संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 348, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१९
पिताजीने मुझे उनकी सेवामें समर्पित कर दिया। पतिदेवके साथ सुखपूर्वक विहार करते हुए मुझे बहुत समय व्यतीत हो गया, परंतु अबतक मुझे कोई पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। मैंने किष्किन्धा महापुरीमें अनेक प्रकारके व्रत भी किये तथापि पुत्र न पाकर मुझे दुःख हुआ। अतः अब मैं तपस्यामें तत्पर हुई हूँ। विप्रवर! किस प्रकार मुझे त्रिभुवनमें प्रसिद्ध पुत्र प्राप्त होगा, यह बताइये। मैं आपके आगे मस्तक झुकाकर यही माँगती हूँ।' तब मुनिवर मतंगने अंजनासे कहा—'देवि! सुनो। यहाँसे दक्षिण दिशामें दस योजनकी दूरीपर घनाचल नामसे प्रसिद्ध पर्वत है, जो भगवान् नृसिंहका निवासस्थान है। उसके ऊपर परम मनोहर ब्रह्मतीर्थ है। उसके पूर्वभागमें दस योजन दूर सुवर्णमुखरी नामवाली श्रेष्ठ नदी बहती है। उस नदीके उत्तरभागमें वृषभाचल (वेंकटाचल) नामक पर्वत है और उस पर्वतके शिखरपर स्वामिपुष्करिणी तीर्थ है। वहाँ जाकर उसके शुभ जलका दर्शन करते ही तुम्हारा मन पवित्र हो जायगा। उसमें विधिपूर्वक स्नान करके वाराहस्वामीको प्रणाम करो और भगवान् वेंकटेश्वरको नमस्कार करके स्वामितीर्थके उत्तर जाओ। वहाँ आकाशगंगा नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ शोभा पाता है। उसमें संकल्पपूर्वक विधिवत् स्नान करके उसके शुभ जलको पी लेना। फिर उस तीर्थके सामने खड़ी हो वायुदेवकी प्रसन्नताके उद्देश्यसे तपस्या करना। ऐसा करनेसे तुम्हें देवता, राक्षस, ब्राह्मण, मनुष्य तथा अस्त्र-शस्त्रोंसे भी अवध्य पुत्र प्राप्त होगा।'
मुनिके ऐसा कहनेपर अंजना देवीने उन्हें बार-बार प्रणाम किया और पतिको साथ लेकर वह शीघ्र ही वेंकटाचल पर्वतपर गयी। वहाँ स्वामिपुष्करिणीमें नहाकर उसने वाराह स्वामीको प्रणाम किया और भगवान् वेंकटेश्वरके चरणोंमें भी मस्तक नवाया। तत्पश्चात् वह शीघ्र ही आकाशगंगाके तटपर गयी और उसमें नहाकर उसके उत्तम जलको पीकर उसीके तटपर तीर्थकी ओर मुख करके खड़ी हो प्राणस्वरूप वायुदेवताकी प्रसन्नताके लिये संयम एवं व्रतका पालन करती हुई तपस्या करने लगी। तब सूर्यदेवके मेषराशिपर रहते समय चित्रानक्षत्रयुक्त पूर्णिमा तिथिको परम बुद्धिमान् वायुदेव प्रकट हुए और इस प्रकार बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि! तुम कोई वर माँगो। मैं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा।' उनकी बात सुनकर सती अंजनाने कहा—'महाभाग! मुझे पुत्र प्रदान कीजिये।' वायुदेवताने कहा—'सुमुखि! मैं ही तुम्हारा पुत्र होऊँगा और तुम्हारे नामको विश्वमें विख्यात कर दूँगा।' अंजनाको ऐसा वरदान देकर महाबली वायु वहीं रहने लगे और अंजना देवी भी वह वरदान पाकर अपने पतिके साथ बहुत प्रसन्न हुई।
वेंकटाचल-माहात्म्य (अथवा भूमिवाराहखण्ड) सम्पूर्ण।
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