संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रीनिवासका भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, उसकी समानता इस भूतलपर चारों वेदोंका विद्वान् भी नहीं कर सकता। सम्पूर्ण वेद भगवान् श्रीनिवासका ही प्रतिपादन करते हैं। सब यज्ञ श्रीनिवासकी ही आराधनाके साधन हैं तथा सब लोग भगवान् श्रीनिवासके ही आश्रित हैं। अन्य सबका आश्रय छोड़कर भगवान् श्रीनिवासकी ही शरण लेनी चाहिये। वेंकटाचलनिवासी भगवान् श्रीहरिका दो घड़ी चिन्तन करनेवाला मनुष्य भी अपनी इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके विष्णुलोकमें सम्मानित होता है। इस प्रकार यह वेंकटेश्वरका माहात्म्य बताया गया। जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिपूर्वक इसको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भगवान् वेंकटनाथकी सेवाका फल पाता है।
पापनाशन तीर्थकी महिमा — भद्रमति ब्राह्मणका चरित्र
वेंकटाचलपर चढ़नेके पूर्व उस पुण्यवर्द्धक पर्वतकी इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये— हे स्वर्णाचल! हे महापुण्यमय! सर्वदेवसेवित गिरिश्रेष्ठ! ब्रह्मा आदि देवता भी जिनकी श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं, उन्हीं आपके ऊपर मैं अपने दोनों पैरोंसे चलूँगा। मुझ पापचेता पुरुषके इस पापको आज आप कृपापूर्वक क्षमा करें। आपके शिखरपर निवास करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिका आप मुझे दर्शन कराइये। इस प्रकार पर्वतश्रेष्ठ वेंकटाचलकी प्रार्थना करके मनुष्य उसपर धीरे-धीरे चले। ऊपर पहुँचकर सब पापोंका नाश करनेवाले परम पुण्यमय स्वामिपुष्करिणी तीर्थमें नियमपूर्वक स्नान करे। तत्पश्चात् पितरोंको पिण्डदान करे। ऐसा करनेसे स्वर्गवासी पितर मोक्षको प्राप्त होते हैं और नरकवासी पितर स्वर्गमें चले जाते हैं।
तदनन्तर उस पर्वतके ऊपर जो सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ और पवित्र पापविनाशन नामक तीर्थ है, जिसके स्मरणमात्रसे मनुष्य फिर गर्भमें नहीं आता, उसके पास जाकर उसमें स्नान करना चाहिये। वह स्वामितीर्थसे उत्तर दिशामें है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य वैकुण्ठधाममें जाते हैं।
पूर्वकालमें भद्रमति नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, जो वेद-वेदांगोंके पारंगत पण्डित थे, परंतु वे बड़े दरिद्र थे। उनके पास जीविकाका कोई साधन नहीं था। उन बुद्धिमान् ब्राह्मणने सम्पूर्ण शास्त्र, पुराण और धर्मशास्त्रोंका श्रवण किया था। उनके छः स्त्रियाँ थीं। कृता, सिन्धु, यशोवती, कामिनी, मालिनी और शोभा—ये उनके नाम थे। उनके गर्भसे ब्राह्मणने दो सौ पुत्र उत्पन्न किये थे। वे सभी पुत्र आदि भूखसे पीड़ित हो रहे थे। अपने प्यारे पुत्रों और प्रियतमा पत्नियोंको क्षुधासे व्याकुल देखकर दरिद्र भद्रमति विलाप करने लगा—'हाय! भाग्यहीन जन्मको धिक्कार है, धन और कीर्तिसे रहित जीवनको धिक्कार है। उस जन्मको भी धिक्कार है, जिसमें धनाभावके कारण अतिथियोंका सत्कार न हो पाता हो। ज्ञान और सदाचारसे शून्य जीवनको भी धिक्कार है और बहुत सन्तानोंवाले मनुष्यके धनहीन जन्मको भी धिक्कार है। ब्राह्मण, पुत्र, पौत्र, भाई, बन्धु और शिष्य आदि सभी मनुष्य धनहीन पुरुषको त्याग देते हैं। जो धनवान् है, वह निर्दयी हो या दयावान्, गुणहीन हो या गुणवान्, मूर्ख हो या पण्डित तथा सब धर्मोंसे युक्त हो या धर्महीन, यदि वह ऐश्वर्यके गुणसे युक्त है, तो पूजने ही योग्य होता है। अहो! दरिद्रता बड़ा भारी दुःख है, उसमें भी आशा तो अत्यन्त दुःखदायिनी होती है। आशाके वशीभूत हुए मनुष्य क्षण-क्षणमें दुःख भोगते हैं। जो आशाके दास हैं, वे समस्त संसारके दास हैं और जिन्होंने आशाको अपनी दासी बना लिया है उनके लिये
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २९३
यह सम्पूर्ण जगत् दासके तुल्य है।* अहो! दरिद्रता महान् दुःख है, महान् दुःख है, महान् दुःख है। उसमें भी पुत्र और स्त्रियोंका अधिक होना तो और भी दुःखदायी है।'
ऐसा उद्गार प्रकट करके सब शास्त्रोंके अर्थज्ञानमें पारंगत विद्वान् भद्रमति मन-ही-मन ऐसे धर्मका विचार करने लगे, जो अत्यन्त ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला हो। उस समय उनकी स्त्रियोंमें जो कामिनी नामवाली पतिव्रता पत्नी थी, उसने अपने पतिदेवसे कहा—'भगवन्! मेरे प्राणनाथ! मेरी एक बात सुनिये। ऋषि-मुनियोंसे सेवित सुवर्णमुखरी नदीके तटपर देवताओंके निवास करनेयोग्य परम पवित्र वेंकट पर्वत है। उसके शिखरपर सब पापोंका नाश करनेवाला पावन तीर्थ है। महामते! आप पत्नी और पुत्रोंके साथ वहाँ चलकर पापनाशन तीर्थमें स्नान कीजिये। मैंने बचपनमें अपने पिताके समीप नारदजीके मुखसे उस तीर्थका माहात्म्य इस प्रकार सुना था कि 'सब पापोंका नाश करनेवाले परम पवित्र वेंकटाचलपर पापनाशन नामक एक महान् तीर्थ है, जो समस्त दुःखोंका निवारण तथा सब प्रकारकी सम्पदाओंका दान करनेवाला है। उसमें संकल्पपूर्वक स्नान करके अधिक ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले धर्मका मन-ही-मन चिन्तन करना चाहिये। सब दानोंमें उत्तम भूमिदान है। वह परलोकमें उत्तम फलकी प्राप्ति करानेवाला तथा समस्त मनोवांछित कामनाओंको देनेवाला है। भूमिदान देकर मनुष्य अपनी सभी अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेता है।' नारदजीकी यह बात सुनकर मेरे पिता बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शेषाचलपर जाकर पापनाशन तीर्थमें स्नान करनेके पश्चात् एक श्रोत्रिय ब्राह्मणको भूमिदान दिया, जो समस्त ऐश्वर्योंको देनेवाला है। उससे मेरे पिता इस संसारमें सब प्रकारसे सौभाग्यशाली हुए और अन्तमें भगवान् विष्णुके परमधाममें गये। महाभाग! आप भी गिरिश्रेष्ठ वेंकटाचलपर चलकर सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला भूमिदान कीजिये। अग्निहोत्री श्रोत्रिय ब्राह्मणको थोड़ी-सी भी भूमिका दान करके मनुष्य पुनरावृत्तिरहित ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। वेंकटाचल पर्वतपर किया हुआ भूमिदान सब पापोंका नाश करनेवाला है। जो ईख, गेहूँ, धान और सुपारी आदि वृक्षोंसे युक्त पृथ्वीका दान करता है, वह साक्षात् विष्णुके समान है। जीविकाहीन कुटुम्बी एवं दरिद्र ब्राह्मणको थोड़ी भी भूमि देकर मनुष्य भगवान् विष्णुके सायुज्यको प्राप्त होता है।'
अपनी पत्नीकी बात सुनकर और शेषाचलनिवासी भगवान् विष्णुका ध्यान करके भद्रमति ब्राह्मण बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने अपनी बुद्धिसे परम उत्तम क्रीडाचल पर्वतपर जानेका निश्चय किया। वे पूर्णतः धर्मपरायण थे, अपनी स्त्रीके साथ सुशाली नामवाली नगरीमें गये और सब ऐश्वर्योंसे सम्पन्न विप्रवर सुघोषसे उन्होंने पाँच हाथ भूमि माँगी। सुघोष भी बड़े धर्मात्मा थे। उन्होंने प्रसन्नचित्तवाले इन कुटुम्बी ब्राह्मणको देखकर इनका विधिपूर्वक पूजन किया और इस प्रकार कहा—'भद्रमते! मैं कृतार्थ हो गया, आज मेरा जन्म सफल हुआ।' यों कहकर सुघोषने—
पृथिवी वैष्णवी पुण्या पृथिवी विष्णुपालिता ।
पृथिव्यास्तु प्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः ॥
'पृथिवी भगवान् विष्णुकी प्रिया है, पवित्र पृथिवी भगवान् विष्णुद्वारा सुरक्षित है, पृथिवीके दानसे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों।'
—इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक विष्णुबुद्धिसे
* आशाया ये दासा दासास्ते सर्वलोकस्य । आशा दासी येषां तेषां दासायते लोकः ॥
(स्क० पु०, वै० वे० २० । १८)
२९४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
| भद्रमतिकी पूजा करके पाँच हाथ पृथिवी उन्हें दे दी। उस भूमिदानके पुण्यसे सुघोष भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त हुआ, जहाँ जाकर कोई भी शोक नहीं करता। तदनन्तर भद्रमति अपने पुत्रों और स्त्रियोंके साथ देव-दानववन्दित वेंकटाचलपर गये। वहाँ स्वामिपुष्करिणीके परम पवित्र निर्मल जलमें उन्होंने स्त्रियों और पुत्रोंके साथ संकल्पपूर्वक स्नान किया। तत्पश्चात् उसके पश्चिम तटपर पृथ्वीको धारण करनेवाले भगवान् श्वेतवाराहको नमस्कार करके वे भगवान् श्रीनिवासके मन्दिरमें गये। वहाँ ब्रह्मा आदि देवताओंसे सेवित कृपानिधान श्रीनिवासका अपने पुत्र आदिके साथ दर्शन किया और भगवान्को प्रणाम करके पत्नी और पुत्रसहित पापनाशन तीर्थमें आये। फिर वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके धर्म आदि शुभ कर्मोंका अनुष्ठान किया और किसी श्रोत्रिय विष्णुभक्त पुरुषको विष्णुबुद्धिसे मोक्षदायक भूमिदान (जो सुघोषसे ली थी वह) दिया। उस दानके प्रभावसे शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले वनमाला-विभूषित भगवान् विष्णु गरुड़पर चढ़े हुए पापनाशन तीर्थके तटपर प्रकट हुए। उस समय शान्त स्वभाववाले भद्रमतिने भगवान्की इस प्रकार स्तुति आरम्भ की— | नमः पयोराशिनिवासकाय<br>नमोऽस्तु लक्ष्मीपतयेऽव्ययाय।<br>नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय<br>नमो नमः पुण्यगतागताय।<br>नमो नमोऽर्केन्दुविलोचनाय<br>नमोऽस्तु ते यज्ञफलप्रदाय।<br>नमोऽस्तु यज्ञाङ्गविराजिताय<br>नमोऽस्तु ते सज्जनवल्लभाय॥<br>नमो नमः कारणकारणाय<br>नमोऽस्तु शब्दादिविवर्जिताय।<br>नमोऽस्तु तेऽभीष्टसुखप्रदाय<br>नमो नमो भक्तमनोरमाय॥<br>नमो नमस्तेऽद्भुतकारणाय<br>नमोऽस्तु ते मन्दरधारकाय।<br>नमोऽस्तु ते यज्ञवराहनाम्ने<br>नमो हिरण्याक्षविदारकाय॥<br>नमोऽस्तु ते वामनरूपभाजे<br>नमोऽस्तु ते क्षत्रकुलान्तकाय।<br>नमोऽस्तु ते रावणमर्दनाय<br>नमोऽस्तु ते नन्दसुताग्रजाय॥<br>नमस्ते कमलाकान्त नमस्ते सुखदायिने।<br>श्रितार्तिनाशिने तुभ्यं भूयो भूयो नमो नमः॥ |
