संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २९७
हैं। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा दूसरेको पीड़ा नहीं देते और जिनमें संग्रह करनेका स्वभाव नहीं है तथा उत्तम कथा श्रवण करनेमें जिनकी सात्त्विक बुद्धि संलग्न रहती है तथा जो मेरे चरणारविन्दोंके भक्त हैं, जो उत्तम मानव माता-पिताकी सेवा करते हैं, देवपूजामें तत्पर रहते हैं, जो भगवत्पूजनके कार्यमें सहायक होते हैं और पूजा होती देखकर मनमें आनन्द मानते हैं, वे भगवद्भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। जो ब्रह्मचारियों और संन्यासियोंकी सेवा करते हैं तथा दूसरोंकी निन्दा कभी नहीं करते हैं, जो श्रेष्ठ मनुष्य सबके लिये हितकारक वचन बोलते हैं और जो लोकमें सद्गुणोंके ग्राहक हैं, वे उत्तम भगवद्भक्त हैं। जो सब प्राणियोंको अपने समान देखते हैं तथा शत्रु और मित्रमें समभाव रखते हैं, जो धर्मशास्त्रके वक्ता तथा सत्यवादी हैं और जो ऐसे पुरुषोंकी सेवामें रहते हैं, वे सभी उत्तम भगवद्भक्त हैं। दूसरोंका अभ्युदय देखकर जो प्रसन्न होते हैं तथा भगवन्नामोंका कीर्तन करते रहते हैं, जो भगवान्के नामोंका अभिनन्दन करते, उन्हें सुनकर अत्यन्त हर्षमें भर जाते और सम्पूर्ण अंगोंमें रोमांचित हो उठते हैं, जो अपने आश्रमोचित आचारके पालनमें तत्पर, अतिथियोंके पूजक तथा वेदार्थके वक्ता हैं, वे उत्तम वैष्णव हैं। जो अपने पढ़े हुए शास्त्रोंको दूसरोंके लिये बतलाते हैं और सर्वत्र गुणोंको ग्रहण करनेवाले हैं, जो एकादशीका व्रत करते, मेरे लिये सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते रहते, मुझमें मन लगाते, मेरा भजन करते, मेरे भजनके लिये लालायित रहते तथा सदा मेरे नामोंके स्मरणमें तत्पर होते हैं, वे उत्तम भगवद्भक्त हैं। सद्गुणोंकी ओर जिनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, वे सभी श्रेष्ठ भक्त हैं।
o
दान-पात्र-विचार, चक्रतीर्थकी महिमा, पद्मनाभकी तपस्या, भगवान्का वरदान तथा राक्षसके आक्रमणसे चक्रद्वारा पद्मनाभकी रक्षा
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! दान किसको देना चाहिये? दानका समय कौन-सा है?
सूतजी बोले—द्विजवरो! नपुंसक, पुत्रहीन, पाखण्डी, वेदवेत्ताओं तथा ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले और अपने वर्णाश्रमोचित कर्मका त्याग करनेवाले पुरुषको दिया हुआ दान निष्फल होता है। जो परायी स्त्रियोंमें आसक्त है, दूसरोंके धनका जिसके मनमें बड़ा लोभ है तथा जो गीत गानेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल होता है। जिसके मनमें असूया (दोषदर्शन)-का भाव भरा है, जो कृतघ्न और मायावी है, जिसमें ज्ञानका अभाव है, जो सदा भीख माँगनेवाला है, हिंसक है, जो नाम-विक्रय, वेद-विक्रय, स्मृति-विक्रय तथा धर्म-विक्रय करनेवाला है और दूसरोंको सताना ही जिसका स्वभाव बन गया है; ऐसे ब्राह्मणको दिया हुआ दान भी निष्फल होता है। जो कोई भी पापमें संलग्न रहनेवाले हैं, उनसे न तो कुछ लेना चाहिये और न उन्हें कुछ देना ही चाहिये। उत्तम कर्ममें तत्पर श्रोत्रिय, अग्निहोत्री, जीविकाहीन, दरिद्र तथा कुटुम्बी ब्राह्मणको दान देना चाहिये। जो देवताओंकी पूजामें लगा रहनेवाला और पुराणोंकी कथा बाँचनेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको, उनमें भी प्रायः जो दरिद्र हो उसे, दान देना उचित है। पाखण्डी, पतित, संस्कारभ्रष्ट, वेद बेचनेवाले, कृतघ्न तथा पापपरायण ब्राह्मणको कभी प्रणाम न करे। जो स्नान कर