संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-भूमिवराहखण्ड * ३०३
पुरुष मानते हैं।* पतिकी बात टालकर जो स्त्री दूसरे-दूसरे पुण्योंमें सदा लगी रहती है, वह भी शुद्ध नहीं होती। वही स्त्री जब पतिकी प्रेरणाके अनुसार चलती, पतिकी बुद्धिके अधीन रहती और पतिके चरणारविन्दोंके पवित्र जलसे अपना अभिषेक करती है, तब भगवान्को प्रिय होती है। इसलिये तुम्हारा किया हुआ दोष ही तुम्हें इस शापके रूपमें प्राप्त हुआ था। उसे यहाँ भोगकर घोणतीर्थका माहात्म्य सुनते-सुनते तुम्हारी उस शापसे मुक्ति हो गयी और पहलेके समान तुम्हें सुन्दर अंगोंवाला नारीरूप पुनः प्राप्त हो गया। इसीलिये विद्वान् पुरुष घोणतीर्थको परम पवित्र मानते हैं। जो मनुष्य सब पापोंका नाश करनेवाले इस इतिहासका श्रवण करता है, वह वाजपेय-यज्ञका फल पाता है और उसे सनातन विष्णुलोककी प्राप्ति होती है।
वेंकटाचलके मुख्य तीर्थोंका वर्णन, पुराण-श्रवणकी महिमा और नियम तथा अर्जुनकी तीर्थयात्रा
ऋषियोंने पूछा—पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजी! इस वेंकटाचलपर उत्तम धर्मविषयक अनुराग प्रदान करनेवाले मुख्य-मुख्य तीर्थ कितने हैं? कौन ज्ञानदायक हैं? कौन भक्ति और वैराग्य देनेवाले हैं? तथा कौन मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं? उन सबका वर्णन कीजिये।
श्रीसूतजी बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शौनक! इस श्रेष्ठ पर्वतपर मुख्य-मुख्य एक सौ आठ तीर्थ ऐसे हैं, जो उत्तम धर्ममें अनुराग प्रदान करनेवाले हैं। इन एक सौ आठ तीर्थोंमें साठ तीर्थ भक्ति और वैराग्य देनेवाले हैं और इस वेंकटाचलके शिखरपर छः तीर्थ मुक्तिदायक माने गये हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—स्वामिपुष्करिणी, आकाशगंगा, पापविनाशन, पाण्डुतीर्थ, कुमारधारिका-तीर्थ और तुम्बुरुतीर्थ। जो मनुष्य इन तीर्थोंके माहात्म्यके साथ भगवान् विष्णुकी भुवनपावनी कथाको सर्वदा श्रवण करते हैं, वे इस लोकमें निश्चय ही भगवान् विष्णुके भक्त होते हैं। सम्पूर्ण भुवनोंको पवित्र करनेवाली श्रीविष्णुकथाको सर्वदा श्रवण करनेमें यदि कोई समर्थ न हो, तो दो घड़ी, एक घड़ी अथवा एक क्षण भी जो भक्तिपूर्वक इसे श्रवण कर लेता है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती। सम्पूर्ण यज्ञों और सब प्रकारके दानोंसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल मनुष्य एक बार पुराणकथाका श्रवण करनेसे प्राप्त कर लेता है। पुराणका श्रवण और भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन—ये दो ही मनुष्यके पुण्यरूपी वृक्षके महान् फल हैं। यदि कोई बड़ा प्रयत्न करके अमृत ही पी ले, तो भी वह अकेला ही अजर-अमर होता है; परंतु भगवान् विष्णुका कथारूप अमृत तो समस्त कुलको ही अजर-अमर बना देता है। पुराणका जाननेवाला विद्वान् बालक, युवा, वृद्ध, दरिद्र अथवा दुर्भाग्ययुक्त ही क्यों न हो, वह पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा सदैव वन्दनीय और पूजनीय होता है। पुराणवेत्ता ब्राह्मण जब कथा कहनेके लिये व्यासासनपर बैठ जाय तब प्रसंगकी समाप्ति होनेतक वह किसीको प्रणाम न करे। जहाँ खोटे मनुष्य रहते हों, जो
* पतिर्माता पतिर्विष्णुः पतिर्ब्रह्मा पतिः शिवः। पतिर्गुरुः पतिस्तीर्थमिति स्त्रीणां विदुर्बुधाः॥
(स्क० पु०, वै० वे० २६। ८३-८४)