भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 324
* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड *२९५

भगवान्‌को नमस्कार है। अविनाशी लक्ष्मीपतिको नमस्कार है। जिनके अनन्त तेजकी सूर्य आदिसे भी तुलना नहीं हो सकती, उन भगवान्‌को नमस्कार है तथा जो पुण्य-कर्मपरायण पुरुषोंको स्वतः प्राप्त होते हैं, उन कृपालु श्रीहरिको बार-बार नमस्कार है। सूर्य और चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं, जो सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाले हैं, यज्ञांगोंसे जिनकी शोभा होती है तथा जो साधु पुरुषोंके परम प्रिय हैं, उन भगवान् श्रीनिवासको बार-बार नमस्कार है। जो कारणके भी कारण, शब्दादि विषयोंसे रहित, अभीष्ट सुख देनेवाले तथा भक्तोंके हृदयमें रमण करनेवाले हैं, उन भक्तवत्सल भगवान्‌को नमस्कार है। अद्भुत कारणरूप आपको नमस्कार है, नमस्कार है। मन्दराचल पर्वत धारण करनेवाले कच्छपरूपधारी आपको नमस्कार है। यज्ञवाराहरूपमें प्रकट होनेवाले आपको नमस्कार है। हिरण्याक्षको विदीर्ण करनेवाले आपको नमस्कार है। वामनरूपधारी आपको नमस्कार है। क्षत्रियकुलका अन्त करनेवाले परशुरामरूपमें आपको नमस्कार है। रावणका मर्दन करनेवाले श्रीरामरूपधारी आपको नमस्कार है तथा नन्दनन्दन श्रीकृष्णके बड़े भाई बलरामरूपमें आपको नमस्कार है। कमलाकान्त! आपको नमस्कार है। सबको सुख देनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन्! आप शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। आपको बारंबार नमस्कार है।'

ब्राह्मण भद्रमतिके इस प्रकार स्तुति करनेपर भक्तवत्सल दयानिधान भगवान् श्रीनिवासने वात्सल्यपूर्वक कहा—'तात! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे इस महास्तोत्रसे मैं सन्तुष्ट हूँ। ब्रह्मन्! तुम इस संसारमें पुत्र-पौत्र आदिके साथ सब भोगोंसे सम्पन्न होकर सुख भोगनेके पश्चात् अन्तमें मोक्ष प्राप्त करोगे।' ऐसा कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने पापनाशन तीर्थकी महिमा और उसके तटपर भूमिदानकी महत्ताका भी वर्णन किया।

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आकाशगंगातीर्थकी महिमा—रामानुजपर भगवान्‌की कृपा तथा भगवद्भक्तोंका लक्षण

श्रीसूतजी कहते हैं— तपोधनो! रामानुज नामसे प्रसिद्ध एक जितेन्द्रिय विष्णुभक्त ब्राह्मण थे। धर्मात्मा रामानुजने वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित होकर आकाशगंगातीर्थके समीप तपस्या की। गरमीमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए वे पंचाग्निके मध्यमें स्थित रहते थे, वर्षांमें खुले आकाशके नीचे बैठकर मुखसे अष्टाक्षर (ॐ नमो नारायणाय) मन्त्रका जप और हृदयमें भगवान् जनार्दनका ध्यान करते थे तथा जाड़ेमें जलके भीतर निवास करते थे। वे समस्त प्राणियोंके हितैषी, जितेन्द्रिय तथा सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे दूर रहनेवाले थे। उन्होंने कितने ही वर्षोंतक सूखे पत्ते खाकर निर्वाह किया, कुछ कालतक जलका ही आहार किया और कुछ वर्षोंतक वे केवल वायु पीकर रहे। तदनन्तर उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर भक्तवत्सल भगवान् विष्णुने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। भगवान्‌के हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि शोभा पा रहे थे। उनके नेत्र विकसित कमलके दलोंकी भाँति सुन्दर थे, श्रीअंगोंकी दिव्य प्रभा कोटि-कोटि सूर्यके समान थी। वे विनतानन्दन गरुड़पर आरूढ़ हो छत्र और चमरसे सुशोभित थे। हार, भुजबन्द, मुकुट और कड़े आदि आभूषण उनके अंगोंकी शोभा बढ़ाते थे। विष्वक्सेन और सुनन्द आदि पार्षद भगवान्‌को

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