संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३१५
वेंकटाचलपर राजा शंख और महर्षि अगस्त्य आदिको भगवान्का प्रत्यक्ष दर्शन तथा वरप्राप्ति
अर्जुनने पूछा—मुने! भगवान् श्रीहरि नेत्रोंद्वारा दर्शन और मनद्वारा चिन्तन आदिके विषय नहीं हैं, तो भी वे यहाँ मनुष्योंको प्रत्यक्ष कैसे हुए?
भरद्वाजजीने कहा—अर्जुन! हैहयवंशमें श्रुत नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जिन्होंने पृथ्वी और यहाँकी प्रजाका दीर्घकालतक अपनी सन्तानकी भाँति पालन किया था। उनके पुत्र शंख हुए, जो समस्त गुणोंके निधि और सब शास्त्रोंमें कुशल थे। उन्होंने भी पृथ्वीका न्यायपूर्वक शासन किया। कमलके समान नेत्रोंवाले जगदीश्वर भगवान् विष्णुमें राजा शंखकी निश्चल एवं अनन्य भक्ति थी। उन्होंने दृढ़ निश्चयपूर्वक अद्भुत महिमावाले देवाधिदेव जगत्पति अनन्य पुरुषोत्तमका सदैव ध्यान करते हुए नाना प्रकारके व्रत, दान और पुण्य किये तथा वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य भगवान् मधुसूदनकी प्रीतिके लिये ही अश्वमेध आदि यज्ञोंका अनुष्ठान किया। भक्तवत्सल केशवमें मन लगाकर वे प्रतिदिन गोविन्दका स्मरण, अविनाशी अच्युतका जप, कमलनयन विष्णुका पूजन तथा शार्ङ्ग धनुषधारी श्रीहरिका कीर्तन करते थे। पुराणके विद्वानोंद्वारा कही जानेवाली पवित्र भगवत्कथाओंको, जो संसार-समुद्रसे पार उतारनेवाली हैं, वे सदैव सुना करते थे। भगवत्प्रीतिके लिये ही ब्राह्मणोंकी पूजा-अर्चा करते थे। इस प्रकार सर्वथा अविराम गतिसे श्रीहरिकी आराधनामें संलग्न होनेपर भी राजा शंखने परम स्वतन्त्र भगवान् पुरुषोत्तमका कभी प्रत्यक्ष दर्शन नहीं पाया। भगवान्का दर्शन न पानेसे उनका हृदय शोकसे व्याकुल हो गया, वे बड़ी चिन्ताको प्राप्त हुए।
शंख बोले—मैंने बीते हुए सहस्राधिक जन्मोंमें बहुत बड़ा पाप किया है, जिसके कारण आजतक मुझे भगवान् विष्णुका दर्शन नहीं प्राप्त हुआ। अनेक जन्मोंमें उपार्जित सम्पूर्ण तपस्याओंका यह एक ही अखण्ड फल है कि मधुसूदन भगवान् विष्णुका दर्शन प्राप्त हो। अहो! भगवान् मेरे नेत्रोंके समक्ष कैसे प्रकट होंगे? कानोंसे उनके वचन सुननेका सौभाग्य कैसे प्राप्त होगा?
इस प्रकार चिन्तासे व्याकुल होकर जब राजाके मनमें जीवित रहनेकी अभिलाषा नहीं रह गयी, तब अव्यक्तमूर्ति भगवान् विष्णुने सबके सुनते हुए कहा—'राजन्! तुम शोकके अधीन न होओ। तुम तो एकमात्र मेरी शरणमें आये हुए साधु भक्त हो। मैं तुम्हारा त्याग कैसे कर सकता हूँ। यह वेंकट नामक पर्वत तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। राजन्! यहाँका निवास मुझे वैकुण्ठसे भी अधिक प्रिय है। उस श्रेष्ठ पर्वतपर जाकर भक्तिपूर्वक तपस्या करते रहनेपर मैं तुम्हें प्रत्यक्ष दर्शन दूँगा। तुम्हारी ही तरह महर्षि अगस्त्य भी ब्रह्माजीकी आज्ञासे अंजनाचलके महानिवासमें तपस्या करनेके लिये आवेंगे। उसी पवित्र पर्वतपर निवास करते हुए तुम भी मेरी आराधना करो। इससे मेरा दर्शन प्राप्त कर लोगे।'
भगवान्के इस प्रकार आज्ञा देनेपर राजा शंखको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने मन-ही-मन अपनेको धन्य माना और अपने पुत्र वज्रको प्रजापालनके कार्यमें नियुक्त करके भगवान् विष्णुके दर्शनकी आकाङ्क्षासे नारायणगिरिको प्रस्थान किया। उस पर्वतके ऊँचे शिखरपर पहुँचकर उन्होंने अमृतके समान दिव्य जलसे परिपूर्ण कल्याणमयी स्वामिपुष्करिणी देखी और उसके किनारे कुटी बनाकर स्नान, पान आदिके द्वारा सन्तोष लाभ किया। जगदीश जनार्दनको अपने समस्त कर्म समर्पित करके राजा शंख प्रतिदिन जप और