ वैष्णव हैं, इनसे मुझे भगवान् विष्णुके सम्बन्धमें