संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रीनिवासका भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, उसकी समानता इस भूतलपर चारों वेदोंका विद्वान् भी नहीं कर सकता। सम्पूर्ण वेद भगवान् श्रीनिवासका ही प्रतिपादन करते हैं। सब यज्ञ श्रीनिवासकी ही आराधनाके साधन हैं तथा सब लोग भगवान् श्रीनिवासके ही आश्रित हैं। अन्य सबका आश्रय छोड़कर भगवान् श्रीनिवासकी ही शरण लेनी चाहिये। वेंकटाचलनिवासी भगवान् श्रीहरिका दो घड़ी चिन्तन करनेवाला मनुष्य भी अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके विष्णुलोकमें सम्मानित होता है। इस प्रकार यह वेंकटेश्वरका माहात्म्य बताया गया। जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिपूर्वक इसको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भगवान् वेंकटनाथकी सेवाका फल पाता है।
पापनाशन तीर्थकी महिमा — भद्रमति ब्राह्मणका चरित्र
वेंकटाचलपर चढ़नेके पूर्व उस पुण्यवर्द्धक पर्वतकी इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये— हे स्वर्णाचल! हे महापुण्यमय! सर्वदेवसेवित गिरिश्रेष्ठ! ब्रह्मा आदि देवता भी जिनकी श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं, उन्हीं आपके ऊपर मैं अपने दोनों पैरोंसे चलूँगा। मुझ पापचेता पुरुषके इस पापको आज आप कृपापूर्वक क्षमा करें। आपके शिखरपर निवास करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिका आप मुझे दर्शन कराइये। इस प्रकार पर्वतश्रेष्ठ वेंकटाचलकी प्रार्थना करके मनुष्य उसपर धीरे-धीरे चले। ऊपर पहुँचकर सब पापोंका नाश करनेवाले परम पुण्यमय स्वामिपुष्करिणी तीर्थमें नियमपूर्वक स्नान करे। तत्पश्चात् पितरोंको पिण्डदान करे। ऐसा करनेसे स्वर्गवासी पितर मोक्षको प्राप्त होते हैं और नरकवासी पितर स्वर्गमें चले जाते हैं।
तदनन्तर उस पर्वतके ऊपर जो सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ और पवित्र पापविनाशन नामक तीर्थ है, जिसके स्मरणमात्रसे मनुष्य फिर गर्भमें नहीं आता, उसके पास जाकर उसमें स्नान करना चाहिये। वह स्वामितीर्थसे उत्तर दिशामें है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य वैकुण्ठधाममें जाते हैं।
पूर्वकालमें भद्रमति नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, जो वेद-वेदांगोंके पारंगत पण्डित थे, परंतु वे बड़े दरिद्र थे। उनके पास जीविकाका कोई साधन नहीं था। उन बुद्धिमान् ब्राह्मणने सम्पूर्ण शास्त्र, पुराण और धर्मशास्त्रोंका श्रवण किया था। उनके छः स्त्रियाँ थीं। कृता, सिन्धु, यशोवती, कामिनी, मालिनी और शोभा—ये उनके नाम थे। उनके गर्भसे ब्राह्मणने दो सौ पुत्र उत्पन्न किये थे। वे सभी पुत्र आदि भूखसे पीड़ित हो रहे थे। अपने प्यारे पुत्रों और प्रियतमा पत्नियोंको क्षुधासे व्याकुल देखकर दरिद्र भद्रमति विलाप करने लगा—'हाय! भाग्यहीन जन्मको धिक्कार है, धन और कीर्तिसे रहित जीवनको धिक्कार है। उस जन्मको भी धिक्कार है, जिसमें धनाभावके कारण अतिथियोंका सत्कार न हो पाता हो। ज्ञान और सदाचारसे शून्य जीवनको भी धिक्कार है और बहुत सन्तानोंवाले मनुष्यके धनहीन जन्मको भी धिक्कार है। ब्राह्मण, पुत्र, पौत्र, भाई, बन्धु और शिष्य आदि सभी मनुष्य धनहीन पुरुषको त्याग देते हैं। जो धनवान् है, वह निर्दयी हो या दयावान्, गुणहीन हो या गुणवान्, मूर्ख हो या पण्डित तथा सब धर्मोंसे युक्त हो या धर्महीन, यदि वह ऐश्वर्यके गुणसे युक्त है, तो पूजने ही योग्य होता है। अहो! दरिद्रता बड़ा भारी दुःख है, उसमें भी आशा तो अत्यन्त दुःखदायिनी होती है। आशाके वशीभूत हुए मनुष्य क्षण-क्षणमें दुःख भोगते हैं। जो आशाके दास हैं, वे समस्त संसारके दास हैं और जिन्होंने आशाको अपनी दासी बना लिया है उनके लिये