संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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मेरे लिये कठोर व्रतोंका अनुष्ठान करके बहुत क्लेश उठाया है। अतः मैं तुम्हें अभीष्ट वरदान दूँगा। बोलो क्या चाहते हो?' भगवान् लक्ष्मीपतिका यह वचन सुनकर अगस्त्यजीके सम्पूर्ण अंगोंमें रोमांच हो आया। वे भगवान्को बार-बार प्रणाम करके बोले—'प्रभो! आपने जो मेरा इतना आदर किया, इसीसे मैंने जो भी हवन किया है, जो भी तप, स्वाध्याय और श्रवण किया है वह सब सफल हो गया। भगवन्! मैं तो आपको ढूँढ़ रहा था और आप मुझे ढूँढ़ते हुए आ गये। आपकी कृपासे मैं सब कुछ पहले ही पा गया हूँ। माधव! इस समय बहुत सोचने-विचारनेपर भी मुझे ऐसी कोई वस्तु नहीं दिखायी देती, जो प्राप्त करने योग्य हो। अतः आपके चरणारविन्दोंमें निरन्तर ऐसी ही भक्ति बनी रहे, यही कृपा कीजिये। सुवर्णमुखरी नदीके जलमें स्नान करके जो लोग वेंकटाचलपर विराजमान आपका दर्शन करें, वे भोग और मोक्षके भी भागी हों। भगवन्! थोड़ी आयुवाले अज्ञानी मनुष्य व्रत, स्वाध्याय और कर्मोंद्वारा आपका दर्शन नहीं कर सकते। अतः आप सबपर कृपा करनेके लिये सदैव उस पर्वतपर निवास कीजिये और सबको मनोवांछित वस्तु देनेवाले होइये।'
श्रीभगवान्ने कहा—ब्रह्मन्! तुमने जो प्रार्थना की है वह सब पूर्ण होगी। आजसे वैकुण्ठ नामवाले इस पर्वतपर मैं सदा निवास करूँगा। सुवर्णमुखरी नदीके जलमें स्नान करके अपने पाप-पंकको धोकर जो लोग एकाग्रचित्तसे इस वैकुण्ठ शैलपर मेरा दर्शन करेंगे, वे पुनरावृत्तिसे रहित तथा केवल परमानन्दसे प्रकाशमान मेरे परम धामको प्राप्त होंगे। जो मनुष्य जिन कामनाओंकी अपेक्षासे यहाँ आकर मेरा दर्शन करेंगे, वे उन-उन कामनाओंको निःसन्देह प्राप्त कर लेंगे।
अगस्त्य मुनिसे ऐसा कहकर भगवान् विष्णुने राजा शंखकी ओर देखा और ब्रह्मा आदिके सुनते हुए कहा—राजन्! मैं तुम्हारी भक्तिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ, तुम कोई मनोवांछित वर माँगो।
शंख बोले—भगवन्! आपके चरण-कमलोंकी सेवाके अतिरिक्त दूसरा मैं कुछ नहीं माँगता। आपके भक्त जिस गतिको पाते हैं, उसी उत्तम गतिके लिये मैं भी याचना करता हूँ।
श्रीभगवान्ने कहा—शंख! तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब उसी रूपमें प्राप्त होगा। मेरी सेवामें लगे रहनेवाले कल्याणमय पुरुषोंके लिये कौन-सी वस्तु दुर्लभ है?
तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवताओंको विदा करके भगवान् कमलनयन विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। अर्जुन! यह वेंकटाचलका प्रभाव तुम्हें बताया गया है। इस पावन कथाको श्रवण करके सब मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। ब्रह्माण्डमें भगवान् वेंकटेश्वरके समान दूसरा कोई देवता न हुआ है न होगा और वेंकटाचलके समान कोई तीर्थस्थान न हुआ है न होगा। स्वामीतीर्थके समान सरोवर अन्यत्र कहीं नहीं है। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर भगवान् वेंकटेश्वरका स्मरण करते हैं, मोक्ष उनके हाथमें है। जो श्रेष्ठ मानव वेंकटाचलका माहात्म्य सुनते हैं, उन्हें इहलोक ओर परलोकमें भोग और मोक्ष प्राप्त होते हैं।
आकाशगंगातीर्थमें अंजनाकी तपस्या और उसे वायुदेवद्वारा वरदानकी प्राप्ति
सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें पुत्ररहित अंजना दुःखी होकर तपस्यामें संलग्न हुई। उसे देखकर मुनियोंमें श्रेष्ठ विष्णुभक्त मतंगजीने कहा—'अंजना देवि! उठो, तुम किस लिये तपस्यामें लगी हो?' अंजनाने कहा—'मुनिश्रेष्ठ! केशरी नामक श्रेष्ठ वानरने मेरे पितासे मेरे लिये याचना की। तब