संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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रहा हो, जिसके हाथोंमें समिधा और फूल हो, जिसने जलपात्र ले रखा हो तथा जो भोजन करता हो, ऐसे व्यक्तिको प्रणाम न करे। जो कलहप्रिय, अत्यन्त क्रोधी, दमन करनेवाला, जनसमुदायके मध्यमें स्थित, भिक्षान्नधारी तथा सोया हुआ हो, उसको भी प्रणाम न करे। रजस्वला, व्यभिचारिणी, सूतिका, गर्भपात करनेवाली, व्रत नाश करनेवाली तथा अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई स्त्रीको कभी प्रणाम न करे। जो श्राद्धके नियममें नियुक्त हो, देवताओंकी पूजा कर रहा हो अथवा यज्ञ एवं तर्पण कर रहा हो— ऐसे पुरुषको भी प्रणाम न करे। यदि श्राद्धके लिये कोई सुपात्र ब्राह्मण न मिले तो केवल सूत कातकर (जनेऊ आदि बनाकर) जीविका चलानेवाले सदाचारी एवं पुत्रवान् ब्राह्मणको श्राद्धके लिये निमन्त्रित करे। यदि वह भी न मिले, तो पुत्रको या छोटे भाईको अथवा अपनेको ही श्राद्धमें नियुक्त करे। पुत्रहीन ब्राह्मणको किसी प्रकार भी श्राद्धके लिये नियुक्त न करे।
पूर्वकालमें श्रीवत्स गोत्रमें उत्पन्न पद्मनाभ नामक एक जितेन्द्रिय ब्राह्मण था। वह दयालु, उपवासशील, सत्यवादी, सब प्राणियोंको अपने ही समान देखनेवाला तथा विषयकामनासे रहित था। सब भूतोंका हितैषी, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला तथा सब प्रकारसे द्वन्द्वोंसे रहित था। कितने ही वर्षतक वह सूखे पत्ते चबाकर रहा, कुछ कालतक केवल जल पीता रहा, फिर कई वर्षतक उसने केवल वायुका आहार किया। इस प्रकार महामुनि पद्मनाभने बारह वर्षोतक कठोर तपस्या की।
तदनन्तर भगवान् लक्ष्मीपतिने पद्मनाभकी तपस्यासे सन्तुष्ट हो उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। श्रीहरिने अपने हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदिको धारण किया था। उनके नेत्र खिले हुए कमलदलकी भाँति शोभा पा रहे थे और श्रीअंगोंकी कान्ति कोटि-कोटि सूर्यको भी लज्जित कर रही थी। पद्मनाभने आँख खोलकर शंख-चक्रधारी, शान्तस्वरूप, करुणासागर वेंकटनाथ भगवान् श्रीनिवासका दर्शन किया। उन्हें देखकर मुनिने इस प्रकार स्तुति प्रारम्भ की—
‘शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् वेंकटेश्वरको नमस्कार है। नारायणगिरिपर निवास करनेवाले आप श्रीनिवासजीको नमस्कार है। पापोंका नाश करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। शेषाचलनिवासी आप भगवान् श्रीनिवासको नमस्कार है। जो तीनों लोकोंके स्वामी, विश्वरूप, सबके साक्षी तथा शिव और ब्रह्मा आदिके लिये भी वन्दनीय हैं, जिनके नेत्र कमलके समान हैं, जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं तथा जो दुष्ट राक्षसोंका संहार करते हैं, उन भगवान् श्रीनिवासको नमस्कार है। जो भक्तोंके प्रियतम, दिव्य स्वरूप, देवताओंके स्वामी तथा शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं, जो योगियोंके पालक, वेदवेद्य तथा भक्तोंके पापोंका संहार करनेवाले हैं, उन श्रीनिवास भगवान् विष्णुको नमस्कार है।’
चक्रतीर्थनिवासी पद्मनाभ मुनिके द्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर परम ऐश्वर्यशाली, विश्वरूप, दयानिधान वेंकटनाथ भगवान् श्रीनिवासजी बहुत सन्तुष्ट हुए और बोले—‘महाभाग! तुम मेरे चरणारविन्दोंके पूजक हो। द्विजश्रेष्ठ! इस चक्रतीर्थतटपर मेरी पूजा करते हुए तुम एक कल्प निवास करो।’ ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। तबसे परम बुद्धिमान् पद्मनाभ मुनि चक्रतीर्थके किनारे निवास करने लगे। कुछ कालके पश्चात् वहाँ एक भयंकर राक्षस आया। वह क्रूर क्षुधासे पीड़ित होकर नारायणपरायण पद्मनाभ मुनिको अपना ग्रास बनाना चाहता था। उसने बड़े वेगसे ब्राह्मणको पकड़ लिया। तब उन्होंने शरणागतोंके रक्षक दयासागर चक्रपाणि श्रीनारायणको पुकारा और बार-बार ऐसा कहा—‘प्रभो! रक्षा कीजिये,