संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे चक्रतीर्थके माहात्म्यका वर्णन किया। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस अध्यायको पढ़ता या सुनता है उसे चक्रतीर्थमें स्नान करनेका उत्तम फल प्राप्त होता है।
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सुन्दर गन्धर्वका वसिष्ठजीके शापसे राक्षसभावको प्राप्त होकर पुनः उससे मुक्त होना
ऋषियोंने पूछा— सूतजी! वह राक्षस कौन था जिसने भगवान् विष्णुके भक्त महात्मा ब्राह्मणको कष्ट पहुँचाया?
सूतजी बोले— ब्राह्मणो! पूर्वकालकी बात है। श्रीरंगक्षेत्रमें जो वैकुण्ठके सदृश भगवान् विष्णुका विशाल मन्दिर है, उसमें वसिष्ठ और अत्रि आदि महातेजस्वी मोक्षके लिये वैष्णव भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले देवेश्वर श्रीविष्णुभगवान्की उपासना करते थे। एक दिन वीरबाहुका बलवान् पुत्र सुन्दर नामवाला गन्धर्व सैकड़ों स्त्रियोंके साथ उस क्षेत्रमें आया और एक जलाशयमें नग्न होकर नग्न हुई युवतियोंके साथ आनन्दपूर्वक जल-विहार करने लगा। उसी समय मध्याह्न-सन्ध्या करनेके लिये मुनिवर वसिष्ठ अन्य महर्षियोंके साथ श्रीरंग-मन्दिरसे बाहर निकले और उस जलाशयपर गये। उन ऋषियोंको देखकर वे सभी रमणियाँ भयसे कातर हो अपने-अपने कपड़े ओढ़कर बैठ गयीं; परंतु साहसी सुन्दर ज्यों-का-त्यों खड़ा रहा। यह देख वसिष्ठ मुनिने कुपित होकर उस निर्लज्जको शाप दिया—'सुन्दर गन्धर्व! तूने हमलोगोंको देखकर भी लज्जावश वस्त्र धारण नहीं किया, इसलिये तू शीघ्र राक्षस हो जा।'
महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर उसकी स्त्रियाँ हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें गिर पड़ीं और भक्तिभावसे विनीतचित्त होकर बोलीं—'भगवन्! आप सब धर्मोंके ज्ञाता हैं, साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र हैं। दयासिन्धो! पति ही नारियोंका उत्तम भूषण कहलाता है। पतिहीन नारी सौ पुत्रोंवाली होकर भी संसारमें विधवा ही कहलाती है। ऐसी नारियोंका जन्म व्यर्थ समझा जाता है। अतः मुने! हमारे पतिके ऊपर आप प्रसन्न हों। तत्त्वदर्शी मुनियोंको एक अपराध क्षमा कर देना चाहिये। दयासिन्धो! सुन्दर आपका शिष्य है, इसे क्षमा करें।'
सुन्दरकी स्त्रियोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वसिष्ठजीने कहा—'सुन्दरियो! मेरा वचन कभी व्यर्थ नहीं होगा, इससे छूटनेका उपाय बतलाता हूँ, उसे श्रद्धापूर्वक सुनो। यह राक्षसके समान आकारवाला सुन्दर आजसे सोलह वर्षोंके बाद इच्छानुसार घूमता-घामता सर्वपापहारी वेंकटाचलपर पहुँच जायगा और वहाँ चक्रतीर्थपर जायगा। देवांगनाओ! चक्रतीर्थपर महायोगी मुनिवर पद्मनाभजी रहते हैं। उन्हें खा जानेके लिये जब यह आक्रमण करेगा, तब ब्राह्मणकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुका भेजा हुआ उत्तम चक्र इसका मस्तक काट डालेगा। तदनन्तर शापसे मुक्त होकर यह तुम्हारा पति सुन्दर अपने स्वरूपको प्राप्त होकर पुनः स्वर्गलोकमें चला जायगा।'
श्रीरंगनाथमें भक्ति करनेवाले वसिष्ठजी ऐसा कहकर शीघ्र ही अपने आश्रमको चले गये। तदनन्तर राक्षसरूपमें परिणत हुआ भयानक आकारवाला सुन्दर इधर-उधर घूमता हुआ गिरिश्रेष्ठ वेंकटाचलपर गया और चक्रतीर्थपर भी जा पहुँचा। इस भ्रमणमें ही उसके सोलह वर्ष पूरे हो गये थे। तदनन्तर चक्रतीर्थनिवासी पद्मनाभको खा जानेके लिये उसने बड़े वेगसे आक्रमण किया। मुनिने भगवान् विष्णुकी स्तुति की और भगवान्ने राक्षसद्वारा