संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३०१
पीड़ित पद्मनाभकी रक्षाके लिये चक्रको भेजा। इस प्रकार चक्रने आकर उस राक्षसका मस्तक काट डाला। तब वह राक्षस शरीर छोड़कर दिव्य देह धारण करके विमानपर जा बैठा। उस समय उसके ऊपर फूलोंकी वर्षा हो रही थी। उसने हाथ जोड़कर सुदर्शनको प्रणाम किया। फिर उन द्विजश्रेष्ठ पद्मनाभको भी प्रणाम करके उनकी आज्ञा लेकर सुन्दर गन्धर्व स्वर्गको चला गया।
ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने उस राक्षसकी उत्पत्तिका वृत्तान्त और चक्रतीर्थका पापनाशक माहात्म्य आपलोगोंसे बतलाया। इसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
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घोणतीर्थका माहात्म्य—गन्धर्वपत्नीका उद्धार
ब्राह्मणो! अब घोणतीर्थका माहात्म्य सुनो! महापापोंमें तत्पर, चाण्डालकुलमें सबसे नीच, क्रूर, कुलका नाश करनेवाला, कष्टकारक, दानशून्य, सत्कर्मरहित, पशुघाती, परद्रोही, चुगलखोर, असत्यवादी, पाखण्डी, मित्रद्रोही, कृतघ्न, भ्रूणहत्या करनेवाला, परस्त्रीगामी, स्वामीसे द्रोह करनेवाला, ठग, लोभी, पितृघाती, देवताओंसे विमुख, आत्मप्रशंसा करनेवाला, शठ, अयोग्य पात्रके लिये व्यय करनेवाला, धर्ममें बाधा डालनेवाला, अनुकूलतामें अन्तर डालनेवाला, फल-फूल और पल्लवोंसे युक्त वृक्षको काटनेवाला, विश्वासघाती, वीर-हत्यापरायण, अग्निहोत्रका त्याग करनेवाला, विषका प्रयोग करनेवाला, गुरुद्वेषी, पति-पत्नीमें वैमनस्य उत्पन्न करनेवाला, गाँवका अगुआ, देवमन्दिरका अध्यक्ष, वेतन लेकर पढ़ानेवाला, कठोर कर्म करनेवाला, पापोंमें स्वभावतः रत रहनेवाला, गुप्त पाप करनेवाला, अनजानमें या जान-बूझकर दुष्कर्म करनेवाला—इन सभी प्रकारके पापियोंको परम मनोहर घोणतीर्थ अपनेमें स्नान और जलपान आदि करनेपर पवित्र कर देता है।
इस विषयमें मैं एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें महातेजस्वी गार्ग्य मुनिने महात्मा देवलको नमस्कार करके कहा—'महाभाग! आप घोणतीर्थके सर्वपापहारी शुभ माहात्म्यका वर्णन कीजिये।'
देवलने कहा—मुने! तुम्बुरु नामक गन्धर्व अपनी पतिव्रता पत्नीको शाप देकर इस तीर्थमें स्नान करके दयानिधान वेंकटेश्वरकी पूजा करनेसे पुनरावृत्तिरहित विष्णुधामको प्राप्त हो गया था। वह वृत्तान्त इस प्रकार है। एक दिन तुम्बुरु नामक गन्धर्वने अपनी प्यारी पत्नीसे इस प्रकार कहा—'देवि! सब पातकोंका नाश करनेवाले माघमासमें सूर्योदयके समय इस तटपर भगवान् विष्णुकी पूजा करनी है, इसलिये गोबरसे इस भूमिको लीप दो और इस माघमें प्रतिदिन माधवके लिये दीप-बत्ती बनाओ। भगवान्के आगे भक्तिपूर्वक धूप समर्पित करो, पवित्र होकर भगवान्के लिये रसोई तैयार करो और मेरे साथ-साथ रहकर परिक्रमा तथा नमस्कार आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक भगवान्की पूजा करो। नित्यप्रति आलस्य छोड़कर भगवान् विष्णुकी पुराण-कथा सुनो। नित्य सबेरे स्नान करके यत्नपूर्वक श्रीहरिका चरणोदक पान करो। कृष्ण, विष्णु, मुकुन्द, नारायण, जनार्दन, अच्युत, अनन्त और विश्वात्मन् इत्यादि भगवन्नामोंका सदा कीर्तन किया करो और क्रोध, मात्सर्य तथा लोभ आदिका परित्याग करके व्रत-नियमका पालन करो। इससे तुम्हें भवबन्धनसे छुटकारा मिलेगा और सनातन विष्णुधामकी प्राप्ति होगी।'
स्वामीका ऐसा कथन सुनकर गन्धर्वकी उस