| नमो नमस्तेऽखिलकारणाय<br> नमो नमस्तेऽखिलपालकाय।<br>नमो नमस्तेऽमरनायकाय<br> नमो नमो दैत्यविमर्दनाय॥<br>नमो नमो भक्तजनप्रियाय<br> नमो नमः पापविदारणाय।<br>नमो नमो दुर्जननाशकाय<br> नमोऽस्तु तस्मै जगदीश्वराय॥<br>नमो नमः कारणवामनाय<br> नारायणायामितविक्रमाय।<br>श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय<br> नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ | 'सबके कारणरूप आप भगवान्को नमस्कार है, नमस्कार है। सबको पालन करनेवाले आपको नमस्कार है, नमस्कार है। समस्त देवताओंके स्वामी आपको नमस्कार है, नमस्कार है। दैत्योंका संहार करनेवाले आपको नमस्कार है, नमस्कार है। जो भक्तजनोंके प्रियतम, पापोंके नाशक तथा दुष्टोंके संहारक हैं, उन जगदीश्वरको बार-बार नमस्कार है। जिन्होंने किसी विशेष हेतुसे वामनरूप धारण किया, जो नारस्वरूप जलमें निवास करनेके कारण नारायण कहलाते हैं, जिनके विक्रमकी कोई सीमा नहीं है तथा जो शंख, चक्र, खड्ग और गदा धारण करते हैं, उन भगवान् पुरुषोत्तमको बार-बार नमस्कार है। क्षीरसिन्धुमें निवास करनेवाले |
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भगवान्को नमस्कार है। अविनाशी लक्ष्मीपतिको नमस्कार है। जिनके अनन्त तेजकी सूर्य आदिसे भी तुलना नहीं हो सकती, उन भगवान्को नमस्कार है तथा जो पुण्य-कर्मपरायण पुरुषोंको स्वतः प्राप्त होते हैं, उन कृपालु श्रीहरिको बार-बार नमस्कार है। सूर्य और चन्द्रमा जिनके नेत्र हैं, जो सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाले हैं, यज्ञांगोंसे जिनकी शोभा होती है तथा जो साधु पुरुषोंके परम प्रिय हैं, उन भगवान् श्रीनिवासको बार-बार नमस्कार है। जो कारणके भी कारण, शब्दादि विषयोंसे रहित, अभीष्ट सुख देनेवाले तथा भक्तोंके हृदयमें रमण करनेवाले हैं, उन भक्तवत्सल भगवान्को नमस्कार है। अद्भुत कारणरूप आपको नमस्कार है, नमस्कार है। मन्दराचल पर्वत धारण करनेवाले कच्छपरूपधारी आपको नमस्कार है। यज्ञवाराहरूपमें प्रकट होनेवाले आपको नमस्कार है। हिरण्याक्षको विदीर्ण करनेवाले आपको नमस्कार है। वामनरूपधारी आपको नमस्कार है। क्षत्रियकुलका अन्त करनेवाले परशुरामरूपमें आपको नमस्कार है। रावणका मर्दन करनेवाले श्रीरामरूपधारी आपको नमस्कार है तथा नन्दनन्दन श्रीकृष्णके बड़े भाई बलरामरूपमें आपको नमस्कार है। कमलाकान्त! आपको नमस्कार है। सबको सुख देनेवाले आपको नमस्कार है। भगवन्! आप शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं। आपको बारंबार नमस्कार है।'
ब्राह्मण भद्रमतिके इस प्रकार स्तुति करनेपर भक्तवत्सल दयानिधान भगवान् श्रीनिवासने वात्सल्यपूर्वक कहा—'तात! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे इस महास्तोत्रसे मैं सन्तुष्ट हूँ। ब्रह्मन्! तुम इस संसारमें पुत्र-पौत्र आदिके साथ सब भोगोंसे सम्पन्न होकर सुख भोगनेके पश्चात् अन्तमें मोक्ष प्राप्त करोगे।' ऐसा कहकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने पापनाशन तीर्थकी महिमा और उसके तटपर भूमिदानकी महत्ताका भी वर्णन किया।
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आकाशगंगातीर्थकी महिमा—रामानुजपर भगवान्की कृपा तथा भगवद्भक्तोंका लक्षण
श्रीसूतजी कहते हैं— तपोधनो! रामानुज नामसे प्रसिद्ध एक जितेन्द्रिय विष्णुभक्त ब्राह्मण थे। धर्मात्मा रामानुजने वानप्रस्थ-आश्रममें स्थित होकर आकाशगंगातीर्थके समीप तपस्या की। गरमीमें भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए वे पंचाग्निके मध्यमें स्थित रहते थे, वर्षांमें खुले आकाशके नीचे बैठकर मुखसे अष्टाक्षर (ॐ नमो नारायणाय) मन्त्रका जप और हृदयमें भगवान् जनार्दनका ध्यान करते थे तथा जाड़ेमें जलके भीतर निवास करते थे। वे समस्त प्राणियोंके हितैषी, जितेन्द्रिय तथा सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे दूर रहनेवाले थे। उन्होंने कितने ही वर्षोंतक सूखे पत्ते खाकर निर्वाह किया, कुछ कालतक जलका ही आहार किया और कुछ वर्षोंतक वे केवल वायु पीकर रहे। तदनन्तर उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर भक्तवत्सल भगवान् विष्णुने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। भगवान्के हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि शोभा पा रहे थे। उनके नेत्र विकसित कमलके दलोंकी भाँति सुन्दर थे, श्रीअंगोंकी दिव्य प्रभा कोटि-कोटि सूर्यके समान थी। वे विनतानन्दन गरुड़पर आरूढ़ हो छत्र और चमरसे सुशोभित थे। हार, भुजबन्द, मुकुट और कड़े आदि आभूषण उनके अंगोंकी शोभा बढ़ाते थे। विष्वक्सेन और सुनन्द आदि पार्षद भगवान्को
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सब ओरसे घेरकर खड़े थे। वीणा, वेणु और मृदंग आदि बाजे बजानेवाले नारद आदिके द्वारा उनकी महिमाका गान हो रहा था। भगवान्का ऐश्वर्य परम उत्तम रूपसे प्रकट हो रहा था। वे पीताम्बरसे शोभायमान थे। उनके वक्षःस्थलमें लक्ष्मीका निवास था। श्याम मेघके समान उनकी कान्ति थी। दोनों पार्श्वभागमें खड़े हुए सनक आदि महायोगी भगवान्की सेवामें लगे थे। अपनी मन्द-मन्द मुसकानसे तीनों लोकोंको मोहते और अंगोंकी दिव्य प्रभासे दसों दिशाओंको सम्मानित एवं प्रकाशित करते हुए भक्तसुलभ दयानिधान भगवान् वेंकटेश्वर महामुनि रामानुजके समीप उपस्थित हुए। उन्होंने अपनी चारों बाहोंसे मुनिको पकड़कर हृदयसे लगा लिया और प्रेमपूर्वक कहा—‘महामुने! कोई वर माँगो, मैं तुम्हारी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हूँ। तुमने जो नमस्कार किया है, उससे मेरा प्रेम और बढ़ गया है। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ।’
रामानुज बोले— नारायण! रमानाथ! श्रीनिवास! जगन्मय! जनार्दन! जगद्धाम! गोविन्द! नरकान्तक! वेंकटाचलशिरोमणे! मैं आपके दर्शनसे ही कृतार्थ हो गया। धर्मनिष्ठ पुरुष आपको नमस्कार करते हैं; क्योंकि आप धर्मके रक्षक हैं। जिन्हें महादेवजी और ब्रह्माजी भी नहीं जानते, तीनों वेदोंको भी जिनका ज्ञान नहीं हो पाता, उन्हीं आप परमात्माको आज मैं जान पाया हूँ। इससे अधिक और कौन-सा वरदान हो सकता है? जिन्हें योगी नहीं देख पाते, केवल कर्मकाण्डीलोग जिनकी झाँकी नहीं कर पाते, उन्हीं आप परमात्माका आज मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हो रहा है। इससे बढ़कर और क्या हो सकता है? सम्पूर्ण जगत्के स्वामी वेंकटेश्वर! मैं इतनेसे ही कृतार्थ हूँ। जिनके नामका स्मरण करनेमात्रसे बड़े-बड़े पातकी मनुष्य भी मुक्तिको प्राप्त हो जाते हैं, उन्हीं भगवान् जनार्दनका आज मैं प्रत्यक्ष दर्शन करता हूँ। प्रभो! आपके युगल चरणारविन्दोंमें मेरी अविचल भक्ति बनी रहे।
श्रीभगवान्ने कहा— महामते रामानुज! मुझमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति हो। ब्रह्मन्! मेरी कही हुई दूसरी बात भी सुनो। जब सूर्य मेषराशिपर जाते हैं, उस समय चित्रा नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा होनेपर जो लोग आकाशगंगामें स्नान करते हैं, वे पुनरावृत्ति-रहित परमधामको प्राप्त होते हैं। रामानुज! तुम आकाशगंगाके समीप ही निवास करो। प्रारब्धकर्मके अनुसार प्राप्त हुए इस शरीरका अन्त होनेपर तुम्हें मेरे स्वरूपकी प्राप्ति होगी। इस विषयमें बहुत कहनेकी क्या आवश्यकता है। आकाशगंगाके शुभ जलमें जो कोई भी स्नान करते हैं, वे सभी उत्तम भगवद्भक्त हो जाते हैं।
रामानुजने पूछा— भगवन्! भगवद्भक्तोंके लक्षण क्या हैं? किस कर्मसे उनकी पहचान होती है? मैं इस विषयको सुनना चाहता हूँ।
भगवान् वेंकटेश बोले— मुनिश्रेष्ठ! तुम भगवद्भक्तोंके लक्षण सुनो। जो समस्त प्राणियोंके हितैषी हैं, जिनमें दूसरोंके दोष देखनेका स्वभाव नहीं है, जो किसीसे भी डाह नहीं रखते और ज्ञानी, निःस्पृह तथा शान्तचित्त हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २९७
हैं। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा दूसरेको पीड़ा नहीं देते और जिनमें संग्रह करनेका स्वभाव नहीं है तथा उत्तम कथा श्रवण करनेमें जिनकी सात्त्विक बुद्धि संलग्न रहती है तथा जो मेरे चरणारविन्दोंके भक्त हैं, जो उत्तम मानव माता-पिताकी सेवा करते हैं, देवपूजामें तत्पर रहते हैं, जो भगवत्पूजनके कार्यमें सहायक होते हैं और पूजा होती देखकर मनमें आनन्द मानते हैं, वे भगवद्भक्तोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। जो ब्रह्मचारियों और संन्यासियोंकी सेवा करते हैं तथा दूसरोंकी निन्दा कभी नहीं करते हैं, जो श्रेष्ठ मनुष्य सबके लिये हितकारक वचन बोलते हैं और जो लोकमें सद्गुणोंके ग्राहक हैं, वे उत्तम भगवद्भक्त हैं। जो सब प्राणियोंको अपने समान देखते हैं तथा शत्रु और मित्रमें समभाव रखते हैं, जो धर्मशास्त्रके वक्ता तथा सत्यवादी हैं और जो ऐसे पुरुषोंकी सेवामें रहते हैं, वे सभी उत्तम भगवद्भक्त हैं। दूसरोंका अभ्युदय देखकर जो प्रसन्न होते हैं तथा भगवन्नामोंका कीर्तन करते रहते हैं, जो भगवान्के नामोंका अभिनन्दन करते, उन्हें सुनकर अत्यन्त हर्षमें भर जाते और सम्पूर्ण अंगोंमें रोमांचित हो उठते हैं, जो अपने आश्रमोचित आचारके पालनमें तत्पर, अतिथियोंके पूजक तथा वेदार्थके वक्ता हैं, वे उत्तम वैष्णव हैं। जो अपने पढ़े हुए शास्त्रोंको दूसरोंके लिये बतलाते हैं और सर्वत्र गुणोंको ग्रहण करनेवाले हैं, जो एकादशीका व्रत करते, मेरे लिये सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते रहते, मुझमें मन लगाते, मेरा भजन करते, मेरे भजनके लिये लालायित रहते तथा सदा मेरे नामोंके स्मरणमें तत्पर होते हैं, वे उत्तम भगवद्भक्त हैं। सद्गुणोंकी ओर जिनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, वे सभी श्रेष्ठ भक्त हैं।
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दान-पात्र-विचार, चक्रतीर्थकी महिमा, पद्मनाभकी तपस्या, भगवान्का वरदान तथा राक्षसके आक्रमणसे चक्रद्वारा पद्मनाभकी रक्षा
ऋषियोंने पूछा—भगवन्! दान किसको देना चाहिये? दानका समय कौन-सा है?
