भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328
  • वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २९९

रक्षा कीजिये, हे वेंकटेश ! हे दयासिन्धो ! हे शरणागतपालक ! हे पुरुषसिंह ! मैं राक्षसके वशमें आ गया हूँ। मेरी रक्षा कीजिये। हे लक्ष्मीकान्त ! हे दुःखहारी हरि ! हे विष्णुदेव ! हे वैकुण्ठनाथ ! हे गरुड़ध्वज ! आपने ग्राहके चंगुलमें फँसे हुए गजराजकी जिस प्रकार रक्षा की थी उसी प्रकार राक्षसके आक्रमणसे दबे हुए मुझ भक्तकी रक्षा कीजिये। हे दामोदर ! हे जगन्नाथ ! हे हिरण्यकशिपु दैत्यका मर्दन करनेवाले नृसिंह ! प्रह्लादजीकी भाँति मैं भी राक्षसके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हूँ; अतः उन्हींके समान आप मेरी भी रक्षा कीजिये।'

पद्मनाभके इस प्रकार स्तुति करनेपर अपने भक्तके ऊपर भय आया हुआ जानकर दयानिधान चक्रपाणिने भक्तकी रक्षाके लिये अपने चक्रको भेजा। भगवान्‌का वह चक्र बड़े वेगसे चक्रतीर्थके तटपर आया। वह अनन्त सूर्यके समान तेजस्वी तथा अनन्त अग्निके समान ज्वालामालाओंसे प्रज्वलित था। उससे बड़े जोरकी गड़गड़ाहट हो रही थी। बड़े-बड़े असुरोंका संहार करनेवाले उस सुदर्शन चक्रको देखकर राक्षस भागा, परंतु सुदर्शनने सहसा पास पहुँचकर उसका मस्तक काट डाला। राक्षसको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देख विप्रवर पद्मनाभ मुनि अत्यन्त प्रसन्न हो सुदर्शन चक्रकी स्तुति करने लगे।

पद्मनाभ बोले—सम्पूर्ण विश्वके संरक्षणकी दीक्षा लेनेवाले विष्णुचक्र ! आपको नमस्कार है। आप भगवान् नारायणके करकमलको विभूषित करनेवाले हैं। आप युद्धमें असुरोंका संहार करनेमें कुशल हैं। अतिशय गर्जना करनेवाले सुदर्शन ! आप भक्तोंकी पीड़ाका विनाश करते हैं। आपको नमस्कार है। मैं भयसे उद्विग्न हूँ। आप सब प्रकारके पाप-तापसे मेरी रक्षा कीजिये। स्वामिन् ! सुदर्शन ! प्रभो ! संकटसे छुटकारा चाहनेवाले सम्पूर्ण जगत्‌का हित करनेके लिये आप सदा इस चक्रतीर्थमें निवास करें।

पद्मनाभ ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुके चक्रने अपने स्नेहसे उन्हें तृप्त-से करते हुए कहा—'पद्मनाभ ! यह चक्रतीर्थ अत्यन्त उत्तम और परम पवित्र है। मैं सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये सदा इस तीर्थमें निवास करूँगा। आपके ऊपर दुरात्मा राक्षसके द्वारा आये हुए संकटका विचार करके भगवान् विष्णुसे प्रेरित होकर मैं शीघ्र यहाँ आ पहुँचा। आपको पीड़ा देनेवाले उस अधम राक्षसको मैंने मार डाला और आपकी उसके भयसे रक्षा की; क्योंकि आप भगवान्‌के भक्त हैं। विप्रवर ! सब पापोंका हरण करनेवाले इस परम पवित्र चक्रतीर्थमें सब लोगोंकी रक्षाके लिये मैं सदा निवास करूँगा। मेरे निवास करनेसे यह तीर्थ चक्रतीर्थके नामसे प्रसिद्ध होगा और जो मनुष्य इस मोक्षदायक चक्रतीर्थमें स्नान करेंगे, उन सबके पुत्र, पौत्र आदि वंशज, निष्पाप होकर भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होंगे।' यों कहकर भगवान् विष्णुके चक्रने पद्मनाभ मुनि तथा अन्य ब्राह्मणोंके देखते-देखते सहसा उस चक्र-सरोवरमें प्रवेश किया। शौनकादि महर्षियो !