संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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और दैत्योंका दिन-रात एक-दूसरेके विपरीत है। सूर्यका उत्तरायण देवताओंका दिन और दैत्योंकी रात्रि, इसी प्रकार दक्षिणायन दैत्योंका दिन और देवताओंकी रात्रि है। यह सब क्रमके अनुसार समझना चाहिये। अर्जुन! तैंतालीस लाख बीस हजार वर्षोंका एक महायुग होता है, जिसमें सत्ययुगसे लेकर कलियुगतक सभी युग सम्मिलित हैं। इकहत्तर महायुगोंका एक मन्वन्तर होता है। स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत तथा चाक्षुष—ये छः मनु अपने इन्द्र, देवता और ऋषियोंसहित व्यतीत हो चुके हैं। इस समय सातवें मनु वर्तमान हैं। इनके समयमें आदित्य, वसु तथा रुद्र आदि देवतागण हैं। सौ अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान करके तेजस्वीने इन्द्रपद प्राप्त किया है। विश्वामित्र, मैं (भरद्वाज), अत्रि, जमदग्नि, कश्यप, वसिष्ठ तथा गौतम ये ही सप्तर्षि हैं। वैवस्वत मनुके महाबली शूरवीर पुत्र धर्मपरायण राजा इक्ष्वाकु आदिने इस पृथ्वीका पालन किया है। सूर्य, दक्ष, ब्रह्म, धर्म तथा रुद्र इन पाँचोंके पाँच सावर्णिसंज्ञक पुत्र और रौच्य तथा भौम आदि ये सात भविष्यमें होनेवाले मनु हैं। ये चौदहों मनु ब्रह्माके एक दिनमें पूरे हो जाते हैं। इसीका नाम कल्प है। उसके अन्तमें उसीके समान रात्रि होती है। ब्रह्माके दिनकी समाप्ति होते समय पृथ्वीपर सौ वर्षोंतक बड़ा भयंकर उत्पात होता है। उस उपद्रवके समय पृथ्वी सूखकर रसहीन हो जाती है, जिससे उसपर रहनेवाले चार प्रकारके प्राणी नष्ट हो जाते हैं। तब सूर्यदेव अग्निके समान आगकी ज्वाला उगलती हुई प्रज्वलित लपटोंकी आकारवाली किरणोंसे संयुक्त होते हैं। उनके दुःसह तापसे गाँव, नगर, शैल, वन और वृक्ष आदिके भस्म हो जानेपर कछुएकी पीठकी-सी आकृति धारण करनेवाली यह पृथ्वी तपाये हुए लोहेके पिण्डकी भाँति जान पड़ती है। तब ब्रह्माजीके अंगोंसे महामेघ उत्पन्न होते हैं और घोर गर्जना करते हुए समस्त आकाशको आच्छादित कर लेते हैं। वे सौ वर्षोंतक बड़ी भारी वर्षा करते हैं। उस जलसे सूर्यद्वारा उत्पन्न की हुई प्रचण्ड आग बुझ जाती है। वे महामेघ पुनः सौ वर्षोंतक भयंकर वृष्टि करते हैं। उस वृष्टिके जलसे समुद्र अपनी मर्यादा लाँघकर क्षोभको प्राप्त होते हैं। उस समय पृथ्वी जलमें डूबकर पातालके मूलमें चली जाती है। वह ब्रह्माजीकी शक्तिसे अवलम्बित होनेके कारण किसी प्रकार नष्ट नहीं होती। तदनन्तर ब्रह्माजीके निःश्वाससे वायु प्रकट होती है, जो कल्पान्तमें उत्पन्न हुए समस्त महामेघोंको छिन्न-भिन्न कर देती है। फिर वह वायु भी सौ वर्षोंतक दुर्निवार वेगसे बहती रहती है। तत्पश्चात् उस वायुको भगवान्के नाभिकमलमें छोड़कर भगवान् ब्रह्मा उस जलमें योगनिद्राका आश्रय लेकर सोते हैं। योगनिद्रामें पड़े-पड़े ब्रह्माजीकी उतनी ही बड़ी रात व्यतीत होती है, जितना बड़ा उनका दिन है। रात बीतनेपर ब्रह्माजी उठते हैं और भगवान् विष्णुकी आज्ञासे पूर्ववत् सब जीवोंकी वेगपूर्वक सृष्टि करने लगते हैं। प्रत्येक कल्पमें समुचित रूप धारण करके भगवान् विष्णु जगत्का पालन करते हैं। इस कल्पमें उन्होंने श्वेत वर्णके यज्ञ वाराहका रूप धारण किया और उसी वाराह-शरीरसे भूतलपर विहार करते हुए उन्होंने अपने पूर्व कल्पोंके निश्चित निवासस्थान वेंकटाचल पर्वतपर पदार्पण किया। स्वामिपुष्करिणीके तटपर चिरकालतक विचरण करते हुए वाराहजीने कमलके आसनपर विराजमान भक्तियुक्त ब्रह्माजीको देखा। ब्रह्माजीने भक्तिभावन भगवान्की पूजा करके प्रार्थना की—'प्रभो! अपने पुरातन दिव्य स्वरूपको धारण कीजिये।' ब्रह्माजीकी यह विनय सुनकर भगवान्ने वाराहकी आकृति त्याग दी और अनन्य भावसे भजन करनेयोग्य विश्वमय रूपको ग्रहण कर लिया।
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