सूतजी बोले—द्विजवरो! नपुंसक, पुत्रहीन, पाखण्डी, वेदवेत्ताओं तथा ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले और अपने वर्णाश्रमोचित कर्मका त्याग करनेवाले पुरुषको दिया हुआ दान निष्फल होता है। जो परायी स्त्रियोंमें आसक्त है, दूसरोंके धनका जिसके मनमें बड़ा लोभ है तथा जो गीत गानेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको दिया हुआ दान निष्फल होता है। जिसके मनमें असूया (दोषदर्शन)-का भाव भरा है, जो कृतघ्न और मायावी है, जिसमें ज्ञानका अभाव है, जो सदा भीख माँगनेवाला है, हिंसक है, जो नाम-विक्रय, वेद-विक्रय, स्मृति-विक्रय तथा धर्म-विक्रय करनेवाला है और दूसरोंको सताना ही जिसका स्वभाव बन गया है; ऐसे ब्राह्मणको दिया हुआ दान भी निष्फल होता है। जो कोई भी पापमें संलग्न रहनेवाले हैं, उनसे न तो कुछ लेना चाहिये और न उन्हें कुछ देना ही चाहिये। उत्तम कर्ममें तत्पर श्रोत्रिय, अग्निहोत्री, जीविकाहीन, दरिद्र तथा कुटुम्बी ब्राह्मणको दान देना चाहिये। जो देवताओंकी पूजामें लगा रहनेवाला और पुराणोंकी कथा बाँचनेवाला है, ऐसे ब्राह्मणको, उनमें भी प्रायः जो दरिद्र हो उसे, दान देना उचित है। पाखण्डी, पतित, संस्कारभ्रष्ट, वेद बेचनेवाले, कृतघ्न तथा पापपरायण ब्राह्मणको कभी प्रणाम न करे। जो स्नान कर
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रहा हो, जिसके हाथोंमें समिधा और फूल हो, जिसने जलपात्र ले रखा हो तथा जो भोजन करता हो, ऐसे व्यक्तिको प्रणाम न करे। जो कलहप्रिय, अत्यन्त क्रोधी, दमन करनेवाला, जनसमुदायके मध्यमें स्थित, भिक्षान्नधारी तथा सोया हुआ हो, उसको भी प्रणाम न करे। रजस्वला, व्यभिचारिणी, सूतिका, गर्भपात करनेवाली, व्रत नाश करनेवाली तथा अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई स्त्रीको कभी प्रणाम न करे। जो श्राद्धके नियममें नियुक्त हो, देवताओंकी पूजा कर रहा हो अथवा यज्ञ एवं तर्पण कर रहा हो— ऐसे पुरुषको भी प्रणाम न करे। यदि श्राद्धके लिये कोई सुपात्र ब्राह्मण न मिले तो केवल सूत कातकर (जनेऊ आदि बनाकर) जीविका चलानेवाले सदाचारी एवं पुत्रवान् ब्राह्मणको श्राद्धके लिये निमन्त्रित करे। यदि वह भी न मिले, तो पुत्रको या छोटे भाईको अथवा अपनेको ही श्राद्धमें नियुक्त करे। पुत्रहीन ब्राह्मणको किसी प्रकार भी श्राद्धके लिये नियुक्त न करे।
पूर्वकालमें श्रीवत्स गोत्रमें उत्पन्न पद्मनाभ नामक एक जितेन्द्रिय ब्राह्मण था। वह दयालु, उपवासशील, सत्यवादी, सब प्राणियोंको अपने ही समान देखनेवाला तथा विषयकामनासे रहित था। सब भूतोंका हितैषी, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला तथा सब प्रकारसे द्वन्द्वोंसे रहित था। कितने ही वर्षतक वह सूखे पत्ते चबाकर रहा, कुछ कालतक केवल जल पीता रहा, फिर कई वर्षतक उसने केवल वायुका आहार किया। इस प्रकार महामुनि पद्मनाभने बारह वर्षोतक कठोर तपस्या की।
तदनन्तर भगवान् लक्ष्मीपतिने पद्मनाभकी तपस्यासे सन्तुष्ट हो उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। श्रीहरिने अपने हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदिको धारण किया था। उनके नेत्र खिले हुए कमलदलकी भाँति शोभा पा रहे थे और श्रीअंगोंकी कान्ति कोटि-कोटि सूर्यको भी लज्जित कर रही थी। पद्मनाभने आँख खोलकर शंख-चक्रधारी, शान्तस्वरूप, करुणासागर वेंकटनाथ भगवान् श्रीनिवासका दर्शन किया। उन्हें देखकर मुनिने इस प्रकार स्तुति प्रारम्भ की—
‘शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले देवाधिदेव भगवान् वेंकटेश्वरको नमस्कार है। नारायणगिरिपर निवास करनेवाले आप श्रीनिवासजीको नमस्कार है। पापोंका नाश करनेवाले सर्वव्यापी भगवान् विष्णुको नमस्कार है। शेषाचलनिवासी आप भगवान् श्रीनिवासको नमस्कार है। जो तीनों लोकोंके स्वामी, विश्वरूप, सबके साक्षी तथा शिव और ब्रह्मा आदिके लिये भी वन्दनीय हैं, जिनके नेत्र कमलके समान हैं, जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं तथा जो दुष्ट राक्षसोंका संहार करते हैं, उन भगवान् श्रीनिवासको नमस्कार है। जो भक्तोंके प्रियतम, दिव्य स्वरूप, देवताओंके स्वामी तथा शरणागतोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले हैं, जो योगियोंके पालक, वेदवेद्य तथा भक्तोंके पापोंका संहार करनेवाले हैं, उन श्रीनिवास भगवान् विष्णुको नमस्कार है।’
चक्रतीर्थनिवासी पद्मनाभ मुनिके द्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर परम ऐश्वर्यशाली, विश्वरूप, दयानिधान वेंकटनाथ भगवान् श्रीनिवासजी बहुत सन्तुष्ट हुए और बोले—‘महाभाग! तुम मेरे चरणारविन्दोंके पूजक हो। द्विजश्रेष्ठ! इस चक्रतीर्थतटपर मेरी पूजा करते हुए तुम एक कल्प निवास करो।’ ऐसा कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। तबसे परम बुद्धिमान् पद्मनाभ मुनि चक्रतीर्थके किनारे निवास करने लगे। कुछ कालके पश्चात् वहाँ एक भयंकर राक्षस आया। वह क्रूर क्षुधासे पीड़ित होकर नारायणपरायण पद्मनाभ मुनिको अपना ग्रास बनाना चाहता था। उसने बड़े वेगसे ब्राह्मणको पकड़ लिया। तब उन्होंने शरणागतोंके रक्षक दयासागर चक्रपाणि श्रीनारायणको पुकारा और बार-बार ऐसा कहा—‘प्रभो! रक्षा कीजिये,
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * २९९
रक्षा कीजिये, हे वेंकटेश ! हे दयासिन्धो ! हे शरणागतपालक ! हे पुरुषसिंह ! मैं राक्षसके वशमें आ गया हूँ। मेरी रक्षा कीजिये। हे लक्ष्मीकान्त ! हे दुःखहारी हरि ! हे विष्णुदेव ! हे वैकुण्ठनाथ ! हे गरुड़ध्वज ! आपने ग्राहके चंगुलमें फँसे हुए गजराजकी जिस प्रकार रक्षा की थी उसी प्रकार राक्षसके आक्रमणसे दबे हुए मुझ भक्तकी रक्षा कीजिये। हे दामोदर ! हे जगन्नाथ ! हे हिरण्यकशिपु दैत्यका मर्दन करनेवाले नृसिंह ! प्रह्लादजीकी भाँति मैं भी राक्षसके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हूँ; अतः उन्हींके समान आप मेरी भी रक्षा कीजिये।'
पद्मनाभके इस प्रकार स्तुति करनेपर अपने भक्तके ऊपर भय आया हुआ जानकर दयानिधान चक्रपाणिने भक्तकी रक्षाके लिये अपने चक्रको भेजा। भगवान्का वह चक्र बड़े वेगसे चक्रतीर्थके तटपर आया। वह अनन्त सूर्यके समान तेजस्वी तथा अनन्त अग्निके समान ज्वालामालाओंसे प्रज्वलित था। उससे बड़े जोरकी गड़गड़ाहट हो रही थी। बड़े-बड़े असुरोंका संहार करनेवाले उस सुदर्शन चक्रको देखकर राक्षस भागा, परंतु सुदर्शनने सहसा पास पहुँचकर उसका मस्तक काट डाला। राक्षसको पृथ्वीपर पड़ा हुआ देख विप्रवर पद्मनाभ मुनि अत्यन्त प्रसन्न हो सुदर्शन चक्रकी स्तुति करने लगे।
पद्मनाभ बोले—सम्पूर्ण विश्वके संरक्षणकी दीक्षा लेनेवाले विष्णुचक्र ! आपको नमस्कार है। आप भगवान् नारायणके करकमलको विभूषित करनेवाले हैं। आप युद्धमें असुरोंका संहार करनेमें कुशल हैं। अतिशय गर्जना करनेवाले सुदर्शन ! आप भक्तोंकी पीड़ाका विनाश करते हैं। आपको नमस्कार है। मैं भयसे उद्विग्न हूँ। आप सब प्रकारके पाप-तापसे मेरी रक्षा कीजिये। स्वामिन् ! सुदर्शन ! प्रभो ! संकटसे छुटकारा चाहनेवाले सम्पूर्ण जगत्का हित करनेके लिये आप सदा इस चक्रतीर्थमें निवास करें।
पद्मनाभ ब्राह्मणके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुके चक्रने अपने स्नेहसे उन्हें तृप्त-से करते हुए कहा—'पद्मनाभ ! यह चक्रतीर्थ अत्यन्त उत्तम और परम पवित्र है। मैं सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये सदा इस तीर्थमें निवास करूँगा। आपके ऊपर दुरात्मा राक्षसके द्वारा आये हुए संकटका विचार करके भगवान् विष्णुसे प्रेरित होकर मैं शीघ्र यहाँ आ पहुँचा। आपको पीड़ा देनेवाले उस अधम राक्षसको मैंने मार डाला और आपकी उसके भयसे रक्षा की; क्योंकि आप भगवान्के भक्त हैं। विप्रवर ! सब पापोंका हरण करनेवाले इस परम पवित्र चक्रतीर्थमें सब लोगोंकी रक्षाके लिये मैं सदा निवास करूँगा। मेरे निवास करनेसे यह तीर्थ चक्रतीर्थके नामसे प्रसिद्ध होगा और जो मनुष्य इस मोक्षदायक चक्रतीर्थमें स्नान करेंगे, उन सबके पुत्र, पौत्र आदि वंशज, निष्पाप होकर भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होंगे।' यों कहकर भगवान् विष्णुके चक्रने पद्मनाभ मुनि तथा अन्य ब्राह्मणोंके देखते-देखते सहसा उस चक्र-सरोवरमें प्रवेश किया। शौनकादि महर्षियो !
