संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
| भद्रमतिकी पूजा करके पाँच हाथ पृथिवी उन्हें दे दी। उस भूमिदानके पुण्यसे सुघोष भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त हुआ, जहाँ जाकर कोई भी शोक नहीं करता। तदनन्तर भद्रमति अपने पुत्रों और स्त्रियोंके साथ देव-दानववन्दित वेंकटाचलपर गये। वहाँ स्वामिपुष्करिणीके परम पवित्र निर्मल जलमें उन्होंने स्त्रियों और पुत्रोंके साथ संकल्पपूर्वक स्नान किया। तत्पश्चात् उसके पश्चिम तटपर पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् श्वेतवाराहको नमस्कार करके वे भगवान् श्रीनिवासके मन्दिरमें गये। वहाँ ब्रह्मा आदि देवताओंसे सेवित कृपानिधान श्रीनिवासका अपने पुत्र आदिके साथ दर्शन किया और भगवान्को प्रणाम करके पत्नी और पुत्रसहित पापनाशन तीर्थमें आये। फिर वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके धर्म आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान किया और किसी श्रोत्रिय विष्णुभक्त पुरुषको विष्णुबुद्धिसे मोक्षदायक भूमिदान (जो सुघोषसे ली थी वह) दिया। उस दानके प्रभावसे शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले वनमाला-विभूषित भगवान् विष्णु गरुड़पर चढ़े हुए पापनाशन तीर्थके तटपर प्रकट हुए। उस समय शान्त स्वभाववाले भद्रमतिने भगवान्की इस प्रकार स्तुति आरम्भ की— | नमः पयोराशिनिवासकाय<br>नमोऽस्तु लक्ष्मीपतयेऽव्ययाय।<br>नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय<br>नमो नमः पुण्यगतागताय।<br>नमो नमोऽर्केन्दुविलोचनाय<br>नमोऽस्तु ते यज्ञफलप्रदाय।<br>नमोऽस्तु यज्ञाङ्गविराजिताय<br>नमोऽस्तु ते सज्जनवल्लभाय॥<br>नमो नमः कारणकारणाय<br>नमोऽस्तु शब्दादिविवर्जिताय।<br>नमोऽस्तु तेऽभीष्टसुखप्रदाय<br>नमो नमो भक्तमनोरमाय॥<br>नमो नमस्तेऽद्भुतकारणाय<br>नमोऽस्तु ते मन्दरधारकाय।<br>नमोऽस्तु ते यज्ञवराहनाम्ने<br>नमो हिरण्याक्षविदारकाय॥<br>नमोऽस्तु ते वामनरूपभाजे<br>नमोऽस्तु ते क्षत्रकुलान्तकाय।<br>नमोऽस्तु ते रावणमर्दनाय<br>नमोऽस्तु ते नन्दसुताग्रजाय॥<br>नमस्ते कमलाकान्त नमस्ते सुखदायिने।<br>श्रितार्तिनाशिने तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः॥ |
| नमो नमस्तेऽखिलकारणाय<br> नमो नमस्तेऽखिलपालकाय।<br>नमो नमस्तेऽमरनायकाय<br> नमो नमो दैत्यविमर्दनाय॥<br>नमो नमो भक्तजनप्रियाय<br> नमो नमः पापविदारणाय।<br>नमो नमो दुर्जननाशकाय<br> नमोऽस्तु तस्मै जगदीश्वराय॥<br>नमो नमः कारणवामनाय<br> नारायणायामितविक्रमाय।<br>श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय<br> नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ | 'सबके कारणरूप आप भगवान्को नमस्कार है, नमस्कार है। सबको पालन करनेवाले आपको नमस्कार है, नमस्कार है। समस्त देवताओंके स्वामी आपको नमस्कार है, नमस्कार है। दैत्योंका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है, नमस्कार है। जो भक्तजनोंके प्रियतम, पापोंके नाशक तथा दुष्टोंके संहारक हैं, उन जगदीश्वरको बार-बार नमस्कार है। जिन्होंने किसी विशेष हेतुसे वामनरूप धारण किया, जो नारस्वरूप जलमें निवास करनेके कारण नारायण कहलाते हैं, जिनके विक्रमकी कोई सीमा नहीं है तथा जो शंख, चक्र, खड्ग और गदा धारण करते हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमको बार-बार नमस्कार है। क्षीरसिन्धुमें निवास करनेवाले |