संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 322, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २९३
यह सम्पूर्ण जगत् दासके तुल्य है।* अहो! दरिद्रता महान् दुःख है, महान् दुःख है, महान् दुःख है। उसमें भी पुत्र और स्त्रियोंका अधिक होना तो और भी दुःखदायी है।'
ऐसा उद्गार प्रकट करके सब शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें पारंगत विद्वान् भद्रमति मन-ही-मन ऐसे धर्मका विचार करने लगे, जो अत्यन्त ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला हो। उस समय उनकी स्त्रियोंमें जो कामिनी नामवाली पतिव्रता पत्नी थी, उसने अपने पतिदेवसे कहा—'भगवन्! मेरे प्राणनाथ! मेरी एक बात सुनिये। ऋषि-मुनियोंसे सेवित सुवर्णमुखरी नदीके तटपर देवताओंके निवास करनेयोग्य परम पवित्र वेंकट पर्वत है। उसके शिखरपर सब पापोंका नाश करनेवाला पावन तीर्थ है। महामते! आप पत्नी और पुत्रोंके साथ वहाँ चलकर पापनाशन तीर्थमें स्नान कीजिये। मैंने बचपनमें अपने पिताके समीप नारदजीके मुखसे उस तीर्थका माहात्म्य इस प्रकार सुना था कि 'सब पापोंका नाश करनेवाले परम पवित्र वेंकटाचलपर पापनाशन नामक एक महान् तीर्थ है, जो समस्त दुःखोंका निवारण तथा सब प्रकारकी सम्पदाओंका दान करनेवाला है। उसमें संकल्पपूर्वक स्नान करके अधिक ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले धर्मका मन-ही-मन चिन्तन करना चाहिये। सब दानोंमें उत्तम भूमिदान है। वह परलोकमें उत्तम फलकी प्राप्ति करानेवाला तथा समस्त मनोवांछित कामनाओंको देनेवाला है। भूमिदान देकर मनुष्य अपनी सभी अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है।' नारदजीकी यह बात सुनकर मेरे पिता बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शेषाचलपर जाकर पापनाशन तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् एक श्रोत्रिय ब्राह्मणको भूमिदान दिया, जो समस्त ऐश्वर्योंको देनेवाला है। उससे मेरे पिता इस संसारमें सब प्रकारसे सौभाग्यशाली हुए और अन्तमें भगवान् विष्णुके परमधाममें गये। महाभाग! आप भी गिरिश्रेष्ठ वेंकटाचलपर चलकर सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला भूमिदान कीजिये। अग्निहोत्री श्रोत्रिय ब्राह्मणको थोड़ी-सी भी भूमिका दान करके मनुष्य पुनरावृत्तिरहित ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। वेंकटाचल पर्वतपर किया हुआ भूमिदान सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो ईख, गेहूँ, धान और सुपारी आदि वृक्षोंसे युक्त पृथ्वीका दान करता है, वह साक्षात् विष्णुके समान है। जीविकाहीन कुटुम्बी एवं दरिद्र ब्राह्मणको थोड़ी भी भूमि देकर मनुष्य भगवान् विष्णुके सायुज्यको प्राप्त होता है।'
अपनी पत्नीकी बात सुनकर और शेषाचलनिवासी भगवान् विष्णुका ध्यान करके भद्रमति ब्राह्मण बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने अपनी बुद्धिसे परम उत्तम क्रीडाचल पर्वतपर जानेका निश्चय किया। वे पूर्णतः धर्मपरायण थे, अपनी स्त्रीके साथ सुशाली नामवाली नगरीमें गये और सब ऐश्वर्योंसे सम्पन्न विप्रवर सुघोषसे उन्होंने पाँच हाथ भूमि माँगी। सुघोष भी बड़े धर्मात्मा थे। उन्होंने प्रसन्नचित्तवाले इन कुटुम्बी ब्राह्मणको देखकर इनका विधिपूर्वक पूजन किया और इस प्रकार कहा—'भद्रमते! मैं कृतार्थ हो गया, आज मेरा जन्म सफल हुआ।' यों कहकर सुघोषने—
पृथिवी वैष्णवी पुण्या पृथिवी विष्णुपालिता ।
पृथिव्यास्तु प्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
'पृथिवी भगवान् विष्णुकी प्रिया है, पवित्र पृथिवी भगवान् विष्णुद्वारा सुरक्षित है, पृथिवीके दानसे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों।'
—इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक विष्णुबुद्धिसे
* आशाया ये दासा दासास्ते सर्वलोकस्य । आशा दासी येषां तेषां दासायते लोकः ॥
(स्क० पु०, वै० वे० २० । १८)