३०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इस प्रकार मैंने तुमलोगोंसे चक्रतीर्थके माहात्म्यका वर्णन किया। जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर इस अध्यायको पढ़ता या सुनता है उसे चक्रतीर्थमें स्नान करनेका उत्तम फल प्राप्त होता है।
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सुन्दर गन्धर्वका वसिष्ठजीके शापसे राक्षसभावको प्राप्त होकर पुनः उससे मुक्त होना
ऋषियोंने पूछा— सूतजी! वह राक्षस कौन था जिसने भगवान् विष्णुके भक्त महात्मा ब्राह्मणको कष्ट पहुँचाया?
सूतजी बोले— ब्राह्मणो! पूर्वकालकी बात है। श्रीरंगक्षेत्रमें जो वैकुण्ठके सदृश भगवान् विष्णुका विशाल मन्दिर है, उसमें वसिष्ठ और अत्रि आदि महातेजस्वी मोक्षके लिये वैष्णव भक्तोंको अभय प्रदान करनेवाले देवेश्वर श्रीविष्णुभगवान्की उपासना करते थे। एक दिन वीरबाहुका बलवान् पुत्र सुन्दर नामवाला गन्धर्व सैकड़ों स्त्रियोंके साथ उस क्षेत्रमें आया और एक जलाशयमें नग्न होकर नग्न हुई युवतियोंके साथ आनन्दपूर्वक जल-विहार करने लगा। उसी समय मध्याह्न-सन्ध्या करनेके लिये मुनिवर वसिष्ठ अन्य महर्षियोंके साथ श्रीरंग-मन्दिरसे बाहर निकले और उस जलाशयपर गये। उन ऋषियोंको देखकर वे सभी रमणियाँ भयसे कातर हो अपने-अपने कपड़े ओढ़कर बैठ गयीं; परंतु साहसी सुन्दर ज्यों-का-त्यों खड़ा रहा। यह देख वसिष्ठ मुनिने कुपित होकर उस निर्लज्जको शाप दिया—'सुन्दर गन्धर्व! तूने हमलोगोंको देखकर भी लज्जावश वस्त्र धारण नहीं किया, इसलिये तू शीघ्र राक्षस हो जा।'
महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर उसकी स्त्रियाँ हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें गिर पड़ीं और भक्तिभावसे विनीतचित्त होकर बोलीं—'भगवन्! आप सब धर्मोंके ज्ञाता हैं, साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र हैं। दयासिन्धो! पति ही नारियोंका उत्तम भूषण कहलाता है। पतिहीन नारी सौ पुत्रोंवाली होकर भी संसारमें विधवा ही कहलाती है। ऐसी नारियोंका जन्म व्यर्थ समझा जाता है। अतः मुने! हमारे पतिके ऊपर आप प्रसन्न हों। तत्त्वदर्शी मुनियोंको एक अपराध क्षमा कर देना चाहिये। दयासिन्धो! सुन्दर आपका शिष्य है, इसे क्षमा करें।'
सुन्दरकी स्त्रियोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वसिष्ठजीने कहा—'सुन्दरियो! मेरा वचन कभी व्यर्थ नहीं होगा, इससे छूटनेका उपाय बतलाता हूँ, उसे श्रद्धापूर्वक सुनो। यह राक्षसके समान आकारवाला सुन्दर आजसे सोलह वर्षोंके बाद इच्छानुसार घूमता-घामता सर्वपापहारी वेंकटाचलपर पहुँच जायगा और वहाँ चक्रतीर्थपर जायगा। देवांगनाओ! चक्रतीर्थपर महायोगी मुनिवर पद्मनाभजी रहते हैं। उन्हें खा जानेके लिये जब यह आक्रमण करेगा, तब ब्राह्मणकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णुका भेजा हुआ उत्तम चक्र इसका मस्तक काट डालेगा। तदनन्तर शापसे मुक्त होकर यह तुम्हारा पति सुन्दर अपने स्वरूपको प्राप्त होकर पुनः स्वर्गलोकमें चला जायगा।'
श्रीरंगनाथमें भक्ति करनेवाले वसिष्ठजी ऐसा कहकर शीघ्र ही अपने आश्रमको चले गये। तदनन्तर राक्षसरूपमें परिणत हुआ भयानक आकारवाला सुन्दर इधर-उधर घूमता हुआ गिरिश्रेष्ठ वेंकटाचलपर गया और चक्रतीर्थपर भी जा पहुँचा। इस भ्रमणमें ही उसके सोलह वर्ष पूरे हो गये थे। तदनन्तर चक्रतीर्थनिवासी पद्मनाभको खा जानेके लिये उसने बड़े वेगसे आक्रमण किया। मुनिने भगवान् विष्णुकी स्तुति की और भगवान्ने राक्षसद्वारा
* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३०१
पीड़ित पद्मनाभकी रक्षाके लिये चक्रको भेजा। इस प्रकार चक्रने आकर उस राक्षसका मस्तक काट डाला। तब वह राक्षस शरीर छोड़कर दिव्य देह धारण करके विमानपर जा बैठा। उस समय उसके ऊपर फूलोंकी वर्षा हो रही थी। उसने हाथ जोड़कर सुदर्शनको प्रणाम किया। फिर उन द्विजश्रेष्ठ पद्मनाभको भी प्रणाम करके उनकी आज्ञा लेकर सुन्दर गन्धर्व स्वर्गको चला गया।
ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने उस राक्षसकी उत्पत्तिका वृत्तान्त और चक्रतीर्थका पापनाशक माहात्म्य आपलोगोंसे बतलाया। इसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।
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घोणतीर्थका माहात्म्य—गन्धर्वपत्नीका उद्धार
ब्राह्मणो! अब घोणतीर्थका माहात्म्य सुनो! महापापोंमें तत्पर, चाण्डालकुलमें सबसे नीच, क्रूर, कुलका नाश करनेवाला, कष्टकारक, दानशून्य, सत्कर्मरहित, पशुघाती, परद्रोही, चुगलखोर, असत्यवादी, पाखण्डी, मित्रद्रोही, कृतघ्न, भ्रूणहत्या करनेवाला, परस्त्रीगामी, स्वामीसे द्रोह करनेवाला, ठग, लोभी, पितृघाती, देवताओंसे विमुख, आत्मप्रशंसा करनेवाला, शठ, अयोग्य पात्रके लिये व्यय करनेवाला, धर्ममें बाधा डालनेवाला, अनुकूलतामें अन्तर डालनेवाला, फल-फूल और पल्लवोंसे युक्त वृक्षको काटनेवाला, विश्वासघाती, वीर-हत्यापरायण, अग्निहोत्रका त्याग करनेवाला, विषका प्रयोग करनेवाला, गुरुद्वेषी, पति-पत्नीमें वैमनस्य उत्पन्न करनेवाला, गाँवका अगुआ, देवमन्दिरका अध्यक्ष, वेतन लेकर पढ़ानेवाला, कठोर कर्म करनेवाला, पापोंमें स्वभावतः रत रहनेवाला, गुप्त पाप करनेवाला, अनजानमें या जान-बूझकर दुष्कर्म करनेवाला—इन सभी प्रकारके पापियोंको परम मनोहर घोणतीर्थ अपनेमें स्नान और जलपान आदि करनेपर पवित्र कर देता है।
इस विषयमें मैं एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें महातेजस्वी गार्ग्य मुनिने महात्मा देवलको नमस्कार करके कहा—'महाभाग! आप घोणतीर्थके सर्वपापहारी शुभ माहात्म्यका वर्णन कीजिये।'
देवलने कहा—मुने! तुम्बुरु नामक गन्धर्व अपनी पतिव्रता पत्नीको शाप देकर इस तीर्थमें स्नान करके दयानिधान वेंकटेश्वरकी पूजा करनेसे पुनरावृत्तिरहित विष्णुधामको प्राप्त हो गया था। वह वृत्तान्त इस प्रकार है। एक दिन तुम्बुरु नामक गन्धर्वने अपनी प्यारी पत्नीसे इस प्रकार कहा—'देवि! सब पातकोंका नाश करनेवाले माघमासमें सूर्योदयके समय इस तटपर भगवान् विष्णुकी पूजा करनी है, इसलिये गोबरसे इस भूमिको लीप दो और इस माघमें प्रतिदिन माधवके लिये दीप-बत्ती बनाओ। भगवान्के आगे भक्तिपूर्वक धूप समर्पित करो, पवित्र होकर भगवान्के लिये रसोई तैयार करो और मेरे साथ-साथ रहकर परिक्रमा तथा नमस्कार आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक भगवान्की पूजा करो। नित्यप्रति आलस्य छोड़कर भगवान् विष्णुकी पुराण-कथा सुनो। नित्य सबेरे स्नान करके यत्नपूर्वक श्रीहरिका चरणोदक पान करो। कृष्ण, विष्णु, मुकुन्द, नारायण, जनार्दन, अच्युत, अनन्त और विश्वात्मन् इत्यादि भगवन्नामोंका सदा कीर्तन किया करो और क्रोध, मात्सर्य तथा लोभ आदिका परित्याग करके व्रत-नियमका पालन करो। इससे तुम्हें भवबन्धनसे छुटकारा मिलेगा और सनातन विष्णुधामकी प्राप्ति होगी।'
स्वामीका ऐसा कथन सुनकर गन्धर्वकी उस
३०२
* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
प्यारी पत्नीने क्रोधपूर्वक उत्तर दिया—'आर्यपुत्र! माघके महीनेमें बहुत सर्दी पड़ती है, उस समय प्रातःकाल, जब कि सूर्यका तेज बहुत मन्द रहता है, सूर्योदय-कालमें कोई कैसे स्नान करेगा? माघमें उस समय शीतका अधिक कष्ट रहता है। इसलिये आपके बताये हुए ये सब कार्य मुझसे बार-बार न हो सकेंगे। अतः प्रातःकालमें मैं आपके साथ स्नान नहीं करूँगी। क्योंकि अधिक सर्दी पड़नेसे यदि मेरी मृत्यु हो गयी, तो उस समय आप मेरी रक्षा नहीं करेंगे।'
पत्नीकी यह बात सुनकर तुम्बुरुने सोचा कि 'धर्मविरुद्ध चलनेवाले पुत्रको, अप्रिय वचन बोलनेवाली पत्नीको तथा ब्राह्मण एवं ईश्वरको न माननेवाले राजाको तत्काल शापके द्वारा दण्ड देना चाहिये।' इस नीतिके वचनका विचार करके गन्धर्वने अपनी सती पत्नीको इस प्रकार शाप दिया—'ओ मूढ़े! सौ पातकोंका नाश करनेवाले परम पुण्यमय वेंकटाचलपर घोणतीर्थके समीप जो पीपलका वृक्ष है, उसके खोखलेमें तू मेढकी हो जा।' पतिदेवकी यह बात सुनकर वह गन्धर्ववल्लभा उनके चरणोंमें गिर पड़ी और प्रार्थना करने लगी। तब तुम्बुरुने उसे शापसे मुक्त होनेकी यह अवधि बतलायी कि अपनी इन्द्रियोंपर विजय पानेवाले परम तपस्वी महाभाग अगस्त्य मुनि जब महातिथि पूर्णिमाको परम उत्तम घोणतीर्थमें जाकर स्नान करेंगे और उसी पीपल वृक्षके समीप बैठकर शिष्योंको घोणतीर्थका माहात्म्य बतलावेंगे, उस समय पीपलके खोखलेमें ही एकाग्रचित्त होकर जब तुम मोक्षदायक घोणतीर्थका माहात्म्य सुनोगी, तब समस्त पापोंका नाश करके मेरे साथ आ मिलोगी।
