भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 325
२९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सब ओरसे घेरकर खड़े थे। वीणा, वेणु और मृदंग आदि बाजे बजानेवाले नारद आदिके द्वारा उनकी महिमाका गान हो रहा था। भगवान्‌का ऐश्वर्य परम उत्तम रूपसे प्रकट हो रहा था। वे पीताम्बरसे शोभायमान थे। उनके वक्षःस्थलमें लक्ष्मीका निवास था। श्याम मेघके समान उनकी कान्ति थी। दोनों पार्श्वभागमें खड़े हुए सनक आदि महायोगी भगवान्‌की सेवामें लगे थे। अपनी मन्द-मन्द मुसकानसे तीनों लोकोंको मोहते और अंगोंकी दिव्य प्रभासे दसों दिशाओंको सम्मानित एवं प्रकाशित करते हुए भक्तसुलभ दयानिधान भगवान् वेंकटेश्वर महामुनि रामानुजके समीप उपस्थित हुए। उन्होंने अपनी चारों बाहोंसे मुनिको पकड़कर हृदयसे लगा लिया और प्रेमपूर्वक कहा—‘महामुने! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने जो नमस्कार किया है, उससे मेरा प्रेम और बढ़ गया है। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ।’

रामानुज बोले— नारायण! रमानाथ! श्रीनिवास! जगन्मय! जनार्दन! जगद्धाम! गोविन्द! नरकान्तक! वेंकटाचलशिरोमणे! मैं आपके दर्शनसे ही कृतार्थ हो गया। धर्मनिष्ठ पुरुष आपको नमस्कार करते हैं; क्योंकि आप धर्मके रक्षक हैं। जिन्हें महादेवजी और ब्रह्माजी भी नहीं जानते, तीनों वेदोंको भी जिनका ज्ञान नहीं हो पाता, उन्हीं आप परमात्माको आज मैं जान पाया हूँ। इससे अधिक और कौन-सा वरदान हो सकता है? जिन्हें योगी नहीं देख पाते, केवल कर्मकाण्डीलोग जिनकी झाँकी नहीं कर पाते, उन्हीं आप परमात्माका आज मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हो रहा है। इससे बढ़कर और क्या हो सकता है? सम्पूर्ण जगत्के स्वामी वेंकटेश्वर! मैं इतनेसे ही कृतार्थ हूँ। जिनके नामका स्मरण करनेमात्रसे बड़े-बड़े पातकी मनुष्य भी मुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं, उन्हीं भगवान् जनार्दनका आज मैं प्रत्यक्ष दर्शन करता हूँ। प्रभो! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे।

श्रीभगवान्‌ने कहा— महामते रामानुज! मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति हो। ब्रह्मन्! मेरी कही हुई दूसरी बात भी सुनो। जब सूर्य मेषराशिपर जाते हैं, उस समय चित्रा नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा होनेपर जो लोग आकाशगंगामें स्नान करते हैं, वे पुनरावृत्ति-रहित परमधामको प्राप्त होते हैं। रामानुज! तुम आकाशगंगाके समीप ही निवास करो। प्रारब्धकर्मके अनुसार प्राप्त हुए इस शरीरका अन्त होनेपर तुम्हें मेरे स्वरूपकी प्राप्ति होगी। इस विषयमें बहुत कहनेकी क्या आवश्यकता है। आकाशगंगाके शुभ जलमें जो कोई भी स्नान करते हैं, वे सभी उत्तम भगवद्भक्त हो जाते हैं।

रामानुजने पूछा— भगवन्! भगवद्भक्तोंके लक्षण क्या हैं? किस कर्मसे उनकी पहचान होती है? मैं इस विषयको सुनना चाहता हूँ।

भगवान् वेंकटेश बोले— मुनिश्रेष्ठ! तुम भगवद्भक्तोंके लक्षण सुनो। जो समस्त प्राणियोंके हितैषी हैं, जिनमें दूसरोंके दोष देखनेका स्वभाव नहीं है, जो किसीसे भी डाह नहीं रखते और ज्ञानी, निःस्पृह तथा शान्तचित्त हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त