भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्यारी पत्नीने क्रोधपूर्वक उत्तर दिया—'आर्यपुत्र! माघके महीनेमें बहुत सर्दी पड़ती है, उस समय प्रातःकाल, जब कि सूर्यका तेज बहुत मन्द रहता है, सूर्योदय-कालमें कोई कैसे स्नान करेगा? माघमें उस समय शीतका अधिक कष्ट रहता है। इसलिये आपके बताये हुए ये सब कार्य मुझसे बार-बार न हो सकेंगे। अतः प्रातःकालमें मैं आपके साथ स्नान नहीं करूँगी। क्योंकि अधिक सर्दी पड़नेसे यदि मेरी मृत्यु हो गयी, तो उस समय आप मेरी रक्षा नहीं करेंगे।'

पत्नीकी यह बात सुनकर तुम्बुरुने सोचा कि 'धर्मविरुद्ध चलनेवाले पुत्रको, अप्रिय वचन बोलनेवाली पत्नीको तथा ब्राह्मण एवं ईश्वरको न माननेवाले राजाको तत्काल शापके द्वारा दण्ड देना चाहिये।' इस नीतिके वचनका विचार करके गन्धर्वने अपनी सती पत्नीको इस प्रकार शाप दिया—'ओ मूढ़े! सौ पातकोंका नाश करनेवाले परम पुण्यमय वेंकटाचलपर घोणतीर्थके समीप जो पीपलका वृक्ष है, उसके खोखलेमें तू मेढकी हो जा।' पतिदेवकी यह बात सुनकर वह गन्धर्ववल्लभा उनके चरणोंमें गिर पड़ी और प्रार्थना करने लगी। तब तुम्बुरुने उसे शापसे मुक्त होनेकी यह अवधि बतलायी कि अपनी इन्द्रियोंपर विजय पानेवाले परम तपस्वी महाभाग अगस्त्य मुनि जब महातिथि पूर्णिमाको परम उत्तम घोणतीर्थमें जाकर स्नान करेंगे और उसी पीपल वृक्षके समीप बैठकर शिष्योंको घोणतीर्थका माहात्म्य बतलावेंगे, उस समय पीपलके खोखलेमें ही एकाग्रचित्त होकर जब तुम मोक्षदायक घोणतीर्थका माहात्म्य सुनोगी, तब समस्त पापोंका नाश करके मेरे साथ आ मिलोगी।

गन्धर्वके ऐसा कहनेपर उसकी धर्मपत्नी चुप हो गयी। स्वामीके शापसे उसने मेढकके शरीरमें प्रवेश किया और धीरे-धीरे शेषाचलके शिखरपर घोणतीर्थके दक्षिण उस पीपल-वृक्षके खोखलेमें जाकर रहने लगी। तदनन्तर किसी समय अगस्त्यजी मनोहर वेंकटाचलपर गये। वहाँ उन्होंने नियमपूर्वक स्वामितीर्थमें स्नान करके वाराहस्वामीको नमस्कार किया। तत्पश्चात् उस तीर्थके दक्षिण वेंकटेशजीके मन्दिरमें जाकर वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य विशाल नेत्रवाले सनातन देवदेव दयानिधान श्रीनिवासजीको मस्तक झुकाया। उसके बाद वे घोणतीर्थमें गये और वहाँ शिष्योंके साथ उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके उसी पीपल वृक्षकी छायामें जा बैठे। उस समय उन्होंने शिष्योंसे भक्तिपूर्वक घोणतीर्थका पवित्र माहात्म्य वर्णन किया, जो ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला तथा सम्पूर्ण मंगलों और समस्त सम्पदाओंको देनेवाला है। उस माहात्म्यको सुनकर वह मेढकी पूर्ववत् गन्धर्वपत्नीके मनोहर स्वरूपको प्राप्त होकर योगी अगस्त्यके चरणोंमें गिर पड़ी और बोली—'योगियोंमें श्रेष्ठ दयानिधान अगस्त्यजी! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। ब्रह्मन्! मैं पतिके वचनोंका विरोध करनेवाली स्त्री हूँ, दया करके मेरी रक्षा कीजिये।'

अगस्त्यजी बोले—देवि! तुम्हारे पतिकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है। उन्होंने जो रोषमें आकर तुम्हें शाप दिया है, वह पतिके वचनोंका विरोध करनेवाली तुम-जैसी स्त्रीके लिये उचित ही है। जो स्त्री पतिके वचनोंकी अवहेलना करके अपनी इच्छाके अनुसार बर्ताव करती है, वह जबतक चन्द्रमा और तारे रहते हैं तबतक घोर नरकमें निवास करती है। स्त्रियोंके लिये स्वतन्त्रता उचित नहीं है, उन्हें पतिकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। स्त्रियाँ पतिकी सेवा तथा पातिव्रत्यरूपी पुण्यसे ही भगवान् विष्णुके परमधाममें जाती हैं। स्त्रियोंके लिये पति ही माता है, पति ही विष्णु है, पति ही ब्रह्मा है, पति ही शिव है, पति ही गुरु है तथा पति ही तीर्थ है, ऐसा विद्वान्