गन्धर्वके ऐसा कहनेपर उसकी धर्मपत्नी चुप हो गयी। स्वामीके शापसे उसने मेढकके शरीरमें प्रवेश किया और धीरे-धीरे शेषाचलके शिखरपर घोणतीर्थके दक्षिण उस पीपल-वृक्षके खोखलेमें जाकर रहने लगी। तदनन्तर किसी समय अगस्त्यजी मनोहर वेंकटाचलपर गये। वहाँ उन्होंने नियमपूर्वक स्वामितीर्थमें स्नान करके वाराहस्वामीको नमस्कार किया। तत्पश्चात् उस तीर्थके दक्षिण वेंकटेशजीके मन्दिरमें जाकर वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य विशाल नेत्रवाले सनातन देवदेव दयानिधान श्रीनिवासजीको मस्तक झुकाया। उसके बाद वे घोणतीर्थमें गये और वहाँ शिष्योंके साथ उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके उसी पीपल वृक्षकी छायामें जा बैठे। उस समय उन्होंने शिष्योंसे भक्तिपूर्वक घोणतीर्थका पवित्र माहात्म्य वर्णन किया, जो ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला तथा सम्पूर्ण मंगलों और समस्त सम्पदाओंको देनेवाला है। उस माहात्म्यको सुनकर वह मेढकी पूर्ववत् गन्धर्वपत्नीके मनोहर स्वरूपको प्राप्त होकर योगी अगस्त्यके चरणोंमें गिर पड़ी और बोली—'योगियोंमें श्रेष्ठ दयानिधान अगस्त्यजी! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। ब्रह्मन्! मैं पतिके वचनोंका विरोध करनेवाली स्त्री हूँ, दया करके मेरी रक्षा कीजिये।'
अगस्त्यजी बोले—देवि! तुम्हारे पतिकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है। उन्होंने जो रोषमें आकर तुम्हें शाप दिया है, वह पतिके वचनोंका विरोध करनेवाली तुम-जैसी स्त्रीके लिये उचित ही है। जो स्त्री पतिके वचनोंकी अवहेलना करके अपनी इच्छाके अनुसार बर्ताव करती है, वह जबतक चन्द्रमा और तारे रहते हैं तबतक घोर नरकमें निवास करती है। स्त्रियोंके लिये स्वतन्त्रता उचित नहीं है, उन्हें पतिकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये। स्त्रियाँ पतिकी सेवा तथा पातिव्रत्यरूपी पुण्यसे ही भगवान् विष्णुके परमधाममें जाती हैं। स्त्रियोंके लिये पति ही माता है, पति ही विष्णु है, पति ही ब्रह्मा है, पति ही शिव है, पति ही गुरु है तथा पति ही तीर्थ है, ऐसा विद्वान्
- वैष्णवखण्ड-भूमिवराहखण्ड * ३०३
पुरुष मानते हैं।* पतिकी बात टालकर जो स्त्री दूसरे-दूसरे पुण्योंमें सदा लगी रहती है, वह भी शुद्ध नहीं होती। वही स्त्री जब पतिकी प्रेरणाके अनुसार चलती, पतिकी बुद्धिके अधीन रहती और पतिके चरणारविन्दोंके पवित्र जलसे अपना अभिषेक करती है, तब भगवान्को प्रिय होती है। इसलिये तुम्हारा किया हुआ दोष ही तुम्हें इस शापके रूपमें प्राप्त हुआ था। उसे यहाँ भोगकर घोणतीर्थका माहात्म्य सुनते-सुनते तुम्हारी उस शापसे मुक्ति हो गयी और पहलेके समान तुम्हें सुन्दर अंगोंवाला नारीरूप पुनः प्राप्त हो गया। इसीलिये विद्वान् पुरुष घोणतीर्थको परम पवित्र मानते हैं। जो मनुष्य सब पापोंका नाश करनेवाले इस इतिहासका श्रवण करता है, वह वाजपेय-यज्ञका फल पाता है और उसे सनातन विष्णुलोककी प्राप्ति होती है।
वेंकटाचलके मुख्य तीर्थोंका वर्णन, पुराण-श्रवणकी महिमा और नियम तथा अर्जुनकी तीर्थयात्रा
ऋषियोंने पूछा—पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजी! इस वेंकटाचलपर उत्तम धर्मविषयक अनुराग प्रदान करनेवाले मुख्य-मुख्य तीर्थ कितने हैं? कौन ज्ञानदायक हैं? कौन भक्ति और वैराग्य देनेवाले हैं? तथा कौन मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं? उन सबका वर्णन कीजिये।
श्रीसूतजी बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शौनक! इस श्रेष्ठ पर्वतपर मुख्य-मुख्य एक सौ आठ तीर्थ ऐसे हैं, जो उत्तम धर्ममें अनुराग प्रदान करनेवाले हैं। इन एक सौ आठ तीर्थोंमें साठ तीर्थ भक्ति और वैराग्य देनेवाले हैं और इस वेंकटाचलके शिखरपर छः तीर्थ मुक्तिदायक माने गये हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—स्वामिपुष्करिणी, आकाशगंगा, पापविनाशन, पाण्डुतीर्थ, कुमारधारिका-तीर्थ और तुम्बुरुतीर्थ। जो मनुष्य इन तीर्थोंके माहात्म्यके साथ भगवान् विष्णुकी भुवनपावनी कथाको सर्वदा श्रवण करते हैं, वे इस लोकमें निश्चय ही भगवान् विष्णुके भक्त होते हैं। सम्पूर्ण भुवनोंको पवित्र करनेवाली श्रीविष्णुकथाको सर्वदा श्रवण करनेमें यदि कोई समर्थ न हो, तो दो घड़ी, एक घड़ी अथवा एक क्षण भी जो भक्तिपूर्वक इसे श्रवण कर लेता है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती। सम्पूर्ण यज्ञों और सब प्रकारके दानोंसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल मनुष्य एक बार पुराणकथाका श्रवण करनेसे प्राप्त कर लेता है। पुराणका श्रवण और भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन—ये दो ही मनुष्यके पुण्यरूपी वृक्षके महान् फल हैं। यदि कोई बड़ा प्रयत्न करके अमृत ही पी ले, तो भी वह अकेला ही अजर-अमर होता है; परंतु भगवान् विष्णुका कथारूप अमृत तो समस्त कुलको ही अजर-अमर बना देता है। पुराणका जाननेवाला विद्वान् बालक, युवा, वृद्ध, दरिद्र अथवा दुर्भाग्ययुक्त ही क्यों न हो, वह पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा सदैव वन्दनीय और पूजनीय होता है। पुराणवेत्ता ब्राह्मण जब कथा कहनेके लिये व्यासासनपर बैठ जाय तब प्रसंगकी समाप्ति होनेतक वह किसीको प्रणाम न करे। जहाँ खोटे मनुष्य रहते हों, जो
* पतिर्माता पतिर्विष्णुः पतिर्ब्रह्मा पतिः शिवः। पतिर्गुरुः पतिस्तीर्थमिति स्त्रीणां विदुर्बुधाः॥
(स्क० पु०, वै० वे० २६। ८३-८४)
३०४
- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
स्थान हिंसक जन्तुओंसे घिरा हो तथा जिस घरमें जुआ खेला जाता हो, वहाँ विद्वान् पुरुष पवित्र कथा न कहे। जो उत्तम ग्राम हो, जहाँ अच्छे लोग बसते हों, जो उत्तम क्षेत्र, पवित्र देवालय अथवा नदीका पवित्र तट हो, वहीं विद्वान् पुरुष पवित्र कथा बाँचे। जो श्रद्धा और भक्तिसे युक्त हों, अन्य कार्योंमें जिनका मन न लगा हो तथा जो मौन, पवित्र और शान्त भावसे सुनते हों ऐसे श्रोता पुण्यके भागी होते हैं। जो अधम मनुष्य बिना भक्ति-भावके पवित्र कथा सुनते हैं, उनको पुण्य फलकी प्राप्ति नहीं होती। जो पान चबाते हुए भगवान्की पवित्र कथा सुनते हैं, वे नरकमें पड़ते हैं। जो पाखण्डी ऊँचे आसनपर बैठकर कथा सुनते हैं, वे नरकोंको भोगकर अन्तमें कौवे होते हैं। जो वीरासन लगाकर अथवा सिंहासनपर बैठकर भगवान्की कथा सुनते हैं, वे टेढ़े-मेढ़े वृक्ष होते हैं। जो प्रणाम न करके कथा सुनते हैं, वे विषवृक्ष होते हैं और जो स्वस्थ होकर भी सोकर कथा सुनते हैं, वे अजगर होते हैं। जो वक्ताके समान आसनपर बैठकर कथा सुनता है, वह पापका भागी होकर नरकमें पड़ता है। जो पुराणके ज्ञाता विद्वान्की तथा सब पापोंका नाश करनेवाली उत्तम कथाकी निन्दा करते हैं, वे कुत्ते होते हैं। जब कथा बाँची जाती हो, उस समय जो दुष्टतापूर्ण उत्तर-प्रत्युत्तर करते हैं, वे गधे होते हैं तथा उसके बाद गिरगिटकी योनिमें जन्म लेते हैं। जो कथा होते समय उसमें विघ्न डालते हैं, वे करोड़ों वर्षोंतक नरक भोगकर अन्तमें ग्राम-सूकर होते हैं। जो नरश्रेष्ठ पुराणवेत्ता विद्वान्के बैठनेके लिये कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र तथा चौकी देते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाकर मनोवांछित भोगोंको भोगकर ब्रह्मादि देवताओंके लोकोंमें स्थित होते और निरामय पदको प्राप्त हो जाते हैं। जो पुराणके बेठनके लिये सूत और नया कपड़ा देते हैं, वे प्रत्येक जन्ममें भोगवान् और ज्ञानसम्पन्न होते हैं।
इस प्रकार वेंकटाचलके माहात्म्यको सुनकर सब ऋषियोंने पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीका यथायोग्य सम्मान करके अनुपम हर्ष प्राप्त किया।
ऋषि बोले— सूतजी ! अब हमलोग कटाह-तीर्थका माहात्म्य सुनना चाहते हैं।
सूतजी बोले— विप्रवरो ! कटाहतीर्थ सब लोकोंमें प्रसिद्ध है। वह सब प्रकारकी सम्पत्तियोंको देनेवाला, शुद्ध तथा सब पापोंका नाश करनेवाला है। उससे दुःस्वप्नोंका नाश हो जाता है। वह महापातकोंका नाश करनेवाला, बड़े-बड़े विघ्नोंका निवारण करनेवाला तथा मनुष्योंको परम शान्ति देनेवाला है। कटाहतीर्थ स्मरण करनेमात्रसे सब पापोंका संहार कर देता है। अतः 'केशवाय नमः, नारायणाय नमः, माधवाय नमः'—इन नामोंसे पृथक्-पृथक् उस तीर्थके जलका आचमन करे। अथवा तीनों नामोंसे एक ही बार उस तीर्थके कल्याणप्रद जलका पान करे अथवा भगवान् वेंकटेश्वरके अष्टाक्षर मन्त्रसे भोग, मोक्ष प्रदान करनेवाले उक्त तीर्थका जल पीये। पहले यह प्रार्थना करे कि हे तीर्थवर ! जन्मान्तरमें किये हुए मेरे महापापका शीघ्र नाश करो। उसके बाद मोक्षमार्गके एकमात्र साधन कटाहतीर्थके जलका नित्य पान करे। स्वामिपुष्करिणी-तीर्थका स्नान, वाराह स्वामीका दर्शन और कटाहतीर्थके जलका पान—ये तीन बातें त्रिलोकीमें दुर्लभ हैं। कटाहतीर्थका यत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये; क्योंकि उस तीर्थका परम उत्तम जल पीकर पापी भी कृतार्थ हो जाते हैं। ब्राह्मणो ! कटाहतीर्थका माहात्म्य मैंने जैसा सुना था, उसी प्रकार तुम्हें बताया है।
अब मैं एक दिव्य पापनाशक कथा सुनाता हूँ, तुम सब लोग सावधान होकर सुनो। द्वापरकी बात है। कुन्तीके पुत्र पाँचों पाण्डव परम
* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड *
३०५
