भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346
  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१७

तदनन्तर त्रिभुवन-विधाता भगवान् जनार्दनका पूजन करके उन्होंने वेदवर्णित पवित्र स्तोत्रोंद्वारा उनका स्तवन किया। स्तुतिके अन्तमें महर्षि अगस्त्य और राजा शंख भगवान्‌के अष्टाक्षर (ॐ नमो नारायणाय) मन्त्रका जप करने लगे।

इस प्रकार जगत्स्वामी श्रीहरिमें चित्त लगाये हुए उन महात्माओंके आगे एक महान् अद्भुत तेज प्रकट हुआ, जो कोटि-कोटि सूर्य-चन्द्रमा और अग्नियोंके तेजपुंज-सा प्रतीत होता था। उस तेजका दर्शन करके सबको बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने उसके भीतर परमानन्दविग्रह दिव्यरूपधारी भगवान् श्रीनारायणका चिन्तन किया, जो मन और वाणीके मार्गसे सर्वथा दूर हैं, अपने विख्यात ऐश्वर्यसे सदा प्रकाशित होते हैं, सहस्र नेत्र, सहस्र भुजा और सहस्र चरणोंसे संयुक्त हैं, तपाये हुए सुवर्णके समान देदीप्यमान कान्तिसे जिनका रूप बड़ा मनोहर लगता है। जो अपने वक्षःस्थलपर लक्ष्मीको धारण करते और कौस्तुभमणिसे सुशोभित होते हैं। जिनका स्वरूप अचिन्त्य है। जो अनादि और अनन्त हैं, समस्त ब्रह्माण्डको अपने-आपमें ही प्रकाशित करते हैं और सर्वत्र व्यापक हैं। उन्हीं भगवान् जगन्नाथको अपने सामने देखकर अगस्त्य और शंख आदि सब मुनियोंके मनमें बड़ा हर्ष हुआ। सबने बार-बार भगवान्‌के चरणोंमें मस्तक झुकाया। उस समय लोकरक्षाके लिये सब ओर भ्रमण करनेवाले भगवान्‌के तेज-बलसम्पन्न आयुध उनकी सेवामें उपस्थित हो गये। सूर्यके समान तेजस्वी चक्र, दिव्य गदा, नन्दक नामक खड्ग, कमल तथा भयानक गर्जना करनेवाला चन्द्रमाके समान कान्तिमान् पांचजन्य शंख—ये सभी उपस्थित हो गये। शंखने अपनी ध्वनिसे समस्त ब्रह्माण्डको परिपूर्ण कर दिया। उस शंखनादको सुनकर वसिष्ठ आदि मुनि, गन्धर्व, नाग, किन्नर, विष्वक्सेन, गरुड़ तथा जय-विजय आदि श्वेतद्वीपनिवासी पार्षद भी आये। देववृक्षोंसे उत्पन्न पारिजात आदि फूलोंकी वहाँ अद्भुत वर्षा होने लगी, जिसकी घनीभूत सुगन्धसे सबका अन्तःकरण आमोदित हो उठा। भक्तवत्सल कमलनयन भगवान् विष्णुको प्रसन्न देखकर सब देवताओं और ऋषियोंने नाना प्रकारके स्तोत्रोंसे साष्टांग प्रणामपूर्वक स्तवन किया।

ब्रह्मा आदि देवता बोले— दयासागर भगवान् विष्णु! आपकी जय हो। कमलनयन! आपकी जय हो। समस्त लोकोंको एकमात्र वर देनेवाले भक्तार्तिभंजन ! आपकी जय हो, जय हो। आप अनन्त हैं, अविनाशी हैं, परम शान्त हैं। मन और वाणीकी आपतक पहुँच नहीं है। आपका स्वरूप विशुद्ध सच्चिदानन्दमय है। आपको सम्यक् रूपसे कौन जानता है? विद्वान् पुरुष आपको सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म, स्थूलसे भी स्थूल, सबके भीतर विराजमान, प्रकृतिसे परे अच्युत पुरुष कहते हैं। वेदान्तका सारभूत ब्रह्म आपका स्वरूप है। आप सबके भीतर और बाहर भी विद्यमान हैं। मायाके अधीन रहनेवाले देहाभिमानी पुरुषोंमेंसे कौन आपका वर्णन करनेमें समर्थ है? आपका यह स्वरूप अत्यन्त भयदायक है, इसे देखकर हम भयसे उद्विग्न हुए जाते हैं; अतः आप शान्तरूप धारण करें।

ब्रह्मा आदि देवताओंके द्वारा इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् गरुडध्वजने उसी क्षण सौम्यरूप धारण कर लिया। उनका मुख चन्द्रमण्डलके समान शोभा पाने लगा। प्रचण्ड तेज शान्त हो गया। श्रीअंगोंकी श्यामकान्ति नील कमलदलके समान सुशोभित हुई। दिव्य शरीरपर सुनहरे रंगका पीताम्बर छवि पा रहा था। भगवान् रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित दिखायी देने लगे। उनके चारों हाथ शंख, चक्र, गदा और पद्मसे शोभायमान थे। भगवान् लक्ष्मीपतिके इस मनोहर रूपको देखकर सबने बार-बार प्रणाम किया। भगवान्‌ने अभीष्ट वरदानसे ब्रह्मा आदि देवताओंको सन्तुष्ट करके मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे कहा— 'मुनीन्द्र! तुमने