बुद्धिमान् राजा द्रुपदसे उनकी पुत्री याज्ञसेनीको पाकर धृतराष्ट्रकी आज्ञासे हस्तिनापुरमें गये। वहाँ पितामह भीष्म तथा अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्रके द्वारा सम्मानित होकर उन्होंने दुर्योधन आदिके साथ पाँच वर्षोंतक निवास किया। तदनन्तर भीष्म आदिके समझानेसे महायशस्वी धृतराष्ट्रने अपने कुलके सभी बड़े-बूढ़ोंके सामने और भगवान् श्रीकृष्णके आगे पाण्डवोंकी सेवासे प्रसन्न हो, उन्हें आधे राज्यके साथ खाण्डवप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली) नामक नगर प्रदान किया। तब धृतराष्ट्र आदि कौरवोंकी अनुमति ले सब पाण्डव श्रीकृष्णके साथ खाण्डवप्रस्थमें चले गये। वहाँ विश्वकर्मासे सुरक्षित इन्द्रप्रस्थ नामक पुरमें रहते हुए भाइयोंसहित युधिष्ठिरने पृथ्वीका पालन किया। भगवान् श्रीकृष्णके द्वारका चले जानेपर धर्मके जाननेवाले कुन्तीपुत्रोंने नारदजीके उपदेशसे द्रौपदीके विषयमें यह प्रतिज्ञा की कि द्रौपदी क्रमशः एक-एक वर्ष एक-एक पाण्डवके घरमें निवास करेगी। इस निर्णयके बाद जो दूसरे भाईके घरमें रहती हुई पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीको देख लेगा, उसे एक वर्षतक तीर्थ-सेवन करना पड़ेगा। इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे पाण्डव आलस्य छोड़कर सामान्य लौकिक व्यापारोंमें संलग्न हो समय व्यतीत करने लगे।
तदनन्तर एक दिन उसी जनपदके निवासी ब्राह्मणने राजाके आँगनमें खड़े होकर कई बार पुकार लगायी—'महाराज! चोरोंने मेरी गाय चुरा ली।' उसकी आवाज सुनकर अर्जुन वहाँ आये और ब्राह्मणको सान्त्वना देकर अपने अस्त्र-शस्त्र लानेके लिये शीघ्रतापूर्वक शस्त्रागारको गये। वहाँ उन्होंने द्रौपदी और राजा युधिष्ठिरको एक जगह बैठे देखा। इस विषयमें की हुई प्रतिज्ञाको जानते हुए भी उन्होंने वहाँसे धनुष और बाण ले लिये और युद्धमें लुटेरोंको मारकर ब्राह्मणकी गाय लौटा ली। फिर उसे ले जाकर ब्राह्मणको आदरपूर्वक समर्पित कर दिया। तत्पश्चात् अर्जुनने धर्मनन्दन युधिष्ठिरको सूचित किया कि मेरे द्वारा प्रतिज्ञाका उल्लंघन हुआ है, इसलिये मुझे तीर्थयात्रा करनी चाहिये।
अपने छोटे भाईकी बात सुनकर सब धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ धर्मनन्दन युधिष्ठिरने आदरपूर्वक कहा, 'सुव्रत! तुमने ब्राह्मण और गायके लिये ऐसा किया है। प्रजाकी रक्षा करना राजाका कर्तव्य है; यदि उसके द्वारा चोरोंकी उपेक्षा हो जाय तो उसे ब्रह्महत्याका पाप लगता है और चोरोंको दण्ड देनेपर वह पुण्यका भागी होता है। तुमने राजा और प्रजा दोनोंके लिये जो हितकर कार्य है, वही किया है; इसलिये तुम्हारा दोष नहीं है।' धर्मराजका यह वचन सुनकर सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाले अर्जुनने हाथ जोड़कर कहा, 'भूपाल! आप ऐसी बात न कहें, आप धर्मके सर्वस्वको जानते हैं, धर्मके साक्षात् स्वरूप हैं तथा कर्तव्य और अकर्तव्यके ज्ञाता हैं। समर्थ पुरुषको अपनी की हुई प्रतिज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं करना चाहिये। आर्य! यदि मुझपर दया करके मुझे तीर्थोंमें जानेसे रोक देंगे, तो संसारके मनुष्य यदि मुझे हतप्रतिज्ञ कहने लगें, तो उन्हें कौन रोक सकता है। मेरा मन भी तीर्थयात्राकी उत्कण्ठासे उतावला हो रहा है। राजन्! नारदजीने जो अनुशासन किया है, वह हमारे लिये सर्वथा कर्तव्य है। अतः महाराज! तीर्थयात्राके लिये मैंने जो यह उद्योग किया है, इससे आपको प्रसन्न होना चाहिये। स्वामीको सेवकोंकी प्रतिज्ञाका उनके द्वारा निर्वाह करवाना चाहिये।'
तब भाइयोंकी सलाह ले 'बहुत अच्छा' कहकर युधिष्ठिरने अर्जुनका अनुरोध स्वीकार कर लिया। अर्जुनने प्रणाम और विनय आदिके द्वारा अपने बड़े भाईको सन्तुष्ट किया। फिर यथायोग्य भीमसेन आदि बन्धुओंसे भी विदा ले, ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर अर्जुनने वहाँसे
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यात्रा की। राजकुमार अर्जुनने पहले गंगा नदीके तटपर पहुँचकर उसीके किनारे-किनारे निकटवर्ती मार्गसे जाते हुए हरिद्वार, प्रयाग और काशी आदि तीर्थोंका सेवन किया और अन्य तीर्थोंका दर्शन करते हुए वे ऊँची-ऊँची तरंगोंसे लहराते हुए दक्षिण समुद्रतक जा पहुँचे। फिर परम पवित्र महानदी, प्रसिद्ध पुरुषोत्तम तीर्थ और सिंहाचलका दर्शन करके उन्होंने अपनेको कृतकृत्य माना। तत्पश्चात् अर्जुनने समस्त पातकसमूहका विनाश करनेके कारण अतिशय गौरवको प्राप्त हुई पुण्यमयी गोदावरी नदीका दर्शन किया। उसके जलसे विधिपूर्वक स्नान करके वे मलापहा नदीके तटपर गये। उसके दर्शनसे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उसके बाद वे सरिताओंमें श्रेष्ठ कृष्णवेणी नदीके समीप जा पहुँचे और भगवान् शंकरके निवास-स्थान श्रीपर्वतका दर्शन किया। फिर पिनाकिनी नदीको पार करके देवताओं और ऋषियोंद्वारा सेवित वेंकटाचल पर्वतका दर्शन किया, जो भगवान् नारायणका प्रिय निवास है। उस पर्वतके शिखरपर स्थित सम्पूर्ण लोकोंके एकमात्र स्वामी सुप्रसिद्ध भगवान् श्रीहरिका अर्जुनने कल्याणकी सिद्धिके लिये भक्तिपूर्वक पूजन किया। तदनन्तर महापर्वत वेंकटाचलके शिखरसे उतरकर उन्होंने सिद्धों और मुनियोंके समुदायसे सेवित सुवर्णमुखरी नामवाली नदीका दर्शन किया, जिसे मुनिवर अगस्त्यजी यहाँ ले आये थे।
अर्जुनका कालहस्तीश्वरके समीप भरद्वाजके आश्रमपर जाना और भरद्वाजजीके द्वारा अगस्त्यजीके प्रभावका वर्णन
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार सब तीर्थोंका दर्शन करके आये हुए अर्जुनके मनमें महानदी सुवर्णमुखरीने कई गुना आनन्द बढ़ा दिया। उस नदीके पूर्व तटपर अर्जुनने एक ऊँचा पर्वत देखा, जो कालहस्तीके नामसे प्रसिद्ध है। उस महानदीमें स्नान करके वे पर्वतके शिखरपर गये और वहाँ देवपूजित कालहस्तीश्वर नामक महादेवजीका दर्शन किया। पार्वतीके साथ महादेवजीका भक्तियुक्त चित्तसे पूजन करके वे कृतार्थ हो गये। तदनन्तर अर्जुन वहाँके अभूतपूर्व पदार्थोंका दर्शन करनेके लिये उस पर्वतपर विचरने लगे। वहाँ पर्वतीय शिखरोंपर एकान्त प्रदेशमें उन्होंने शिवजीके ध्यानमें तत्पर हुए अनेकानेक दिव्य योगियोंका दर्शन किया। साथ ही इन्द्रियोंको संयममें रखनेवाले अनेकों शान्त मुनियोंको भी देखा। उनमें कोई तो निराहार रहते थे, कोई वायु पीते थे, कोई पत्ते चबाते थे और कोई सूर्यकी धूपके ही आहारपर निर्वाह करते थे। उसके बाद उस पर्वतके दक्षिण भागमें घूमते हुए उन्होंने महर्षि भरद्वाजका पवित्र आश्रम देखा, जो सब प्रकारकी लक्ष्मीसे सुशोभित था। कौतुकका तो वह एकमात्र स्थान था। सिंह, हाथी, व्याघ्र, चीता, रूरू, रंकु तथा अन्य मृगोंसे भरा हुआ था और वे सभी जीव आपसका सहज वैर भुलाकर एक-दूसरेका हितसाधन करते थे। उस आश्रमको देखकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने तपस्वियोंके प्रभावकी प्रशंसा की। अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण उस यात्रामें अर्जुनके साथ थे। उन सभी मित्रोंके साथ उन्होंने आश्रममें प्रवेश किया और अपने सामने ही अनेक मुनियोंसे घिरे हुए प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भरद्वाजजीको बैठे देखा। उनके सब अंगोंमें भस्म लगा हुआ था और कंधेपर मृगचर्मका उत्तरीय शोभा पा रहा था। इससे वे नूतन श्याम मेघसे आच्छादित कैलासकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। सुवर्णके समान पीले रंगकी लम्बी जटाओंसे प्रकाशमान थे। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो श्रुति-स्मृति और
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३०७
पुराणोंके अर्थोंने एकीभूत होकर मुनिका शरीर धारण कर लिया हो। वे दिव्य ज्ञानके शुभ आश्रय थे। धृति, क्षान्ति, दया, तुष्टि और शान्ति आदि सद्गुण नित्य उनकी सेवामें रहते थे। वे अखण्ड ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान हो रहे थे। अर्जुनने धीरे-धीरे निकट जाकर मुनिके चरणारविन्दोंके आगे पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग प्रणाम किया।
अपने आश्रमपर आये हुए कुन्तीनन्दन अर्जुनको मुनिने स्वयं उठाकर अभ्युदयका आशीर्वाद दिया। उस समय उनका चित्त हर्षोल्लाससे परिपूर्ण था। यथायोग्य अर्घ्य आदि प्रस्तुत करके मुनिने अपने प्रिय अतिथिका सत्कार किया और एक आसनकी ओर संकेत करके उन्हें उसपर बिठाया। जब वे बैठ गये तब उनसे स्वास्थ्यसम्बन्धी कुशल-प्रश्न किया। तदनन्तर अर्जुन भोजन करके तपोनिधि भरद्वाज मुनिके समीप ही बैठे और कथा सुननेके कौतूहलसे दिनका शेष भाग वहीं व्यतीत किया। तत्पश्चात् सायं-सन्ध्या करके अग्निमें आहुति दे अपने साथ आये हुए ब्राह्मणोंसहित वे मुनिके कुटीगृहमें गये और वहाँ उनके आशीर्वादसे आनन्दित होकर बैठे। उस समय सुवर्णमुखरी नदीके शीतल जलको छूकर चलनेवाली ठंडी वायुसे अर्जुनको बड़ा हर्ष प्राप्त हो रहा था।
सूतजी कहते हैं—अर्जुनने सुखपूर्वक बैठे हुए भरद्वाज मुनिको प्रणाम करके विनयपूर्वक यह गम्भीर वचन कहा—'मुनिश्रेष्ठ! इस संसारमें एकमात्र मैं ही धन्य हूँ, जिसका आपने अपने पुत्रके समान भलीभाँति आदर किया है। भगवन्! यह महानदी किस पर्वतसे प्रकट हुई है और कौन इसे ले आया है? तथा इसमें स्नान, दान आदि करनेसे कौन सा पुण्य प्राप्त होता है?'
भरद्वाजजीने कहा—महाबाहु अर्जुन! तुम कौरवकुलको पवित्र करनेवाले हो और धर्मपुत्र युधिष्ठिरके छोटे भाई हो। मैंने अनेक राजा देखे हैं। परंतु वे तुम्हारे समान लीलायुक्त, सरलता, दया, उदारता, धीरता और गम्भीरता आदि गुणोंसे सुशोभित नहीं थे। कुल, विद्या और धन—ये बलवान् पुरुषोंके अभिमानमें कारण होते हैं। परंतु तुम्हारे-जैसे कल्याणमय पुरुषोंके लिये वे भी नम्रता लानेमें कारण हुए हैं। राजन्! मैंने मुनियोंके मुखसे जो दिव्य कथा सुनी है, वह तुमसे कहता हूँ, उसे सुनो। पूर्वकालकी बात है, दक्षकुमारी सती अपने पितासे अपमानित हो शरीर त्यागकर हिमालयकी पुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुईं। फिर सप्तर्षियोंने आकर जब प्रार्थना की, तब गिरिराज हिमालय विवाहके समय अपनी पुत्री भगवान् शंकरको देनेको उद्यत हुए। उसके बाद जगदीश्वर शिव पार्वतीको ब्याह लानेके लिये हिमालयके निवासस्थानपर गये। उस समय स्थावर-जंगम सभी प्राणी भगवान् शिवके मंगलमय विवाहका अभिनन्दन करनेके लिये वहाँ उपस्थित हुए। उन सबके भारी भारसे उत्तरकी भूमि नीची हो गयी और दक्षिणकी भूमि भार न होनेसे अत्यन्त हलकेपनके कारण ऊँची हो गयी। इससे सबको बड़ा भय हुआ। तब महादेवजीने अगस्त्यजीके समीप जाकर कहा, 'मुने! यह पृथ्वी अधिक भारसे दबकर विकृतावस्थाको प्राप्त हो गयी है, तुम्हीं इसको बराबर करनेमें समर्थ हो। अतः मेरे कहनेसे इस पृथ्वीको बराबर करो।' तब 'बहुत अच्छा' कहकर भगवान् शिवको प्रणाम करके अगस्त्यजी दक्षिण दिशामें चले गये। विन्ध्यगिरिको लाँघकर अगस्त्यके दक्षिण दिशामें जाते ही पृथ्वी समभावको प्राप्त हो गयी।
तदनन्तर अगस्त्यजीने आगे जाकर किसी ऊँचे पर्वतको देखा, जो अपनी फैली हुई घाटियोंसे पृथ्वीको धारण करके स्थित था। वे धीरे-धीरे उस पर्वतपर चढ़ गये और उसके मनोहर शिखरकी सुरम्य स्थलीमें उन्होंने रहनेका विचार किया। वहाँ अमृतके समान जलसे भरा हुआ एक सरोवर था, जिसमें पद्म और उत्पल आदि फूलोंकी शोभा फैली हुई थी। उसके चारों ओर बहुत-से वृक्ष
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लगे थे। अगस्त्यजीने उसी सरोवरके उत्तर तटपर एक मनोहर भूभागमें उत्तम आश्रम बनाकर तथा पितरों, देवताओं, ऋषियों और वास्तुदेवका विधिपूर्वक पूजन करके मुनिसमुदायके साथ उसमें दीर्घकालतक निवास किया। तपस्यामें मनकी वृत्तियोंको लगाकर वहाँके तपोवनमें जब अगस्त्य मुनि रहने लगे, तब वह उत्तम सौभाग्यसे सुशोभित पर्वत अगस्ति-शैलके नामसे प्रसिद्ध हुआ।
महर्षि अगस्त्यकी तपस्यासे सुवर्णमुखरी नदीका प्रादुर्भाव और उसका माहात्म्य
**भरद्वाजजी कहते हैं—**एक दिन मुनिवर अगस्त्यजी पूर्वाह्नकालका नित्य-नियम पूरा करके भगवान् शिवकी आराधना करनेके लिये देवमन्दिरमें गये। उसी समय आकाशवाणी हुई—'मुने! यह प्रदेश नदीसे हीन है, अतः ज्ञान-विज्ञानसे रहित केवल शरीरधारी ब्राह्मणकी भाँति, दक्षिणाहीन दीक्षा और चाँदनीशून्य रात्रिके समान शोभा नहीं पाता। इसलिये तुम सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये इस भूभागमें कोई ऐसी नदी बहाओ, जो अगाध पापराशिजनित भयका निवारण करके सदैव सुशोभित रहे। मुनिवर! देवसमुदायकी यही प्रार्थना है, जो सबके लिये हितकर है।'
इस आकाशवाणीको सुनकर ब्रह्मर्षि अगस्त्यजी क्षणभर कुछ विचार करते रहे। तत्पश्चात् देव-पूजन समाप्त करके वे बाहर वेदीपर बैठे। उनके आश्रमपर जितने मुनि रहते थे, उन सबको उन्होंने बुलवाया और आकाशवाणीकी कही हुई बात कह सुनायी। तब मुनियोंने अगस्त्यजीको प्रणाम करके कहा, 'महर्षे! आपके हुंकारमात्रसे राजा नहुष देवताओंके साम्राज्यसे नीचे गिर गये और सर्पयोनिको प्राप्त हुए। जिसने सम्पूर्ण भूमण्डलको घेर रखा है तथा जो अपनी उत्ताल तरंगोंसे आकाशको भी ताड़ित करता है, ऐसे महासागरको भी आपने अपने चुल्लूमें रख लिया। विन्ध्यपर्वत भगवान् सूर्यका मार्ग रोकनेके लिये उद्यत हुआ था, परंतु आपने उसे भी शान्त कर दिया। इन सबसे बढ़कर आश्चर्यकी बात और क्या हो सकती है। महामुने! तीनों लोकोंमें हम सब लोग कृतार्थ हैं जो कि आपसे सनाथ होकर आपके इस आश्रममें निवास करते हैं। यह प्रदेश दक्षिण दिशामें वर्णनीय है और समस्त वस्तुओंसे परिपूर्ण है तो भी बहुत दूरतक यहाँ कोई नदी नहीं है, इसलिये यह शोभा नहीं पाता। अनघ! कब ऐसा शुभ अवसर प्राप्त होगा जब हम इस देशमें आपके द्वारा बहायी हुई किसी महानदीमें स्नान करके कृतार्थताका अनुभव करेंगे। हमारी भी प्रार्थना है कि आप यहाँ सबको शरण देनेवाली किसी सर्वश्रेष्ठ विश्ववन्द्य नदीको निश्चय ही ले आनेके लिये प्रयत्न कीजिये।'
तब मुनीश्वरोंकी आज्ञा ले देवताओं तथा भगवान् शिवकी विशेष पूजा करके मुनिने महान् क्लेशमय दुःसह व्रतको अंगीकार किया और बड़े यत्नसे भारी तपस्या प्रारम्भ की। गरमीमें पंचाग्निका ताप सहन किया। वर्षामें आँधी-पानी और विद्युत्का सामना किया तथा सर्दीमें गलेतक पानीमें खड़े हो जप-ध्यान करते रहे। तत्पश्चात् मनकी वृत्तियोंको रोककर, निराहार रह, इन्द्रियोंको काबूमें करके वे पत्थरकी भाँति स्थिर हो गये। उस समय उन्हें बाहरकी बातोंका कुछ भी भान नहीं होता था। तदनन्तर तपस्यामें लगे हुए अगस्त्यजीके आगे ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्हें देखकर मुनिने प्रणाम किया और अनेक प्रकारके
- वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३०९
स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की। तब विनयावनत अगस्त्यजीकी ओर देखकर प्रसन्नवदन हो ब्रह्माजीने पवित्र वाणीमें कहा, 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! तुम्हारे इस दुष्कर तपसे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हें जो-जो अभीष्ट हो, माँगो, मैं उसे दूँगा।'
अगस्त्यजी बोले—प्रभो! आपकी कृपासे मुझे सब कुछ प्राप्त है, किंतु इस प्रदेशको नदीसे हीन देखकर मेरे मनमें खेद होता है। देवेश्वर! यहाँकी भूमिको पवित्र और सुरक्षित करनेमें समर्थ किसी महानदीको प्रकट करनेकी कृपा करें। यही मेरे लिये अभीष्ट वर है।
अगस्त्यजीका वचन सुनकर ब्रह्माजीने कहा, 'ऐसा ही होगा।' फिर उन्होंने अपने मनसे आकाशगंगाका स्मरण किया और जब वह उनके आगे आकर खड़ी हो गयी तब उससे कहा, 'गंगे! संसारका उपकार करनेवाले कार्यमें संलग्न होनेके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। इस नदीहीन देशमें सब लोगोंके हितके लिये कोई नदी प्रवाहित करनेके लिये ये अगस्त्यजी तपस्या एवं चेष्टा कर रहे हैं। इसलिये तुम अपने एक अंशसे पृथ्वीपर उतरकर अगस्त्यजीके दिखाये हुए मार्गसे जाओ और यहाँके रहनेवाले मनुष्योंको पवित्र करो। समस्त नदियों में तुम्हारा श्रेष्ठ स्थान हो और तुम अपनी शरणमें आये हुए लोगोंकी रक्षा करो।' यों कहकर ब्रह्माजी उस आकाशगंगा और अगस्त्य मुनिके द्वारा किये गये प्रणाम, पूजा तथा विशेष स्तुतियोंसे अभिनन्दित होकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् मुनीश्वर अगस्त्यके आगे अपने अंशसे उत्पन्न दिव्य तेजोमयी मूर्तिका दर्शन कराकर आकाशगंगाने कहा, 'मुनीश्वर! यह मेरा अंश है, यह पृथ्वीपर पहुँचकर नदीरूपमें परिणत हो तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेगा।'
ऐसा कहकर आकाशगंगा तो चली गयीं और उनके अंशसे उत्पन्न हुई दिव्य मूर्तिने पूछा—'मुने! मुझे किस मार्गसे चलना होगा?' तब मुनिने कहा—'कल्याणि! मैं आगे-आगे चलकर तुम्हारे जानेयोग्य मार्ग दिखाऊँगा। तुम मेरे पीछे-पीछे आओ।' तदनन्तर मुनिवर अगस्त्यजी अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर गंगाजीको अभीष्ट मार्ग दिखलाते हुए आगे-आगे चले। उस नदीको देखकर उस भूमिके निवासी मनुष्य बड़े प्रसन्न हुए। 'अहो! हमारे सौभाग्यसे यह सुधाके समान मधुर एवं निर्मल जल प्राप्त हुआ'—ऐसा कहते हुए वे अत्यन्त उत्कण्ठित हो गये। उस समय ब्रह्माजीकी आज्ञासे सब देवताओंके सुनते हुए वायुदेवने कहा—'यह नदी लोकोंके सौभाग्यसे सुवर्णकी भाँति प्राप्त हुई है तथा महर्षि अगस्त्यके द्वारा इस पृथ्वीपर लायी जानेपर अपनी कल-कलध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको मुखरित कर रही है। इसलिये यह सुवर्णमुखरीके नामसे प्रसिद्ध होगी तथा मोक्ष-सम्पत्ति प्रदान करनेवाले अपने तेजसे सम्पूर्ण लोकोंद्वारा प्रशंसित होगी।' इस प्रकार यह दिव्य नदी स्नान-पान आदिकी व्यवस्थासे सब मनुष्योंको सुख पहुँचाती हुई इस पृथ्वीपर प्रतिष्ठित हुई। जो रोगोंसे पीड़ित और अधिक व्याकुल मनुष्य हैं,
३१० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उन सबके रोगोंका निवारण करके उन्हें स्वस्थ बना देनेवाला एकमात्र सुवर्णमुखरीका जल है। अर्जुन ! वह नदी कीचड़से रहित, अत्यन्त निर्मल, पापनाशक, मंगलयुक्त और अत्यन्त स्वादिष्ट अमृतके समान जल धारण करती है। अगस्त्य पर्वतसे इसकी उत्पत्ति हुई है तथा उत्तम तीर्थसमूहोंसे सुशोभित होकर यह दक्षिण समुद्रमें जाकर मिली है। महर्षि अगस्त्य इस नदीका दक्षिण समुद्रसे संगम कराकर इसकी स्तुति करके कृतार्थताका अनुभव करते हुए पुनः इच्छानुसार अपने आश्रमपर लौट आये।
अर्जुनने कहा—भगवन् ! आपने इस महानदीकी उत्पत्तिका वृत्तान्त कहा—अब मैं इसके प्रभावको सुनना चाहता हूँ।
भरद्वाजजी बोले—पाण्डुनन्दन ! सौ योजन दूरसे भी इस सुवर्णमुखरीका स्मरण करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यदि सुवर्णमुखरीके जलमें देहधारियोंकी अस्थि डाल दी जाय, तो वह उनके ब्रह्मलोकपर चढ़नेके लिये सीढ़ी बन जाती है। सुवर्णमुखरीका स्मरण करते हुए मनुष्य जहाँ कहीं भी अन्य जलोंमें स्नान कर लें, तो उन्हें उत्तम पदकी प्राप्ति होती है। इन्द्र आदि देवता सुवर्णमुखरी नदीमें स्नान करनेके लिये ललचाये हुए चित्तसे मनुष्य-शरीरको ही प्राप्त करना चाहते हैं। यदि तोला भर भी सुवर्णमुखरी नदीका जल पी लिया जाय तो वह देहधारियोंके पर्वतसमान पापोंका भी शीघ्र नाश कर देता है। देवताओंमें विष्णु, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, मनुष्योंमें राजा, वृक्षोंमें कल्पवृक्ष, महाभूतोंमें आकाश, समस्त शक्तियोंमें मायाशक्ति, मन्त्रोंमें गायत्री मन्त्र, देवताओंके अस्त्र-शस्त्रोंमें वज्र, तत्त्वोंमें आत्मतत्त्व, यजुर्वेदके मन्त्रोंमें रुद्राष्टाध्यायी, नागोंमें शेषनाग, पर्वतोंमें हिमालय, क्षेत्रोंमें वराहक्षेत्र तथा इन्द्रियोंमें मनके समान सम्पूर्ण नदियोंमें सुवर्णमुखरी नदी श्रेष्ठ है। 'अगस्त्य पर्वतसे प्रकट हो दक्षिण समुद्रमें मिलनेवाली और सब पापोंका नाश करनेवाली तुम स्वर्णमुखरी नदीकी मैं शरण लेता हूँ। जगदम्बे ! बड़े-बड़े पातकोंसे दग्ध हुए अपने इस शरीरको मैं तुम्हारे जलसे धोता हूँ। मुझे कल्याणसे युक्त करो।'* इन दो सूक्तोंका भलीभाँति उच्चारण करके जो मनुष्य नियमपूर्वक सुवर्णमुखरीके जलमें स्नान करता है, वह शुद्ध होकर आनन्दका भागी होता है। कुन्तीनन्दन ! चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय सुवर्णमुखरीके तटपर किया हुआ स्नान, दान आदि अनन्त फलकी प्राप्ति करानेवाला होता है। संक्रान्ति, अयन तथा व्यतीपातके दिन सुवर्णमुखरी नदीमें किया हुआ स्नान मनुष्यका उद्धार कर देता है। सुवर्णमुखरीके जलमें स्नान करके मनुष्य दुःस्वप्नके विघ्नसे तथा ग्रहोंके दुष्ट स्थानमें रहनेसे प्राप्त होनेवाले पाप-तापसे तर जाता है। सुवर्णमुखरीके तटपर किया हुआ जप, होम, तप, दान, श्राद्ध और देवपूजन सौगुना फल देनेवाला होता है।
अर्जुन ! इस प्रकार तुमसे महानदी सुवर्णमुखरीकी उत्पत्ति और प्रभावका भलीभाँति वर्णन किया गया।
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* अगस्त्याचलसम्भूतां दक्षिणोदधिगामिनीम्। समस्तपापहर्त्रीं त्वां सुवर्णमुखरीं श्रये॥
महापातकविप्लुष्टं गात्रं मम तवोदकैः। क्षालयामि जगद्धात्रि श्रेयसा योजयस्व माम्॥
(स्क० पु०, वै० वे० ३३। ४२-४३)
* वैष्णवखण्ड-भूमिवाराहखण्ड * ३११
सुवर्णमुखरी नदीके तीर्थोंका वर्णन, भगवान् विष्णुकी महिमा, प्रलयकालकी स्थिति तथा श्वेतवाराहरूपमें भगवान्का प्राकट्य
अर्जुनने पूछा—मुने! सुवर्णमुखरी नदीमें किन-किन पवित्र नदियोंका संगम हुआ है तथा इसमें कहाँ स्नान करनेसे समस्त पाप कट जानेके कारण मनुष्य यमराजके भयको नहीं प्राप्त होते हैं?
भरद्वाजजी बोले—कुन्तीनन्दन! अगस्त्य पर्वतसे जहाँ पहले-पहल महानदी सुवर्णमुखरी पृथ्वीपर उतरी है, उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। वह पावन तीर्थ त्रिभुवनमें अगस्त्यतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है। उस तीर्थमें जो प्रयत्नशील साधक अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए स्नान करते हैं, वे सम्पूर्ण फल प्राप्त करते हैं। वहाँ सब लोगोंको आनन्द देनेवाले अगस्त्य मुनिके द्वारा स्थापित किये हुए भगवान् शिव अगस्त्येश्वरके नामसे प्रसिद्ध हैं। उस महानदीमें स्नान करके जो लोग अगस्त्येश्वरकी पूजा करते हैं, उन्हें दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। अगस्त्यतीर्थसे ईशानकोणकी ओर एक कोसकी दूरीपर तीन तीर्थ हैं, जो देवतीर्थ, ऋषितीर्थ तथा पितृतीर्थके नामसे प्रसिद्ध हैं। वहींपर अगस्त्यमुनिने देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका पूजन किया था। जो लोग स्नान करके उन तीर्थोंमें तर्पण करते हैं, वे तीनों ऋणोंसे मुक्त होकर अक्षय स्वर्गको प्राप्त होते हैं। वहाँसे पूर्व-उत्तरकी ओर दो योजनकी सीमामें वेणा नामवाली महानदी सुवर्णमुखरीमें मिली है। इन दोनों नदियोंके संगममें विधिपूर्वक स्नान करनेवाले मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त करते हैं। वेणासे मिलकर परम पवित्र सुवर्णमुखरी नदी पर्वतोंके दुर्गम मार्गसे उत्तरवाहिनी होकर गयी है। फिर पर्वतोंके बीचसे होकर विषम मार्गसे आगे बढ़ती हुई चार योजन दूर जाकर प्रकाशमें आयी है। वहाँसे पूर्व डेढ़ योजनकी दूरीपर उदक्कल नामक मनोहर स्थानमें यह महानदी पूर्ववाहिनी हो गयी है। वहीं भगवान् शंकरका अगस्त्येश्वर नामसे प्रसिद्ध एक और शिवलिंग है, जो स्मरणमात्रसे मनुष्योंके समस्त पापोंका निवारण करता है। जो मनुष्य उस महानदीमें स्नान करके इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए अगस्त्य-मुनिके द्वारा स्थापित भगवान् पार्वतीनाथका दर्शन करते हैं, वे अनेक जन्मोंकी उपार्जित पापराशिको दूर करके अनन्त कालतक स्वर्गलोकमें सुख भोगते हैं। वहाँसे तीर्थसमुदायसे सुशोभित सुवर्णमुखरी नदी पुनः आधे योजनतक उत्तरकी ओर गयी है। वह प्रदेश हिन्ताल, ताल और शाल आदि वृक्षोंसे बड़ा मनोहर प्रतीत होता है। वहीं व्याघ्रपदा नामवाली नदी सुवर्णमुखरी नदीमें मिली है। उन दोनों नदियोंके संगममें स्नान करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञोंका पूर्ण फल प्राप्त करते हैं। व्याघ्रपदा नदीके तटपर शंखतीर्थ सुशोभित है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। अर्जुन! वहाँ शंखेश्वर नामसे प्रसिद्ध भगवान् शिव विराजमान हैं। जो उस तीर्थमें भलीभाँति स्नान करके भगवान् शंकरका दर्शन करते हैं, वे दस अश्वमेध यज्ञोंका फल प्राप्त करके देवलोकमें जाते हैं। व्याघ्रपदासंगमसे एक योजन भूमि आगे जाकर शुभ एवं निर्मल जल बहानेवाली मुनीन्द्रसेवित सुवर्णमुखरी नदी वृषभाचलके समीप पहुँची है।
वहाँ मंगलदायिनी कल्या नामवाली पवित्र नदी सुवर्णमुखरीमें आकर मिली है। वह वृषभाचलसे प्रकट हुई है। तीर्थराजसे उसकी शोभा और बढ़ गयी है। नदियोंमें उत्तम कल्या नदी पापसमूहका नाश करनेवाली है। उन दोनों नदियोंके संगमकी महिमा बतलानेमें कौन समर्थ है? जहाँ नदीके